सारांश: दुर्लभ मृदा धातु (आरईई/ REEs) इलेक्ट्रॉनिक्स, हरित ऊर्जा और रक्षा समेत आधुनिक उद्योगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। चीन दुर्लभ मृदा धातु उद्योग का प्रमुख खिलाड़ी बन गया है जिसने इस क्षेत्र के महत्व को समझते हुए जल्द शुरुआत कर और मजबूत सरकारी प्रोत्साहन के जरिए यह स्थान हासिल किया है।
परिचय
नियोडिमियम, डिस्प्रोसियम, टेरबियम और यिट्रियम जैसे दुर्लभ मृदा धातु (आईईई/ REEs) इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन टर्बाइनों, रक्षा प्रौद्योगिकियों और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र के आवश्यक घटक हैं। अप्रैल 2025 में, चीन ने राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए डिस्प्रोसियम और टेरबियम समेत सात मध्यम और भारी आरईई पर नए निर्यात नियंत्रण लगाए थे।[1] लाइसेंसिंग आवश्यकताओं के माध्यम से लागू किए गए इन नियंत्रणों ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को पूरी तरह से बाधित कर दिया और विश्व को याद दिलाया कि कैसे एक देश की नीति स्मार्टफोन से लेकर इलेक्ट्रिक वाहनों तक, दैनिक जीवन को प्रभावित कर सकती है। इस शोधपत्र का उद्देश्य चीन के दुर्लभ पृथ्वी उद्योग के विकास का पता लगाना है एवं इस बात का विश्लेषण करना है कि उसने अपनी आरईई आपूर्ति श्रृंखला का निर्माण किस प्रकार किया एवं शेष विश्व पर इसके क्या प्रभाव पड़े।
चीन में दुर्लभ मृदा धातु क्षेत्र का विकास
दुर्लभ मृदा धातु के क्षेत्र में चीन का उदय एक दीर्घकालिक सरकारी रणनीति का परिणाम है। इसकी नींव 1980 और 1990 के दशक में रखी गई थी जब चीन ने अपने भू– वैज्ञानिक लाभों एवं कम उत्पादन लागत का लाभ उठाना शुरू किया था। इस बीच, अमेरिका ने कैलिफोर्निया स्थित माउंटेन पास खदान, जो 1960 से 1990 के दशक तक विश्व में दुर्लभ मृदा धातुओं की एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता थी, ने बढ़ती पर्यावरणीय लागतों के कारण पहले ही अपने परिचालन को कम कर दिया था।
साल 2002 में माउंटे पास खदान के बंद होने के पीछे कई पर्यावरणीय रिसाव और डाउनस्ट्रीम प्रसंस्करण में निवेश की कमी थी। चीन, जिसने शोधन और चुंबक निर्माण कार्य को व्यवस्थित किया था, के उलट अमेरिका ने अपनी अधिकांश आरईई आपूर्ति श्रृंखला को आउटसोर्स किया। 2000 के दशक के आरंभ तक, अमेरिका में निकाले गए धातु भी प्रसंस्करण हेतु चीन भेजे जाने लगे। क्षमता में इस कमी ने बीजिंग को एक आपूर्तिकर्ता से आगे बढ़कर आरईई मूल्य श्रृंखलाओं का वैश्विक द्वारपाल बनने का अवसर दिया। [15] सरकारी प्रोत्साहनों से समर्थित चीनी कंपनियों ने सस्ते निर्यात के साथ वैश्विक बाज़ारों में प्रवेश किया।
