सारांश: नेपाल में पिछले नौ महीनों से संसद के दो विरोधी-विचारधारा वाले प्रमुख दलों के मध्य हुए सहमती-समझौते की सरकार कार्यरत है, जो सहमती के मुख्य बिन्दुओं यथा - राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक सुदृढ़ीकरण एवं महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन के क्षेत्र में सफल होते नहीं दिख रही है। परिणामतः नेपाल में विभिन्न स्तरों पर अस्थिरता गहराती जा रही है, जो वर्तमान सरकार एवं भविष्य में नेपाल के राजनीतिक व आर्थिक परिदृश्य के लिये चुनौतियां उत्पन्न कर रहीं हैं।
परिचय
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी-एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी (नेकपा-एमाले) के नेता खड्गप्रसाद शर्मा ओली ने जुलाई 2024 में नेपाली संसद के सबसे बड़े राजनीतिक दल ‘नेपाली कांग्रेस’ के नेता एवं भूतपूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के साथ एक सहमती-साझेदारी के आधार पर ‘राष्ट्रिय सहमति’[i] गठबंधन सरकार का गठन किया जो मुख्य रूप से ‘सात बिन्दुओं’[ii] पर आधारित है। इन बिन्दुओं में मुख्य रूप से इस सहमती सरकार का सर्वप्रथम उद्देश्य नेपाल में राजनीतिक स्थिरता स्थापित करने का है, जो कि दशकों से राजनीतिक उथल-पुथल, जोड़-तोड़ की राजनीति एवं बार-बार सरकारों के बनने-गिरने से सम्बंधित है। दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु नेपाल को आर्थिक कमजोरी से निकालते हुए विकास की ओर उन्मुख करने के सन्दर्भ में है। तीसरा मुख्य मुद्दा, लगभग एक दशक पहले लागू किये गए संघीय गणतांत्रिक संविधान में कुछ संशोधन से सम्बंधित हैं, जो नेपाल में राजनीतिक स्थिरता एवं विकास के लिए नितांत आवश्यक समझे जा रहें हैं।
नौ महीनों से यह सहमति सरकार नेपाल में कार्यरत है, और सत्ता में आने से लेकर अब तक सरकार द्वारा कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं, किन्तु अभी भी नेपाल तीनो स्तरों – राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक सुदृढ़ीकरण एवं संवैधानिक संशोधन – पर स्पष्ट रूप से सफल होते हुए नहीं दिख रहा है।
यह विशेष प्रतिवदेन नेपाल में राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक सुदृढ़ीकरण एवं संवैधानिक संशोधन के मुद्दे को केंद्र में रखते हुए वर्तमान गठबंधन सरकार के संघर्ष, चुनौतियाँ एवं संभावनाओं के विश्लेषण करने का प्रयास करता है।
राजनीतिक स्थिरता का प्रश्न
चुनाव एवं गठबंधन की राजनीति
नेपाली राजनीति पिछले तीन से अधिक दशकों से राजनीतिक उथल-पुथल एवं अस्थिरता से जूझ रही है[iii] और इसका एक प्रमुख कारण किसी भी एक राजनीतिक दल को बहुमत नहीं मिलना रहा है। सन 1990 के दशक में बहुदलीय लोकतंत्र के वापसी के पश्चात से ही नेपाल में किसी एक दल के पास दीर्घकाल तक पूर्ण बहुमत नहीं रह सका, क्योंकि कई नए राजनीतिक दलों का गठन एवं दलों में लगातार विभाजन होता रहा और इस प्रकार गठबंधन सरकारों का आना-जाना शुरू हुआ। बाद में माओवादी आंदोलन और गृह युद्ध (1996-2006) के पश्चात् शांति निर्माण की प्रक्रिया के दौरान हुए राजतंत्र का अंत एवं प्रथम संविधान सभा के गठन (2008) के दौरान जब चुनावी प्रणाली में अनुपातिक प्रतिनिधित्व को लागू किया गया, तब से गठबंधन की जटिलता और आवृत्ति और बढ़ी।[iv] इसका कारण मशरूम की तरह राजनीतिक दलों का निर्माण और चुनाव में भाग लेना भी रहा। परिणामतः किसी एक दल का संसद में पूर्ण बहुमत पाना मुश्किल होता रहा। तत्पश्चात जब संघीय व्यवस्था का उदय हुआ और 2017 में जब पहला संघीय संसदीय चुनाव हुआ तब उसमें भी किसी एक राजनीतिक दल को बहुमत नहीं मिल सका और गठबंधन का दौर चलता रहा। दूसरे संघीय संसदीय चुनाव (2022) में भी किसी एक दल को बहुमत न मिल सकने के कारण आज भी गठबंधन की सरकार है। उल्लेखनीय है कि गठबंधन की राजनीति में नेपाल राजनीतिक अस्थिरता का शिकार होता रहा है, क्यूंकि कोई भी सरकार पूर्ण अवधी तक नहीं टिक पा रही है। इस तरह पिछले 35 वर्षों में नेपाल ने कुल 20 गठबंधन सरकारों और 26 प्रधानमंत्रियों (जिसमें से तीन राजा ज्ञानेंद्र द्वारा प्रत्यक्ष शासन के दौरान नियुक्त) का अनुभव किया है। इस अवधि में 1990 से 2002 तक एक अल्पमत सरकार और छह गठबंधन सरकारें, प्रथम एवं द्वितीय संविधान सभाओं (क्रमशः 2008-2013 व 2013-2017) के दौरान कुल आठ गठबंधन सरकारें शामिल हैं।[v] पहले एवं द्वितीय संघीय संसदीय चुनाव (क्रमशः 2017 व 2022) के बाद से अभी तक कुल छः गठबंधन फेरबदल हुए हैं।
नेपाल में तीन प्रमुख राजनीतिक दलों – नेपाली कांग्रेस, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी-एकीकृत-मार्क्सवादी-लेनिनवादी (नेकपा-एमाले) तथा नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केन्द्र) – के नेता, क्रमशः शेर बहादुर देउबा, खड्गप्रसाद शर्मा ओली एवं पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ मुख्य रूप से नेपाली राजनीति एवं सत्ता पर पिछले एक दशक से लगातार बने रहे हैं (तालिका 1)। पिछले एक दशक में कुल आठ प्रधानमंत्री बदलें हैं, जिसमे ओली तीन बार, देउबा और प्रचंड दो-दो बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं। हालांकि इनके सत्ता में बना रहना इतना सरल नहीं रहा है, क्योंकि किसी भी दल के पास बहुमत न होने के कारण इनके दलों का आपस में एवं अन्य छोटे दलीय समूहों के बीच लगातार राजनीतिक गठबंधन की सौदेबाजी होती रही है।
तालिका 1. पिछले दस वर्षों में नेपाल के प्रधानमन्त्री
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क्र.सं. |
प्रधानमन्त्री के नाम |
अवधि |
राजनीतिक दल |
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1 |
खड्गप्रसाद शर्मा ओली |
12 अक्टूबर 2015 – 4 अगस्त 2016 |
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी-एकीकृत-मार्क्सवादी-लेनिनवादी (नेकपा-एमाले) |
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2 |
पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ |
4 अगस्त 2016– 7 जून 2017 |
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केन्द्र) |
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3 |
शेर बहादुर देउबा |
7 जून 2017– 15 फ़रवरी 2018 |
नेपाली कांग्रेस |
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4 |
खड्गप्रसाद शर्मा ओली |
15 फ़रवरी 2018– 13 जुलाई 2021 |
नेकपा-एमाले |
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5 |
शेर बहादुर देउबा |
13 जुलाई 2021– 26 दिसंबर 2022 |
नेपाली कांग्रेस |
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6 |
पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ |
26 दिसंबर 2022– 15 जुलाई 2024 |
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केन्द्र) |
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7 |
खड्गप्रसाद शर्मा ओली |
15 जुलाई 2024– अब तक |
नेकपा-एमाले |
स्रोत: लेखक द्वारा विभिन्न मीडिया स्रोतों और सरकारी अभिलेखों के आधार पर तैयार किया गया
इन तीन दलों के अतिरिक्त अन्य प्रमुख दलों में राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी, जो कि राजशाही एवं हिंदू राष्ट्रवाद का समर्थन करती है, समाजवादी राजनीतिक दल एवं क्षेत्रीय मधेशी राजनीतिक दल सत्ता संघर्ष एवं गठबंधन की राजनीति में प्रमुख रहे हैं। विभिन्न दलों, खासकर समाजवादी दलों एवं मधेसी दलों के मध्य आंतरिक कलह एवं उसकी वजह से नए दलों का विभाजन स्वरूप उदय भी होता रहा है। इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं कि कांग्रेस या कम्युनिस्ट दलों में आंतरिक कलह नहीं रहा हो, या उनका विभाजन नहीं हुआ हो, बल्कि उनके भीतर भी यह हुआ है। इन विभाजनों का आधार वैचारिक मतभेद कम और सत्ता की प्राप्ति, व्यक्तिगत राजनीतिक लाभ, एवं स्वयं के राजनीतिक अस्तित्व को बरकरार रखने के लिए अधिक होता रहा है।[vi] [vii] यह नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता का सर्वप्रमुख कारक रहा है।
सत्तावादी रवैया
नेपाल में संवैधानिक विकास के क्रम में जब से लोकतंत्र एवं बहुदलीय व्यस्था ने औचित्यपूर्णता प्राप्त की, कहीं न कहीं विभिन्न सरकारों के बार-बार लोकतान्त्रिक एवं संवैधानिक मूल्यों से भटकने के उदाहरण भी मिलते रहें हैं, जिसने राजनीतिक अस्थिरता के क्षेत्र में एक दूसरे प्रमुख कारक के रूप में कार्य किया है। वर्तमान में जहाँ राजनीतिक स्तर पर प्रधानमंत्री ओली का परम सत्ता की भावना, चाहे नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) के भीतर हो या कांग्रेस के साथ गठबंधन पर हो, ओली पर यह आक्षेप लगाए जाते रहे हैं कि वे पार्टी स्तर पर लोकतांत्रिक नहीं बल्कि अधिनायकवादी[viii] एवं निरंकुशवादी[ix] रवैया रखते हैं। हाल ही में संसद के सत्र शुरू होने के ठीक पहले कई महत्वपूर्ण अध्यादेशों को लाने से यह विषय चर्चा में बना रहा कि क्या ओली के नेतृत्व वाली सरकार संसदीय चर्चाओं और विधेयकों पर बहस, स्वीकार्यता से भागना चाहती है, क्या संवैधानिक एवं संसदीय प्रक्रियाओं को बायपास करना चाहती है और क्या ऐसा संभव है।[x] [xi] हालाँकि प्रधानमंत्री ओली के अनुसार ये अध्यादेश शासन में सुधार, निवेश आकर्षित करने व कार्यकारी-प्रशासनिक समस्यायों को दूर करने के लिए अति आवश्यक थें[xii] और संसद के सत्र में न होने की स्थिति में भी इनका लागू होना उचित था।
विशेषज्ञों के अनुसार, काठमांडू में राजनीतिक नेतृत्व अभी भी संघीय संविधान की भावनाओं के विरुद्ध सत्ता और संसाधनों के केन्द्रीकरण पर ही केन्द्रित है एवं संघीकरण प्रक्रिया का मार्ग प्रशस्त करने के लिए अनिच्छुक है।[xiii] कहीं न कहीं नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता के एक कारण सत्तावादी रवैया व सत्ता का केन्द्रीकरण भी रहा है।
जन असंतोष
वर्तमान में एक महत्वपूर्ण मुद्दा है -आम जन में राजनीतिक अस्थिरता को लेकर बढ़ता असंतोष एवं आक्रोश। ‘शेयरकास्ट इनिशिएटिव नेपाल’[xiv] के द्वारा हाल ही में महत्वपूर्ण सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर एक व्यापक राष्ट्रीय सर्वेक्षण किया गया। इसमें नेपाल के सभी सात प्रांतों के 52 जिलों में से 196 नगर पालिकाओं के 214 वार्डों में लगभग 3,000 नागरिकों से सर्वे साक्षात्कार के माध्यम से आंकड़े एकत्र किए गए।[xv] इस सर्वेक्षण के अनुसार हाल के पांच वर्षों में स्थानीय सरकारों के प्रति नागरिकों का विश्वास अधिक बढ़ा है, लोग संघीय और राज्य सरकारों की तुलना में स्थानीय सरकार पर अधिक भरोसा करते हैं। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आम नागरिकों को यह चिर-कालीन राजनीतिक अस्थिरता, चाहे संघीय या प्रांतीय स्तरों पर हो किंचित भी रास नहीं आ रही है एवं केंद्रीय नेतृत्व की विश्वसनीयता कम होती जा रही है।
नेपाल एक के बाद एक हुए सामाजिक आंदोलोनों, आर्थिक सुधार एवं राजनीतिक परिवर्तनों के कारण लगातार संक्रमण काल की स्थिति में रहा है।[xvi][xvii] ऐसे में जनता की अपेक्षाओं एवं राज्य द्वारा उनकी पूर्ती के सन्दर्भ में साम्य स्थापित नहीं हो सका है।[xviii] इसके साथ ही देश में कम रोज़गार संभावनाओं एवं अवसर के कारण युवावर्ग में हर चुनावी चक्र के साथ अधीरता बढ़ती जा रही है।[xix]
मिडिया रिपोर्ट्स के अनुसार देश में स्थानीय प्रशासनिक स्तर पर मुख्य प्रशासनिक अधिकारियों (CAOs) के बार-बार स्थानांतरण ने स्थानीय प्रशासनिक कार्यों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। स्थानीय प्रतिनिधि द्वारा CAOs को स्थानांतरित करने के प्रयास होते रहें हैं जो उनके निर्देशों एवं हितों के अनुसार काम करने से इनकार करते हैं।[xx] इससे स्थानीय स्तर पर भी प्रशासनिक अस्थिरता आई है जिसके कारण कई नगरपालिका सेवाओं में बाधा आई है साथ ही विकास परियोजनाओं में देरी और प्रशासनिक कार्यों में व्यवधान उत्पन्न हो रहा है।[xxi] यहाँ स्पष्ट रूप से इन प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति और स्थानांतरण पर राजनीतिक प्रभाव बढ़ने के संकेत मिलते हैं। इस प्रकार के राजनीतिक हस्तक्षेप, निष्क्रियता एवं भ्रष्टाचार से जन आक्रोश में वृद्धि हो रही है।
नेपाल में सरकार और संबद्ध संस्थानों में प्रमुख पदों पर नियुक्तियों के लिए राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण रहा है। वर्तमान गठबंधन सरकार भी इससे परे नहीं है, जैसे कि विदित है कि नेपाल के विश्वविद्यालयों से लेकर विदेशों में नेपाली दूतावासों तक के संस्थानों में गठबंधन में सरकार के सहयोगी दलों के लिए कमोबेश आधिकारिक कोटा निर्धारित होता है। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रकार की नियुक्तियों का असर उन प्रमुख संस्थानों के कार्यकलापों पर व्यापक रूप से पड़ा है। इस प्रकार की राजनीतिक नियुक्तियां आम जनमानस को प्रभावित करती हैं और उनमें राज्य एवं सत्ता के प्रति दुर्भावना का उदय होता है।
हाल के वर्षों में नेपाली राजनीतिक दलों के नेताओं का भ्रष्टाचार के मामलों में संलिप्तता एवं दलों का अल्पकालिक लाभ के लिए महत्वपूर्ण मुद्दों पर बार-बार रुख बदलने का विषय चर्चा का एक अहम विषय रहा है। ख़ास कर सहकारी घोटाला, सोने की तस्करी का मामला, भूटानी शरणार्थी घोटाला आदि कि मांग लेकर उच्च स्तरीय जाँच पैनल की मांग, समर्थन, विरोध, सरकार और गठबंधन बदलने के साथ बदलते रहें हैं।[xxii] यह राजनीतिक दलों के अवसरवादी व्यवहार को रेखांकित करता है तथा राजनीतिक दलों के नियत के प्रति जनता के विश्वास को कम करता है।
नेपाली समाज का एक वर्ग जहाँ वर्तमान में उभरते हुए कुछ नए युवा राजनेताओं (पुराने दलों के भीतर भी और नए दलों या स्वतंत्र रूप से देश के अन्य संघीय स्तरों पर कार्यशील) की तरफ कुछ उम्मीद से देखता है, वहीं, दूसरा वर्ग किसी भी प्रकार के पोपुलिस्ट छवि वाले नेतृत्व पर भरोसा करने को ठीक नहीं समझता है। उनका मानना है कि यदि उनके समक्ष भी सत्ता प्राप्ति और अन्य राजनीति-लुभावन एवं तुष्टिकरण के प्रस्ताव आते हैं तो उनके भी भ्रष्ट होने में देरी नहीं होगी।
विशेषज्ञों के अनुसार यद्यपि नेपाली जनता राज्य के कार्यों से असंतुष्ट हो सकती है, वैकल्पिक राजनीति की तलाश कर सकती है और राजनीतिक दलों से जवाबदेही की मांग उठा सकती है।[xxiii] किन्तु जनता इतने संघर्ष के बाद प्राप्त राजनीतिक पड़ावों को ऐसे ही नहीं त्याग सकती और न ही जनता किसी ऐसे उद्धारकर्ता (राजा) की तलाश में है जो उनकी समस्याओं का निवारण के लिए प्रकट हुआ हो।[xxiv]
राजतंत्र समर्थक विरोध प्रदर्शन
एक तीसरा वर्ग राजतंत्र की वापसी का समर्थन करता है। पिछले दस वर्षों में “राजा आउ देश बचाऊ” के नारों के साथ राजतन्त्र-समर्थक जनसमूह हिन्दू राष्ट्र एवं संवैधानिक राजतंत्र की बहाली की मांग के साथ काठमांडू घाटी और देश के अन्य स्थानों में समय-समय पर रैलीयों का आयोजन करता रहा है।[xxv][xxvi] उनके अनुसार यह नेपाल की राष्ट्रीय एकता, राजनीतिक स्थिरता एवं सुशासन के लिए आवश्यक है। हिन्दू-राष्ट्र समर्थक नेपाल में संघीय गणतंत्र प्रणाली स्थापित होने के प्रारंभ से ही इसका विरोध करतें रहें हैं[xxvii] जिसमें कमल थापा के नेतृत्व वाली राष्ट्रिय प्रजातंत्र पार्टी, जो कि संवैधानिक राजतन्त्र की समर्थक दल है, इन आयोजनों में मुख्य रूप से शामिल रही है।[xxviii] राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी एवं अन्य हिंदू समर्थक ताकतें नेपाल में हिंदू राज्य और राजशाही दोनों को पुनर्जीवित करने की मांग को लेकर मार्च निकालते रहें हैं।
इस क्रम में वर्तमान में एक अहम नाम दुर्गा प्रसाईं (पूर्व में नेपाल के वामपंथी नेताओं के निकट माने जाते रहें हैं)[xxix] का आता है जो कि पेशे से चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े हैं और वर्तमान में एक राजनीतिक कार्यकर्त्ता के रूप में एक अभियान “राष्ट्र राष्ट्रियता धर्म संस्कृति र नागरिक बँचाउ माहाअभियान” को पूरे नेपाल में चला रहें हैं।[xxx] परसाई 2023 से ही राजतन्त्र-समर्थक आयोजनों को चला रहें हैं[xxxi] इसके तहत हिन्दू राष्ट्र एवं राजतन्त्र के समर्थन में जन-समूहों को संबोधित करने एवं व्यापक समर्थन हासिल करने का प्रयास रहा है।
हाल ही में, 09 मार्च 2025 को नेपाल के शाह वंश के भूतपूर्व राजा ज्ञानेन्द्र के पोखरा से काठमांडू पहुंचने के क्रम में उनके स्वागत में पूरे काठमांडू में राजतन्त्र-समर्थकों द्वारा रैलियां आयोजित की गईं। राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी, राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी-नेपाल और अन्य राजशाही समर्थक संगठनों के सदस्य जुलूस में शामिल हुए।[xxxii] इसके साथ ही नेपाल में पुनः राजतन्त्र और हिन्दू राष्ट्र का मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है। प्रमुख राजनीतिक दल - सत्तासीन नेपाली कांग्रेस एवं नेकपा-एमाले, प्रमुख विपक्षी नेकपा (माओवादी केंद्र) और अन्य मुख्यधारा के राजनीतिक दल इस रैली से चिंतित हैं।
सत्तासीन दलों के नेतागण भूतपूर्व राजा एवं राजतन्त्र समर्थकों को अपनी सीमाओं में रहने और 2008 में निर्धारित राजनीतिक सीमाओं का सम्मान करने की चेतावनी दे रहे हैं।[xxxiii] वर्तमान प्रधानमंत्री ओली के अनुसार यदि ज्ञानेंद्र स्वयं को लोकप्रिय समझ रहें हैं, तो उन्हें राजनीतिक दल से सम्बद्ध हो चुनावी मैदान में आना चाहिए, माओवादी केंद्र के अध्यक्ष पुष्प कमल दहल का भी समान मत है।[xxxiv] वहीं नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा के अनुसार, ज्ञानेंद्र देश में गणतंत्र लाने के लिए स्वयं जिम्मेवार हैं, क्यूंकि पूर्व में उनके द्वारा अलोकतांत्रिक तरीकों से सत्ता हथियाने, नेताओं की गिरफ्तारी एवं उन पर अत्याचार आदि ने गणतंत्र की स्थापना में योगदान दिया है।[xxxv]
हाल ही में राजतंत्र की वापसी के समर्थकों द्वारा एक साझा-संघर्ष-समिति बनई गई है, जिसका नेतृत्व 87 वर्षीय नबराज सुबेदी कर रहे हैं, और इसका उद्देश्य बिखरे हुए राजतंत्र-समर्थकों के मध्य एक नए राजनीतिक सहमती बनाना है, जो राजतंत्र की वापसी का मार्ग प्रशस्त कर सके।[xxxvi] यह संघर्ष-समिति मुख्य रूप से राष्ट्रिय प्रजातंत्र पार्टी एवं अन्य राजतंत्र समर्थक नेताओं के द्वारा बनाई गई है। इसी सन्दर्भ में, 28 मार्च को काठमांडू में एक वृहत राजतन्त्र-समर्थक विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया गया, जिसमें हिन्दू राज्य व राजतन्त्र की वापसी की मांग की गई। प्रारंभ में यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण दिख रहा था, परन्तु बाद में हिंसक विरोध प्रदर्शन होने लगें जिसमें एक पत्रकार सहित दो लोगों की मौत हो गयी, दर्जनों घायल हुए और आगजनी व लूटपाट का आलम रहा।[xxxvii] इस क्रम में राजतन्त्र-समर्थक नेताओं को गिरफ़्तार और नज़रबंद किया गया है।[xxxviii] साथ ही विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं एवं सोशल मीडिया पर गणतंत्र-समर्थक विशेषज्ञों एवं आम जनों द्वारा हिंसक प्रदर्शनों में प्रत्यक्ष रूप से शामिल एवं परोक्ष रूप से उकसाने वाले नेताओं (पूर्व राजा ज्ञानेंद्र सहित) मांग की जा रही है। इसी सन्दर्भ में मार्च 30, 2025 को सिंह दरबार में गणतंत्र-संमर्थक सर्व-दलीय बैठक हुई, जिसमे राष्ट्रिय प्रजातंत्र पार्टी एवं राष्ट्रिय स्वतंत्र पार्टी को आमंत्रित नहीं किया गया था। इस बैठक में सर्वसम्मति से यह स्वीकार किया गया कि पूर्व राजा ज्ञानेंद्र संविधान को कमजोर करने और संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र प्रणाली के विरुद्ध षड्यंत्रकारी गतिविधियों के मुख्य सूत्रधार हैं। [xxxix] हिंसक-विरोध प्रदर्शनों के तहत वर्तमान सरकार द्वारा राजतंत्र एवं हिंदू-राष्ट्र समर्थक समूहों द्वारा किए जाने वाले आगामी प्रदर्शनों को रोकने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने की बात भी की गई।[xl]
वहीं, साझा-संघर्ष-समिति शुरुआत से ही यह प्रचारित करती रही है कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था ने स्थिरता और प्रभावशीलता में कमी की है, खासकर न्यायिक और संघीय प्रणाली में, और वे मानते हैं कि राजतंत्र की वापसी से इन समस्याओं का समाधान हो सकता है।[xli] इसी क्रम में विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत की गयी थी। हालाँकि, प्रदर्शनों के हिंसक होने के वजह से इसके आन्दोलन का रूप लेने से पूर्व ही समाप्त होने की शंकाओं को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रिय प्रजातंत्र पार्टी के नेतृत्व में 8 अप्रैल 2025 को “स्थिति बदलने के लिए व्यवस्था बदलें” के नारे के साथ पुनः एक अन्य राजतन्त्र-समर्थक विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण किन्तु अपेक्षाकृत काफ़ी छोटा रहा, जिसमें लगभग 2,500 से 3,000 लोगों द्वारा भाग लिया।[xlii] सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए काठमांडू के भीतर ऐसे किसी प्रदर्शन की स्वीकृति नहीं मिलने के कारण इसका आयोजन काठमांडू से सटे बल्खु में किया गया था।[xliii]
वहीं 11 अप्रैल, 2025 को नेपाली पुलिस द्वारा 28 मार्च को हुए हिंसक प्रदर्शनों के मुख्य आरोपी दुर्गा प्रसाईं और उनके अंगरक्षक दीपक खड़का को काकड़भिट्टा सीमा पार से गिरफ्तार कर नेपाल लाया गया है।[xliv] इन तमाम घटनाक्रमों के मद्देनज़र अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राजतंत्र-समर्थक ताक़तें आगे प्रदर्शनों का क्रम जारी रख पाती है या नहीं।
सताधारी दल नेकपा एमाले के नेता इस बात पर ज़ोर देते रहें हैं कि नेपाल में गणतांत्रिक लोकतंत्र, जो कि दशकों चले संघर्ष और आम जनों के बलिदान से जन्मा है, को विचलित नहीं किया जा सकता और न नेपाल में राजतंत्र की वापसी के प्रयास सफल होंगे।[xlv] कांग्रेस, एमाले, माओवादी केंद्र सहित नेपाल के अन्य प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र प्रणाली की रक्षा के लिए हाल ही में विभिन्न बैठकें हुईं हैं एवं उनके द्वारा आने वाले दिनों में गणतंत्र-समर्थक सार्वजनिक सभाओं की योजनाएं बनाई गईं हैं।[xlvi][xlvii][xlviii] उल्लेखनिय है कि कांग्रेस, एमाले एवं माओवादी सहित अन्य प्रमुख दलों की नेपाल के वर्तमान गणतांत्रिक संविधान लेखन में अहम भूमिका रहीं है।
अन्य दलों का विरोध एवं वैकल्पिक राजनीति की तलाश
15 मार्च 2025 को एक प्रेस वार्ता में, सोशलिस्ट फ्रंट नेपाल जो चार वामपंथी दलों —नेकपा (माओवादी केंद्र), नेकपा (एकीकृत समाजवादी), जनता समाजवादी पार्टी नेपाल और नेत्र बिक्रम चंद के नेतृत्व वाली नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी —के द्वारा 28 मार्च को रैलियों की एक श्रृंखला की घोषणा की गयी थी।[xlix] इन रैलियों का उद्देश्य “गणतंत्रात्मक व्यवस्था की रक्षा” के लिए “प्रतिक्रियावादी ताकतों की साजिशों” को विफल करना बताया गया।[l] इस दौरान 28 मार्च को सोशलिस्ट फ्रंट द्वारा काठमांडू में गणतंत्र-समर्थक रैली का आयोजन हुआ।
दूसरी तरफ, नेकपा (एकीकृत समाजवादी) के द्वारा 14 मार्च 2025 को नेपाल में राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं के संदर्भ में अपने विरोध जताते हुए दो महीनों तक चलने वाले आन्दोलन के प्रथम चरण की घोषणा की गई।[li] नेकपा (एकीकृत समाजवादी) द्वारा वर्तमान गठबंधन सरकार पर अक्षमता का हवाला देते हुए देश की आर्थिक समस्याओं को दूर करने में विफल रहने का आरोप लागाया गया है।[lii] साथ ही, इन मुद्दों के बारे में जनता को जागृत करने की आवश्यकता पर बल दिया है।[liii]
वहीं, समाजवादी राजनीतिक धड़े के एक अन्य महत्वपूर्ण नेता तथा भूतपूर्व प्रधानमंत्री बाबुराम भट्टराई के अनुसार नेपाल में वैकल्पिक राजनीति को तलाशने, वैकल्पिक शक्तियों को संगठित करने कि आवश्यक्ता है।[liv] किन्तु इसके लिए वो किसी एक नए दल के गठन कि बात नहीं करतें, बल्कि एक नए राजनीतिक आंदोलन की स्थापना की वकालत करते हैं जो उदारवादी लोकतंत्र और साम्यवाद दोनों से परे है।[lv] भट्टराई के अनुसार प्रगतिशील लोकतंत्र, स्वतंत्रतावादी समाजवाद और सहभागी समाजवाद के साथ लोकतांत्रिक सिद्धांतों में दृढ़ता लाने की आवश्यकता है एवं इस प्रयास में और अधिक वैचारिक स्पष्टता की आवश्यकता है।[lvi]
आर्थिक सुदृढ़ीकरण का प्रश्न
हाल के वर्षों में, नेपाली अर्थव्यवस्था कई कठिन चुनौतियों का सामना कर रही है, जिससे आर्थिक अव्यवस्था की स्थिति पैदा हो गई है। इन चुनौतियों में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में उतार-चढ़ाव और लगातार राजनीतिक अस्थिरता शामिल है, जिससे शासन और नेतृत्व में लगातार बदलाव के कारण नीति में उतार-चढ़ाव होता है। पिछले दस वर्षों में, नेपाली अर्थव्यवस्था विभिन्न घटनाओं से काफी प्रभावित हुई है, जिसमें लगातार राजनीतिक अस्थिरता के कारण नीतिगत अस्थिरता, अप्रैल 2015 का भूकंप, सितंबर 2015 का जातीय विद्रोह और आर्थिक नाकेबंदी और COVID-19 महामारी से उत्पन्न अभूतपूर्व चुनौतियाँ शामिल हैं।[lvii] इन घटनाओं ने व्यापार, पर्यटन और नेपाल के समग्र आर्थिक वातावरण को गंभीर रूप से बाधित किया है, जिसके परिणामस्वरूप सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में गिरावट आई है (चित्र 1)।

स्रोत: विश्व विकास सूचकांक, विश्व बैंक, से प्राप्त आंकड़ों पर आधारित लेखक द्वारा तैयार किया गया
नेपाल की जीडीपी में कृषि क्षेत्र के योगदान में लगातार गिरावट, औद्योगिक क्षेत्र में अस्थिरता और उतार-चढ़ाव (चित्र 2), एवं नेपाली प्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली धनराशि पर निर्भरता बढ़ी है, जिससे केवल सेवा के क्षेत्र में वृद्धि दिखाई देती है। इसके साथ ही नेपाल के विदेशी ऋण में निरंतर वृद्धि, हाल के दशकों में आयात की तुलना में निर्यात में गिरावट और उतार-चढ़ाव, एवं विदेशी निवेश (एफडीआई) में कोई महत्वपूर्ण वृद्धि नहीं होने की वजह से आर्थिक विकास में बाधा उत्पन्न हुई।[lviii] इसके अलावा, नेपाल में भ्रष्टाचार एक प्रमुख चिंता का विषय है, संस्थानों में विश्वास कम हो रहा है, आर्थिक निर्णय लेने की प्रक्रिया जटिल हो रही है और विकास के प्रयासों में बाधा आ रही है। परिणामतः आर्थिक अस्थिरता ने दीर्घकालिक आर्थिक योजनाओं एवं विकास को गंभीर रूप से बाधित किया है।

स्रोत: विश्व विकास सूचकांक, विश्व बैंक, से प्राप्त आंकड़ों पर आधारित लेखक द्वारा तैयार किया गया
देश को आर्थिक संकट की तरफ बढ़ने से रोकने के लिए विशषज्ञों द्वारा नेपाल में कई आर्थिक सुधारों की आवश्यकता पर ज़ोर दिया जाता रहा है[lix] [lx], वित्तीय, बैंकिंग, टूरिज्म, विदेशी निवेश आदि के क्षेत्र प्रमुख हैं। उदहारण के तौर पर विदेशी निवेश को बढ़ावा देने वाली नीतियों का निर्माण एवं अपेक्षित संशोधन तथा शीघ्र एवं स्पष्ट क्रियान्वयन जिससे विकास के विभिन्न क्षेत्रों में विदेशी नीवेश की आपूर्ति यथा-शीघ्र हो सके ख़ास कर के विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) के क्षेत्र में। दूसरे, नेपाली उत्पादों के लिए वैश्विक बाज़ार की तलाश जिनमें नेपाल को तुल्नात्म्क बढ़त (कॉमपरेटिव एडवांटेज) है। तीसरे, कृषि क्षेत्र जिसपर लगभग पैसठ प्रतिशत नेपाली आश्रित हैं, उसमे सुधार एवं कृषि उत्पादों के उत्पादन, भंडारण एवं निर्यात के लिए कार्य हो। पर्यटन क्षेत्र, जलविद्युत क्षेत्र, आदि के सन्दर्भ में भी पुनः नए निवेश (ख़ास कर विदेशी निवेश) एवं नई परियोजनाओं तथा पहले से ही चल रही परियोजनाओं के ससमय एवं शीघ्र समापन एवं कार्यान्वयन के लिए भी विशेषज्ञों द्वारा आवश्यक सुझाव दिए जाते रहें हैं।
नेपाल में पिछली एवं वर्तमान सरकारों ने कूटनीतिक स्तर पर अनेक प्रयास भी किये हैं, जैसे कि नेपाल निवेश समिट 2024[lxi], नेपाली शासनाध्यक्ष एवं परराष्ट्र मंत्री[lxii] का नेपाल के महत्वपूर्ण द्विपक्षीय विकास सहयोगी जैसे कि भारत[lxiii] एवं चीन[lxiv] के शासनाध्यक्षों एवं अन्य शिष्ट मंडली के साथ मुलाक़ात एवं विकास तथा सहयोग से सम्बंधित विभिन्न एम. ओ. यु.[lxv] [lxvi] [lxvii] पर हस्ताक्षर व आदान-प्रदान शामिल रहा है।
इनके अलावे पिछले 8 महीनों में नेपाल के प्रधान मंत्री एवं विदेश मंत्री के द्विपक्षीय विदेशी दौरों के दौरान भी नेपाल के विकास के क्षेत्रों में निवेश, सहयोग एवं नए आयामों की तलाश की बात प्रमुखता लिए रही है। हालांकि, इन तमाम कोशिशों के बावजूद नेपाल पर्याप्त मात्र में वैदेशिक निवेश आकर्षित करने में पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सका है। साथ ही, हाल ही में चीन के साथ हुए बेल्ट एंड रोड कोऑपरेशन फ्रेम्वर्क समझौता भी कोई महत्वपूर्ण समाधान नहीं लेकर आया जिसका असर तात्कालिक रूप से नेपाल की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में हो।[lxviii] इसके विपरीत, मीडिया रिपोर्ट्स एवं विदेश तथा आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार यह समझौता अपने आप में ही उलझन उत्पन्न करने वाला है, साथ ही वर्तमान गठबंधन सरकार के प्रमुख घटक दलों के नेताओं के मध्य भी इस से सम्बंधित मतभेद रहे हैं[lxix] जिससे इसके कर्यांन्वयन पर भी अभी स्पष्टता नहीं दिख रही।
हाल ही में, संयुक्त राज्य अमेरिका में हुए चुनाव एवं डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व वाली सरकार के गठन के पश्चात, ट्रम्प प्रशासन द्वारा लिए गए दो बड़े निणर्य नेपाल के अर्थव्यवस्था के समक्ष भी समस्याएं ले कर उपस्थित हुए हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प ने अमेरिका द्वारा समर्थित यूएस एड (USAID) परियोजनाओं को रोकने और नए अनुदान (ग्रांट्स) या सहायता को पूरी तरह से बंद करने का कार्यकारी आदेश दिया है। सन 1951 से ही यूएसएआईडी से नेपाल को आर्थिक सहायता मिलती रही है। यूएस एड विशेष रूप से स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, बुनियादी ढांचा, मानवीय सहायता और महिलाओं एवं बच्चों के सशक्तिकरण और स्थानीय विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है।[lxx] विशेषज्ञों के अनुसार ट्रम्प के इस निर्णय से नेपाल के इन सभी परियोजनाओं पर असर पड़ेगा। हाल के मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार नेपाल में स्वास्थ्य सम्बंधित गतिविधियाँ प्रभावित होनी शुरू हो चुकी हैं।[lxxi]
ट्रंप प्रशासन का दूसरा फैसला मिलेनियम चैलेंज कॉर्पोरेशन (MCC) के भुगतान में रोक लगाना है जिसके कारण नेपाल पर इसका विशेष प्रभाव पड़ा है। MCC नेपाल कम्पैक्ट के तहत वित्त पोषित गतिविधियों से संबंधित भुगतान रोक दिए गए हैं। कम्पैक्ट में 315 किलोमीटर लंबी 400kV ट्रांसमिशन लाइन और सड़क उन्नयन का निर्माण शामिल है जिसके लिए MCC के तहत $500 मिलियन की राशि आवंटित की गई थी, साथ ही हाल ही में, MCC बोर्ड ने कम्पैक्ट के लिए अतिरिक्त $50 मिलियन को मंजूरी दी थी।[lxxii] इस निलंबन से नेपाल के विकास कार्य प्रभावित हो रहें हैं। यद्यपि यह निलंबन फिलहाल 90 दिनों के लिए बताया जा रहा है, तो भी इससे अनिश्चितता की स्थिति तो बन ही गई है। नेपाल द्वारा सितंबर 2017 में MCC कम्पैक्ट पर हस्ताक्षर करने और फरवरी 2022 में संसद द्वारा अनुमोदित करने के दौरान राजनीतिक दलों के मध्य काफ़ी विभेद भी रहा है। साथ ही कुछ राजनीतिक दलों और नागरिक समाज समूहों द्वारा विरोध का सामना करना पड़ा है। विरोध करने वालों की प्रमुख चिंताएं नेपाल की संप्रभुता, अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति और नेपाल की चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों को संभावित रूप से कमजोर करने पर केंद्रित रहीं हैं।[lxxiii] [lxxiv] विवाद का एक प्रमुख मुद्दा यह भी रहा है कि एमसीसी अनुदान शर्त-आधारित होती हैं उदहारण के तौर पर – चुनावी प्रक्रिया की गुणवत्ता, राजनीतिक बहुलवाद और भागीदारी, सरकारी भ्रष्टाचार और पारदर्शिता, और जातीय समूहों के साथ निष्पक्ष व्यवहार आदि। ये शर्तें बाहर से देखने में सही दिखती हैं, लेकिन यह दाता देश के प्राप्तकर्ता देश के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप के संकेत भी देती है।
एमसीसी अनुदान के रोक ने वर्तमान सरकार के समक्ष अन्य आर्थिक चुनौती खड़ी कर दी है, जैसे कि MCC परियोजनाओं के लिए जो कार्य पहले से ही प्रारंभ हो चुके हैं उन्हें पूरा करना सरकार का एक कानूनी दायित्व बन जाता है, किन्तु यदि एमसीसी अनुदान पर से रोक नहीं हटती है तो सरकार को वैकल्पिक वित्तीय स्रोतों की तलाश करनी होगी।
इसके अलावे नेपाल नवंबर 2026 में अल्प विकसित राज्य कि श्रेणी से उत्तीर्ण होगा ऐसे में इस बदलाव के कारण अंतरराष्ट्रीय अनुदान, रियायती ऋण, अल्प-व्यापार शुल्क और तकनीकी सहायता जैसे कई विशेषाधिकार जो एक अल्प-विकसित देश को मिलती हैं, खत्म हो सकती हैं। इस प्रकार नेपाल एक नए आर्थिक संक्रमणकाल (इकोनॉमिक ट्रांजीशन) की तरफ बढ़ रहा है और यह भी एक मुख्य आर्थिक चुनौती ही होगी।[lxxv] आगामी समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वर्तमान सरकार नेपाल के प्रमुख विकास साझीदारों के साथ अपनी विकास कूटनीति को कितने प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने में सक्षम हो पाती है।
संवैधानिक संशोधन का प्रश्न
इस सहमती सरकार का एक और मत्वपूर्ण मुद्दा संवैधानिक संशोधन का है। लगभग एक दशक लम्बे चले गृह युद्ध के बाद शांति निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुयी और 2007 में अंतरिम सविधान लाया गया। जिसके बाद 2008 में प्रथम संविधान सभा का गठन हुआ जो संविधान प्रदान करने में सफल न हो सका, तत्पश्चात दूसरे संविधान सभा का गठन 2013 में किया गया। दूसरे संविधान सभा द्वारा नेपाल का नया संघीय गणतांत्रिक संविधान पारित हुआ एवं 15 सितम्बर 2015 को लागू किया गया। लगभग एक दशक बीतने और दो आम चुनावों के पश्चात् नेपाल में संवैधानिक संशोधन को लेकर विमर्श तेज़ हुआ है। संवैधानिक संशोधन के अहम मुद्दे चुनावी प्रणाली, प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित कार्यकारी प्रमुख, तथा संघवाद और धर्मनिरपेक्षता आदि रहें हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों एवं विशेषज्ञों के अनुसार संवैधानिक संशोधन से नेपाल में राजनीतिक स्थिरता एवं विकास के लिए मार्ग प्रष्ट होगा।
संविधान संशोधन के सन्दर्भ में यहाँ चार सबसे महत्वपूर्ण बातें ध्यान देने योग्य हैं। सर्वप्रथम, सरकार के संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत का होना। दूसरा, संशोधन के मुद्दों पर सभी महत्वपूर्ण राजनितिक दलों की आम समझ होना। तीसरे, कि संशोधन के नाम पर पहले से ही वंचित शोषित वर्ग के अधिकारों, उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शक्तिओ के विकेंद्रीकरण एवं राज्य के संघीय ढांचे में छेड़-छाड़ न हो सके। चौथा एवं सबसे महत्वपूर्ण कि संविधान संशोधन के सन्दर्भ में सरकार की गंभीरता।
जहाँ बात संसद के दोनों सदनों में 2/3 बहुमत होने की है, वर्तमान सरकार के पास दोनों सदनों - प्रतिनिधि सभा (निम्न सदन) एवं राष्ट्रिय सभा (उच्च सदन) में ऐसा नहीं है (तालिका 2 एवं 3)। यदि वर्तमान सरकार किसी प्रकार बाह्य समर्थन देने वाले दलों के सहयोग से निम्न सदन में आवश्यक दो तिहाई बहुमत ले भी आती है तो भी उच्च सदन में यह दूर-दूर तक संभव होते नहीं दिख रहा है।
तालिका 2. राजनीतिक दलों की प्रतिनिधि सभा में सदस्य संख्या
|
क्र.सं. |
राजनीतिक दल |
सत्ता /विपक्ष |
सदस्य संख्या |
|
1 |
नेपाली काँग्रेस |
सत्ता |
88 |
|
2 |
नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (एमाले) |
सत्ता |
79 |
|
3 |
जनता समाजवादी पार्टी |
सत्ता |
7 |
|
4 |
लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी नेपाल |
सत्ता |
4 |
|
5 |
नागरिक उन्मुक्ति पार्टी |
सत्ता |
4 |
|
कुल |
182 |
||
|
6 |
जनमत पार्टी |
बाह्य समर्थन |
6 |
|
7 |
जनता समाजवादी पार्टी, नेपाल |
बाह्य समर्थन |
5 |
|
8 |
स्वतन्त्र |
बाह्य समर्थन |
2 |
|
कुल |
13 |
||
|
9 |
नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (माओवादी केन्द्र) |
विपक्ष |
32 |
|
10 |
राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी |
विपक्ष |
21 |
|
11 |
राष्ट्रिय प्रजातन्त्र पार्टी |
विपक्ष |
14 |
|
12 |
नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (एकीकृत समाजवादी) |
विपक्ष |
10 |
|
13 |
नेपाल मजदुर किसान पार्टी |
विपक्ष |
1 |
|
14 |
राष्ट्रिय जनमोर्चा |
विपक्ष |
1 |
|
15 |
आम जनता पार्टी |
विपक्ष |
1 |
|
|
कुल |
80 |
|
|
कुल |
275 |
||
स्रोत: नेपाल संसद के ऑफिसियल वेबसईट[lxxvi] से प्राप्त आंकड़ो के आधार पर लेखक द्वारा तैयार किया गया
तालिका 3. राजनीतिक दलों की राष्ट्रिय सभा में सदस्य संख्या
|
क्र.सं. |
राजनीतिक दल |
सत्ता /विपक्ष |
सदस्य संख्या |
|
1 |
नेपाली काँग्रेस |
सत्ता |
16 |
|
2 |
नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (एमाले) |
सत्ता |
10 |
|
3 |
लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी नेपाल |
सत्ता |
1 |
|
कुल |
27 |
||
|
4 |
जनता समाजवादी पार्टी, नेपाल |
बाह्य समर्थन |
3 |
|
|
|||
|
5 |
नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (माओवादी केन्द्र) |
विपक्ष |
17 |
|
6 |
नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (एकीकृत समाजवादी) |
विपक्ष |
8 |
|
7 |
राष्ट्रिय जनमोर्चा |
विपक्ष |
1 |
|
कुल |
26 |
||
|
8 |
मनोनीत |
- |
3* |
|
कुल |
59 |
||
स्रोत: नेपाल संसद के ऑफिसियल वेबसईट[lxxvii] से प्राप्त आंकड़ो के आधार पर लेखक द्वारा तैयार किया गया
*कुल 3 मनोनीत सदस्यों में से एक- एक एमाले एवं माओवादी केंद्र के हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण विषय संवैधानिक संशोधन के लिए ‘सर्वसम्मति की राजनीति’ है जो विरोधाभासों से भरी है। जहाँ एक ओर नेकपा-एमाले एवं नेपाली कांग्रेस के मध्य स्वयं ही कई मुद्दों पर मतभेद रहें हैं, वहीं अन्य राष्ट्रिय एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के विचार भी संविधान संशोधन के मामले में भिन्न-भिन्न हैं। विभिन्न राजनितिक दलों के मध्य कई संवैधानिक प्रावधानों पर असंतोष और असहमति है, जिसमें आदिवासी जनजाति, दलितों, महिलाओं, अपंग व्यक्तियों और अन्य हाशिए के समुदायों के प्रतिनिधित्व का मुद्दा शामिल है। इसके साथ ही प्रांतीय सीमाओं के सीमांकन पर भी असहमति है। ऐसे में उनके मध्य साम्य स्थापित कर संवैधानिक संशोधन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना कठिन कार्य है। इस प्रकार वर्तमान सरकार राजनीतिक दलों के मध्य आम समझ स्थापित करने में असमर्थ दिख रही है एवं निकट भविष्य में भी इस पर किसी प्रकार की उम्मीद नहीं दिख रही है।
हालाँकि, दोनों सत्तारूढ़ दलों - कांग्रेस एवं एमाले के प्रतिनिधियों के साथ वर्तमान सरकार द्वारा दिसंबर 2024 में संविधान संशोधन के क्षेत्रों की पहचान एवं विमर्श के सन्दर्भ में एक आठ-सदस्यीय टास्क फोर्स गठित किया गया है।[lxxviii] सत्ताधारी दलों के नेताओं के अनुसार संवैधानिक संशोधन में देरी नहीं की जाएगी, हालाँकि, सरकार पहले दोनों प्रमुख सत्तारूढ़ दलों के साथ संशोधन के एजेंडे और बिंदुओं चर्चा करेगी, पश्चात, सरकार विपक्षी दलों के साथ अलग से बातचीत करेगी और उसके ही मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर एजेंडा बनाया जाएगा।[lxxix]
इसके अलावे विभिन्न अन्य राजनीतिक दलों द्वारा भी संविधान संशोधन के सन्दर्भ में टास्क फ़ोर्स का गठन किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के द्वारा जनवरी 2025 में संविधान संशोधन सुझाव टास्क फोर्स का गठन किया गया है, जिसका उद्देश्य प्रदेश स्तर पर प्रमुख हितधारकों एवं संविधान विशेषज्ञों के साथ विमर्श एवं संशोधन के विषय पर जनमत तैयार करना है।[lxxx] वहीं माधेशी दलों द्वारा भी जनवरी 2025 में आठ-सदस्यीय टास्क फोर्स समिति का गठन किया गया है, जिसमे जनता समाजवादी पार्टी-नेपाल (जेएसपी-एन), लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी नेपाल (एलएसपी-एन), जनमत पार्टी, जनता समाजवादी पार्टी (जेएसपी), नागरिक उन्मुक्ति पार्टी (एनयूपी), जनता प्रगतिशील पार्टी (जेपीपी), तराई मधेश लोकतांत्रिक पार्टी (टीएमएलपी) और राष्ट्रिय मुक्ति पार्टी (आरएमपी) शामिल हैं।[lxxxi] इन दलों के चिंता का प्रमुख विषय संविधान संशोधन द्वारा अनुपातिक प्रणाली द्वारा प्राप्त मतों के आधार पर मिलने वाले सीटों के लिए मत प्राप्ति की सीमा बढ़ाने और आनुपातिक चुनाव प्रणाली को खत्म करने की बात है।[lxxxii] इसी चर्चा ने मधेश-केंद्रित पार्टियों को एकजुट होने के लिए प्रेरित किया है। विशेषज्ञों के अनुसार मधेश-केंद्रित दल सीमा प्रतिशत बढ़ाए जाने पर अपने राजनीतिक भविष्य के लिए डर से एकजुट हो रही हैं।[lxxxiii]
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि चुनाव अधिनियम के अनुसार वर्तमान में, प्रांतीय विधानसभाओं में आनुपातिक प्रतिनिधित्व के तहत कुल वैध मतों का न्यूनतम 1.5 प्रतिशत एवं संघीय स्तर पर तीन प्रतिशत प्राप्त करने वाली पार्टियों को ही सीटें दी जाती हैं। जिसके फलस्वरूप ऐसे अनेक छोटे दलों की पहुँच विधायिका तक हो जाती है जिनकी जमीनी स्तर व्यापक पहुँच नहीं होती एवं जो विचारधारा, उद्देश्यों एवं मुद्दों पर भी कोई स्पष्टता लिए नहीं होतीं। हालाँकि सीट प्राप्ति के पश्चात, गठबंधन की राजनीति और सरकारों के बनाने-गिराने के खेल में इनकी भूमिका मुख्य हो जातीं है और इस प्रकार ये राजनीतिक सौदेबाजी के मुख्य पात्र बन जाते हैं। प्रतिनिधि सभा के लिए सीमा अनुपात को बढ़ाकर 5 प्रतिशत और प्रांतीय विधानसभाओं के लिए बढ़ाकर 3 प्रतिशत करने से पार्टियों को बहुमत प्राप्त करने और अपने क्षेत्र में राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
इसके अलावा संशोधन के अन्य मुद्दों जैसे राष्ट्रपति का चुनाव प्रत्यक्ष हो, नेपाल का पुनः हिन्दू राष्ट्र घोषित किया जाना, संघीय व्यवस्था को समाप्त करना आदि जैसे मुद्दों पर भी राजनीतिक दलों एवं विभिन्न दलों के भीतर भी मतभेद है, जो इस बात को दर्शाता है कि नेपाल में संवैधानिक संशोधन का मार्ग सरल नहीं है।
विश्लेषण
ऐसा प्रतीत होता है कि नेपाल बार-बार एवं लगातार एक के बाद एक होते रहे परिवर्तनों के कारण कभी ख़त्म न होने वाले राजनीतिक संक्रमण-चक्र में फंस गया है, एवं इससे निकलने का मार्ग नहीं ढूंढ पा रहा।
नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता की समस्या किसी गठबंधन सरकार के बनाने से नहीं है, अपितु बार-बार राजनीतिक महत्वाकांक्षा व सत्ता की लालसा के कारण गठबंधन सरकारों के बदलने एवं दलीय राजनीति के कारण प्रभावित होती रही है। फलस्वरूप, सरकार बनाने के लिए दलीय गठबंधन बनते-बदलते रहे हैं। इससे न केवल संघीय स्तर, अपितु, प्रदेश स्तर पर भी लगातार सरकार एवं मंत्रिमंडल बदलते रहे हैं, और इस प्रकार राजनीतिक अस्थिरता का माहौल रहा है।
यहाँ अनुपातिक चुनाव प्रणाली को नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता के लिए दोष देना भी ठीक नहीं है, क्योंकि अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के कारण ही समाज के कई वंचित एवं पिछड़े तबकों से लोगों का राजनीति में आना शुरू हुआ है, उनका प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सका है। बल्कि राजनीतिक अस्थिरता के लिए सत्ता की पिपासा एवं व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा ही कारक हैं।
गठबंधन की राजनीति में दलों के बीच सत्ता के बंटवारे में काफी उठा-पटक होती रही है, जो न केवल राजनीतिक अस्थिरता, अपितु आर्थिक एवं नीतिगत अस्थिरता को भी जन्म और बढ़ावा देती रही है। परिणामस्वरूप देश की अर्थव्यवस्था व्यापक रूप से प्रभावित होती रही है। वहीं हाल में अमरीका द्वारा दिए जाने वाले सहायता एवं अनुदान पर रोक की वजह से देश के विकास के विभिन्न क्षेत्रों एवं अर्थव्यवस्था पर और प्रभाव पड़ने कि संभावना बढ़ी है, जिसके संकेत भी आने लगे हैं। साथ ही, अगले वर्ष यदि ऐसी ही स्थिति में नेपाल अल्प-विकसित राष्ट्र कि श्रेणी से उत्तीर्ण होकर एक नए आर्थिक संक्रमणकाल (इकोनॉमिक ट्रांजीशन) की तरफ बढ़ता है, तो आर्थिक एवं विकास क्षेत्र पर और भी चुनौतियों के आने की संभावना बढ़ जाएगी।
संघवाद के आने और संघीय गणतांत्रिक संविधान के लागू होने के लगभग 10 वर्ष पश्चात भी पूर्ण रूप से संविधान का लागू न होना भी एक अहम मुद्दा है जिसके कारण नेपाल राजनीतिक उथल-पुथल से नहीं निकल पा रहा है।
तत्काल में हुई एवं हो रहीं राजनीतिक गतिविधियों से यह कयास लगाये जा रहें हैं कि नेपाल संभवतः राजतन्त्र की तरफ लौट सकता है और किसी भी संभावित राजनीतिक परिवर्तन के लिए तैयार रहना चाहिए। हालाँकि ऐसा हो पाना अब संभव नहीं है, इसका सबसे बड़ा कारण है कि नेपाल में लोकतान्त्रिक राजनीतिक संस्कृति की जड़ें पिछले 35 वर्षों में लगातार मजबूत होती रहीं हैं। नेपाल यकायक राजतन्त्र से गणतंत्र और एकात्मक से संघात्मक राजनीतिक व्यवस्था में तब्दील नहीं हुआ है, बल्कि, दशकों चले संघर्षों, आंदोलनों और राजनीतिक चेतना के विकास के क्रम में हुआ है। नेपाल में संविधानवाद एवं लोकतान्त्रिक आंदोलनों का एक अपना लम्बा इतिहास रहा है। वर्तमान में राजतन्त्र-समर्थक प्रदर्शनों का होना भी अपने आप में यह दर्शाता है कि नेपाल में लोकतान्त्रिक मूल्य गहरे होते रहें हैं और असहमति, वाद-विवाद एवं विमर्श की राजनीतक संस्कृति व्यापक रूप से दृश्य है।
वहीं यदि अन्तर्रष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि पिछले कुछ शताब्दियों, और विशेष रूप से द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात, विश्व के विभिन्न देश राजतंत्र से गणतंत्र की ओर अग्रसर हुए हैं। नेपाल के निकटतम पड़ोसी देश भारत का इतिहास भी इसका साक्षी रहा है। इस दृष्टिकोण से, नेपाल में किसी प्रकार राजतंत्र की पुनः स्थापना की मांग वर्तमान समय के अनुकूल नहीं है। वर्ष 2008, विश्व के अंतिम हिन्दू राजशाही राष्ट्र के रूप में नेपाल का अंतिम वर्ष था।
वैकल्पिक राजनीति की तलाश करने वाले वर्ग वर्तमान में बहुचर्चित युवा नेताओं को एकत्रित करने के प्रयास में हैं, और संभवतः वे एक नए राजनीतिक दल के गठन की दिशा में अग्रसर हैं। हालांकि, वर्तमान राजनीतिक परिवेश में नेपाल में किसी नए दल का गठन अपने आप में चुनौतीपूर्ण कार्य है। सर्वप्रथम बहुचर्चित छवि वाले युवा स्वतंत्र रूप से कार्य करना पसंद करते हैं, दुसरे यदि ऐसा कोई दल बन भी जाता है, तो उसे जमीनी स्तर पर अपनी जड़ें स्थापित करने में बहुत समय लग सकता है। इस चुनौती को वरिष्ठ बुद्धिजीवी नागरिक वर्ग के मार्गदर्शन में हल करने की कोशिश की जा सकती है।
साथ ही, यह भी ध्यान देने योग्य है कि अन्य पारंपरिक राजनीतिक दलों में भी युवा नेतृत्व का उदय हो रहा है। हालांकि, इन दलों के वरिष्ठ नेतृत्व द्वारा पद और सत्ता की लालसा को न त्यागने के कारण इन दलों के भीतर आंतरिक कलह और असहमति उत्पन्न हो रही है। इस संदर्भ में, आनेवाले दिनों में यह देखने योग्य होगा कि क्या युवा नेतृत्व इन दलों के भीतर प्रभावी स्थान स्थापित कर पता है और क्या इन दलों की लोकप्रियता, जो वर्तमान में घट रही है, को पुनर्जीवित करने में सफल हो पाता है। साथ ही यदि ऐसा संभव हो पाता है तो क्या नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता और संक्रमण-काल का चक्र (लूप) ख़त्म हो पाता है या नहीं। ये तमाम प्रश्न नेपाल के भविष्य की राजनीति की दिशा और विकास के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, और इसका उत्तर आने वाले समय में ही स्पष्ट हो पायेगा।
निष्कर्ष
सत्ता में आने से लेकर अबतक नौ महीने बीत चुके हैं और कांग्रेस-एमाले गठबंधन सरकार राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक स्थिरता एवं सुदृढ़ीकरण तथा संवैधानिक संशोधन, इन तीनो बिन्दुओं पर सफल होती नहीं दिख रही है। दूसरी तरफ आम जनता निरंतर चल रही राजनीतिक उथल-पुथल से ऊब चुकी है और धीरे-धीरे पुराने राजनीतिक नेतृत्व से उनका विश्वास उठता जा रहा है। इसी क्रम में वैकल्पिक राजनीति, हिन्दू-राष्ट्रवादी तथा राजतन्त्र-समर्थक राजनीतिक दलों एवं कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में आम जन अलग-अलग प्रदर्शनों में शामिल हुए हैं। हालाँकि, वृहत स्तर पर आम जनमानस में नेपाल के गणतंत्रीय व्यवस्था को समाप्त कर पुनः राजतन्त्र की तरफ जाने के कोई संकेत नहीं हैं। तो भी, वर्तमान सरकार के समक्ष यह एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय है। इसके साथ ही नेपाल में अगला संसदीय चुनाव 2027 के अंत में होना है और उससे पहले नेपाल का अल्प-विकसित राष्ट्र की श्रेणी से उत्तीर्ण होने का समय नवम्बर 2026 में संभावित है। ऐसे में नेपाल पुनः किसी बड़े परिवर्तन और किसी अन्य राजनीतिक-संक्रमण के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं दिख रहा है।
*****
*डॉ. सुबोध चंद्र भारती, रिसर्च एसोसिएट, भारतीय वैश्विक परिषद, नई दिल्ली
अस्वीकरण: व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण
[i] कान्तिपुर. “कांग्रेस-एमालेबीच सत्ता गठबन्धन गर्ने सहमति, ओली र देउवा आलोपालो प्रधानमन्त्री”. कान्तिपुर. जून 30, 2024. https://ekantipur.com/news/2024/07/01/an-agreement-to-form-a-power-alliance-between-congress-and-uml-35-38.html (जुलाई 30, 2024 को एक्सेस किया गया).
[ii] सेतोपाटी. “यस्तो छ कांग्रेस र एमालेबीच भएको ७ बुँदे सहमति (भिडिओ).” सेतोपाटी. जुलाई 22, 2024.
https://www.setopati.com/politics/334752#:~:text=यस्ता%20छन्%20सहमतिका%20बुँदा%3A&text=आम%20जनताको%20चाहनाबमोजिम%20राष्ट्रिय%20हितको,२. (जुलाई 30, 2024 को एक्सेस किया गया).
[iii] Subodh C. Bharti. “Coalition Politics, Political Jolts and Uncertainty in Nepal.” Indian Council of World Affairs, June 27, 2024. /show_content.php?lang=1&level=3&ls_id=11030&lid=7005 (Accessed December 12, 2024).
[iv] Ibid.
[v] Ibid.
[vi] Krishna Hechhethu. "Political Parties of Nepal." (Baha Occasional Papers, Social Science Baha, Kathmandu 2006). https://soscbaha.org/wp-content/uploads/2019/11/political-parties-of-nepal.pdf (Accessed on January 02, 2025).
[vii] Sujeet Karn. "Political Parties, Old and New." in Deepak Thapa and Alexander Ramsbotham (eds.) Two Steps Forward, One Step Back: The Nepal Peace Process (London: Conciliation Resources, 2017), PP. 68-71. https://www.politicalsettlements.org/wp-content/uploads/2018/09/2017_CRAccord_Nepal.pdf (Accessed on January 02, 2025).
[viii] The Kathmandu Post. "Bhim Rawal vows nationwide campaign against KP Oli’s ‘authoritarian repression’." The Kathmandu Post. December 27, 2024. https://kathmandupost.com/national/2024/12/27/bhim-rawal-vows-nationwide-campaign-against-kp-oli-s-authoritarian-repression (Accessed on December 31, 2024).
[ix] The Kathmandu Post. "Oli’s autocratic bent." The Kathmandu Post. October 23, 2024. https://kathmandupost.com/editorial/2024/10/23/oli-s-autocratic-bent (Accessed on December 12, 2024).
[x] Shishir Dhaka. "Understanding the ordinance and controversy around it." Nepal News. January 22, 2025. https://nepalnews.com/s/long-reads/understanding-the-ordinance-and-controversy-around-it/" (Accessed on January 23, 2025).
[xi] किशोर दहाल. "अध्यादेशको शासन.” कान्तिपुर. जनवरी 13,2025. https://ekantipur.com/opinion/2025/01/13/rule-of-ordinance-58-16.html (जनवरी 22, 2025 को एक्सेस किया गया).
[xii] The Kathmandu Post. "Oli defends ordinances in Parliament, says legal reforms were urgent." The Kathmandu Post. January 31, 2025. https://kathmandupost.com/politics/2025/01/31/oli-defends-ordinances-in-parliament-says-legal-reforms-were-urgent (Accessed on January 31, 2025).
[xiii] Anurag Acharya. "Ghosts of Panchayat and angry young Nepal." The Kathmandu Post. March 18, 2025. https://kathmandupost.com/columns/2025/03/18/ghosts-of-panchayat-angry-nepal (March 18, 2025).
[xiv] नेपाल में मीडिया नवाचार, क्षमता निर्माण और आंकड़े पर आधारित निर्णय-निर्माण को बढ़ावा देने के लिए समर्पित एक अग्रणी मीडिया संस्थान।
[xv] Sharecast initiative Nepal. "National Opinion Poll 2025." 2025. https://sharecast.org.np/national-opinion-poll-2025/ (Accessed January 24, 2025).
[xvi] Subodh C. Bharti. “Coalition Politics, Political Jolts and Uncertainty in Nepal.” Indian Council of World Affairs, June 27, 2024. /show_content.php?lang=1&level=3&ls_id=11030&lid=7005 (Accessed December 12, 2024).
[xvii] Subodh C. Bharti. “Nepal: Economy in Disarray- Challenges and Concerns.” Defence and Diplomacy. vol. 14, no. 1 (2024), pp. 105–115.
[xviii] Anurag Acharya. "Ghosts of Panchayat and angry young Nepal." The Kathmandu Post. March 18, 2025. https://kathmandupost.com/columns/2025/03/18/ghosts-of-panchayat-angry-nepal (March 18, 2025).
[xix] Ibid.
[xx] Santosh Singh and Shiva Puri. "Frequent transfers of chief administrative officers cripple Madhesh local units." The Kathmandu Post. March 17, 2025. https://kathmandupost.com/province-no-2/2025/03/17/frequent-transfers-of-chief-administrative-officers-cripple-madhesh-local-units (Accessed on March 17, 2025).
[xxi] Ibid.
[xxii] Pawan Adhikari. “The erosion of morality in Nepali politics," My Republica, May 15, 2024, https://myrepublica.nagariknetwork.com/news/the-erosion-of-morality-in-nepali-politics/?categoryId=opinion (Accessed December 17, 2024).
[xxiii] Anurag Acharya. "Ghosts of Panchayat and angry young Nepal." The Kathmandu Post. March 18, 2025. https://kathmandupost.com/columns/2025/03/18/ghosts-of-panchayat-angry-nepal (March 18, 2025).
[xxiv] Ibid.
[xxv] Asian News International. "Hundreds take to streets in Kathmandu supporting return of constitutional monarchy." Hindustan Times. December 05, 2020. https://www.hindustantimes.com/world-news/hundreds-take-to-streets-in-kathmandu-supporting-return-of-constitutional-monarchy/story-td0dQQUUsg42oNNDgAhauL.html (Accessed on January 13, 2025).
[xxvi] Santosh Sharma Poudel. "In Nepal, Calls Grow for the Restoration of a Hindu State." The Diplomat. December 09, 2021. https://thediplomat.com/2021/12/growing-calls-for-restoring-hindu-state-in-nepal/ (Accessed on January 13, 2025).
[xxvii] Kamal Dev Bhattarai. "Is Nepal’s Secularism Under Threat?." The Diplomat. September 01, 2021. https://thediplomat.com/2021/09/is-nepals-secularism-under-threat/ (Accessed on January, 12, 2025.)
[xxviii] Arun Budhathoki. "Nepal nationwide protests to call for restoration of monarchy." NIKKEI Asia. December 02, 2020. https://asia.nikkei.com/Politics/Nepal-nationwide-protests-to-call-for-restoration-of-monarchy (Accessed on January 12, 2025).
[xxix] Vivek Chhetri. "Industrialist's Hindu pitch shakes Nepal politics, calls for restoration of monarchy." The Teligraph Online. November 23, 2023. https://www.telegraphindia.com/west-bengal/industrialist-durga-kumar-prasais-hindu-pitch-shakes-nepal-politics-calls-for-restoration-of-monarchy/cid/1981966 (Accessed on Januray 12, 2025).
[xxx] Binod Ghimire. "Upcoming UML-Durga Prasai showdown puts government on security alert." The Kathmandu Post. November 19, 2023. https://kathmandupost.com/politics/2023/11/19/upcoming-uml-durga-prasai-showdown-puts-government-on-security-alert." (Accessed on January 15, 2025).
[xxxi] Disha Bagchi. "Pro-monarchy stir rocks Kathmandu, protesters demand Nepal be declared ‘Hindu’ state." The Print. November 24, 2023. https://theprint.in/world/pro-monarchy-stir-rocks-kathmandu-protesters-demand-nepal-be-declared-hindu-state/1857945/ (Accessed on January 15, 2025).
[xxxii] The Kathmandu Post. “Monarchists organise rallies to welcome former king Gyanendra in Kathmandu." The Kathmandu Post. March 09, 2025. https://kathmandupost.com/visual-stories/2025/03/09/monarchists-organise-rallies-to-welcome-former-king-gyanendra-in-kathmandu (Accessed on March 09, 2025).
[xxxiii] Anil Giri. "Mainstream parties struggle to respond as pro-monarchy forces hit the streets." The Kathmandu Post. March 09, 2025. https://kathmandupost.com/politics/2025/03/09/mainstream-parties-struggle-to-respond-as-pro-monarchy-forces-hit-the-streets (Accessed on March 09, 2025).
[xxxiv] Ibid.
[xxxv] Ibid.
[xxxvi] Purushottam Poudel. “Movement to revive kingdom divided even before it gets a shape.’ The Kathmandu Post. March 18, 2025. https://kathmandupost.com/politics/2025/03/18/movement-to-revive-kingdom-divided-even-before-it-gets-a-shape (Accessed on March 18, 2025).
[xxxvii] The Kathmandu Post. "Two dead, 45 injured in violent clashes in Kathmandu." The Kathmandu Post. March 28, 2025. https://kathmandupost.com/national/2025/03/28/two-dead-45-injured-in-violent-clashes-in-kathmandu (Accessed on March 28, 2025).
[xxxviii] Medha Singh. "Monarchy Movement In Chains: Nepal Govt House Arrests Pro-Monarchy Leader Nawaraj Subedi." Republic. March 30, 2025. https://www.republicworld.com/world-news/monarchy-movement-in-chains-nepal-govt-house-arrests-pro-monarchy-leader-nawaraj-subedi (Accessed on March 30, 2025).
[xxxix] Purushottam Poudel. "Parties accuse ex-king of plotting against the republic." The Kathmandu Post. March 31, 2025. https://kathmandupost.com/politics/2025/03/31/parties-accuse-ex-king-of-plotting-against-the-republic (Accessed on March 31, 2025).
[xl] Medha Singh. "Monarchy Movement In Chains: Nepal Govt House Arrests Pro-Monarchy Leader Nawaraj Subedi." Republic. March 30, 2025. https://www.republicworld.com/world-news/monarchy-movement-in-chains-nepal-govt-house-arrests-pro-monarchy-leader-nawaraj-subedi (Accessed on March 30, 2025).
[xli] Purushottam Poudel. “Movement to revive kingdom divided even before it gets a shape.’ The Kathmandu Post. March 18, 2025. https://kathmandupost.com/politics/2025/03/18/movement-to-revive-kingdom-divided-even-before-it-gets-a-shape (Accessed on March 18, 2025).
[xlii] Purushottam Poudel. "RPP demonstration peaceful but much smaller in size." The Kathmandu Post. April 09, 2025. https://kathmandupost.com/politics/2025/04/09/rpp-demonstration-peaceful-but-much-smaller-in-size (Accessed on April 09, 2025).
[xliii] Ibid.
[xliv] कान्तिपुर. “प्रहरीले भन्याे, दुर्गा प्रसाइ र उनका अंगरक्षक दिपक खड्का पक्राउ परे.” कान्तिपुर. अप्रैल 11, 2025. https://ekantipur.com/news/2025/04/11/police-said-durga-prasai-and-her-bodyguard-deepak-khadka-were-arrested-39-03.html (अप्रैल 11, 2025 को एक्सेस किया गया).
[xlv] Purushottam Poudel. “Movement to revive kingdom divided even before it gets a shape.’ The Kathmandu Post. March 18, 2025. https://kathmandupost.com/politics/2025/03/18/movement-to-revive-kingdom-divided-even-before-it-gets-a-shape (Accessed on March 18, 2025).
[xlvi] Purushottam Poudel. "Congress reaffirms commitment to secular republic." The Kathmandu Post. March 24, 2025. https://kathmandupost.com/politics/2025/03/24/congress-reaffirms-commitment-to-secular-republic (Accessed on March 24, 2025).
[xlvii] The Kathmandu Post. "Socialist Front to hit the streets to deter reanimated royalists." The Kathmandu Post. March 16, 2025. https://kathmandupost.com/politics/2025/03/16/socialist-front-to-hit-the-streets-to-deter-reanimated-royalists (Accessed on March 16, 2025).
[xlviii] The Kathmandu Post. "RPP announces its own protest against secular federal republican set-up." The Kathmandu Post. March 26, 2025. https://kathmandupost.com/politics/2025/03/26/rpp-announces-its-own-protest-against-secular-federal-republican-set-up (Accessed on March 26, 2025).
[xlix] The Kathmandu Post. "Why so desperate?." The Kathmandu Post. March 16, 2025. https://kathmandupost.com/editorial/2025/03/16/why-so-desperate (Accessed on March 16, 2025).
[l] Ibid.
[li] Kathmandu Post. "Unified Socialist announces two-month-long protest programme." The Kathmandu Post. March 14, 2025. https://kathmandupost.com/politics/2025/03/14/unified-socialist-announces-two-month-long-protest-programmes-against-government (Accessed on March 14, 2025).
[lii] Ibid.
[liii] Ibid.
[liv] Thira Lal Bhusal. "Repolarisation of alternative forces is the right way forward." The Kathmandu Post. January 20, 2025. https://kathmandupost.com/interviews/2025/01/20/repolarisation-of-alternative-forces-is-the-right-way-forward (Accessed on January 20, 2025).
[lv] Ibid.
[lvi] Ibid.
[lvii] Subodh C. Bharti. “Nepal: Economy in Disarray- Challenges and Concerns.” Defence and Diplomacy. vol. 14, no. 1 (2024), pp. 105–115.
[lviii] Ibid.
[lix] Achyut Wagle. "The power of economic reform." The Kathmandu Post. December 31, 2024. https://kathmandupost.com/columns/2024/12/31/the-power-of-economic-reform (Accessed on January 2, 2025).
[lx] Thira Lal Bhusal. "Even 5 percent economic growth looks ambitious." The Kathmandu Post. September 30, 2024. https://kathmandupost.com/interviews/2024/09/30/even-5-percent-economic-growth-looks-ambitious (Accessed on December 19, 2024).
[lxi] Subodh C. Bharti. “‘Nepal Investment Summit’ and the Development Aspirations of Nepal.” Indian Council of World Affairs. May 03, 2024. /show_content.php?lang=1&level=3&ls_id=10817&lid=6881#:~:text=The%20objective%20of%20the%20Summit,to%20the%20opportunities%20in%20Nepal (Accessed on January 19, 2025).
[lxii] Government of India. "Visit of Minister for Foreign Affairs of Nepal, H.E Dr. Arzu Rana Deuba to India." Ministry of External Affairs, Government of India. August 19, 2024. https://www.mea.gov.in/press-releases.htm?dtl/38180/Visit+of+Minister+for+Foreign+Affairs+of+Nepal+HE+Dr+Arzu+Rana+Deuba+to+India (Accessed on March 01, 2025).
[lxiii] Government of India. "Prime Minister meets Prime Minister of Nepal." Ministry of External Affairs, Government of India. September 22, 2024. https://www.mea.gov.in/press-releases.htm?dtl/38333/Prime+Minister+meets+Prime+Minister+of+Nepal (Accessed on March 01, 2025).
[lxiv] Government of the People’s Republic of China. “Xi Jinping Meets with Nepali Prime Minister KP Sharma Oli.” Ministry of Foreign Affairs, The People’s Republic of China. December 30, 2024. https://www.fmprc.gov.cn/eng/xw/zyxw/202412/t20241218_11496213.html (Accessed on March 01, 2025).
[lxv] Government of India. “India and Nepal Deepen Science and Technology Partnership with New Agreement.” Press Information Bureau, Government of India. February 09, 2025. https://pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=2104672 (Accessed on February 10, 2025).
[lxvi] Government of India. "India and Nepal Sign Memorandum of Understanding to Strengthen Cooperation in Water, Sanitation, and Hygiene (WASH) Sector." Press Information Bureau, Government of India. March 03, 2025.https://pib.gov.in/PressReleseDetailm.aspx?PRID=2107809®=3&lang=1 (Accessed on March 04, 2025).
[lxvii] Government of Nepal. "Memorandum of Understanding (MOU) between the Government of Nepal and the Government of the People’s Republic of China on Cooperation under the Belt and Road Initiative." Ministry of Foreign Affairs, Government of Nepal. December 27, 2024.https://mofa.gov.np/content/654/memorandum-of-understanding--mou--between-the-government/ (Accessed on January 15, 2025).
[lxviii] Subodh C. Bharti. “Oli’s Visit to China: Attempt to Show Tilt towards Beijing?.” Indian Council of World Affairs. December 19, 2024. /show_content.php?lang=1&level=3&ls_id=12148&lid=7407 (Accessed on January 19, 2025).
[lxix] Ibid.
[lxx] Kishor Pradhan. "How USAID cut affects Nepal." Nepali Times. January 26, 2025. https://nepalitimes.com/news/how-usaid-cut-affects-nepal (Accessed on January 27, 2025).
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[lxxvi] नेपाल सरकार. “संसदीय दल हरु.” संघीय संसद सचिवालय, नेपाल सरकार. मई 08, 2024. https://hr.parliament.gov.np/np/parliamentary-parties (जनवरी २२, २०२५ को एक्सेस किया गया).
[lxxvii] नेपाल सरकार. “संसदीय दल हरु.” संघीय संसद सचिवालय, नेपाल सरकार. फ़रवरी 02, 2025. https://na.parliament.gov.np/np/parliamentary-parties (फ़रवरी २२, २०२५ को एक्सेस किया गया).
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[lxxix] The Rising Nepal. "Govt not against constitution amendment: Minister Gurung." The Rising Nepal. January 11, 2025. https://risingnepaldaily.com/news/55226 (Accessed on January 11, 2025).
[lxxx] The Kathmandu Post. “RSP forms task force for constitution amendment suggestions.” The Kathmandu Post. January 05, 2025. https://kathmandupost.com/national/2025/01/05/rsp-forms-task-force-for-constitution-amendment-suggestions (Accessed on January 11, 2025).
[lxxxi] Bal Krishna Sah. "Madhesh-centric parties form task force." The Himalayan Times. January 31, 2025. https://thehimalayantimes.com/nepal/madhesh-centric-parties-form-task-force (Accessed on January 31, 2025).
[lxxxii] Ibid.
[lxxxiii] Bal Krishna Sah. "Madhesh-centric parties form task force." The Himalayan Times. January 31, 2025. https://thehimalayantimes.com/nepal/madhesh-centric-parties-form-task-force (Accessed on January 31, 2025).