चीन के पास वैश्विक आरईई भंडार का लगभग 39 से 42 प्रतिशत हिस्सा है जिसके प्रमुख भंडार– बयान ओबो (भीतरी मंगोलिया, मियांनिंग (सिचुआन), वेईशान (शांगदोंग) और दक्षिणी प्रांतों में आयन– अवशोषण मृदा में हैं। ये भंडार उभरती और रक्षा प्रौद्योगिकियों के लिए महत्वपूर्ण हल्के एवं भारी दोनों प्रकार के दुर्लभ मृदा धातुओं (आरईई) के निष्कर्षण की अनुमति देते हैं।[6] अकेले भीतरी मंगोलिया के बयान ओबो में 35 मिलियन टन से ज्यादा दुर्भल मृदा अयस्क हैं। हालांकि आयन– अवशोषण मृदा निम्न श्रेणी की होती है लेकिन उनकी कम रेडियोधर्मिता और सरल प्रसंस्करण उन्हें आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाते हैं। हालांकि, इन लाभों के लिए भी कीमत चुकानी पड़ी है।
समय के साथ, दशकों से अनियंत्रित दुर्लभ धातुओं के खनन, विशेष रूप से जियांग्शी और गुआंगदोंग जैसे दक्षिणी प्रांतों में, के कारण मृदा क्षरण, विषाक्त अपवाह और भारी धातु संदूषण हुआ है। [7] चीन की हालिया नीतियों ने इन समस्याओं को दूर करने का प्रयास किया है। पर्यावरणीय सुधार की समस्या निकट भविष्य में एक दीर्घकालिक चुनौती बनी रहेगी।[16]

स्रोत: रोडरिक जी. एगर्ट, रूथन मूमी, यूझोउ शेन, “दुर्लभ धातुओं के प्रति चीन की सार्वजनिक नीतियां, 1975-2018, 2019
देंग शाओपिंग के नेतृत्व में देश की रणनीतिक दिशा स्पष्ट रूप से नज़र आने लगी। साल 1986 में, “863 कार्यक्रम” ने दुर्लभ मृदा अनुसंधान और विकास (आरएंडडी) को संस्थागत रूप दिया, पृथक्करण प्रौद्योगिकियों एवं औद्योगिक अनुप्रयोगों में प्रगति के लिए धन उपलब्ध कराया।[9] 1990 के दशक की शुरुआत में, चीन ने आधिकारिक रूप से दुर्लभ मृदा को रणनीतिक खनिजों के रूप में वर्गीकृत किया जिससे राज्य संरक्षण और निवेश को प्रोत्साहित किया गया।[8] इन आरंभिक कदमों ने तकनीकी आधार प्रदान किया जिसकी वजह से चीन न केवल खनन में बल्कि शोधन और चुंबक उत्पादन में भी दूसरे देशों से आगे निकल गया।
शी जिनपिंग के नेतृत्व में, चीन ने दुर्लभ मृदा उद्योग में अपना प्रभुत्व जमाया। वर्ष 2014 में दुर्लभ मृदा उद्योग पुनर्गठन दिशानिर्देसों ने खनन, पृथक्करण और अंतिम उपयोग विनिर्माण को नियंत्रत करने हेतु छह राष्ट्रीय स्वामित्व वाले उद्यमों (एसओई / SOEs) की स्थापना की जिससे एक व्यवस्थित औद्योगिक संरचना का निर्माण हुआ।[10] सार्वजनिक क्षेत्र के ये छह उद्यम थे– चाइना नदर्न रेर अर्थ ग्रुप, चाइना मिनमेटल्स कॉर्पोरेशन, एल्युमिनियम कॉर्पोरेशन ऑफ चाइना (चिनाल्को), चाइना साउथ रेर अर्थ ग्रुप, गोआंगदोंग रेर अर्थ ग्रुप और चाइना रेर अर्थ ग्रुप को. लिमि. (जिसका गठन 2021 में एकीकरण के माध्यम से हुआ)। उनकी संयुक्त भूमिका ने दुर्लभ मृदा निष्कर्षण, प्रसंस्करण और निर्यात की संपूर्ण मूल्य श्रृंखला में राष्ट्र की निगरानी सुनिश्चित की। वर्ष 2020 में, निर्यात नियंत्रण कानून ने राष्ट्रीय सुरक्षा आधार पर आरईई निर्यात को सीमित करने की चीन की क्षमता को कानूनी अधिकार दिया, जिससे आपूर्तिकर्ता और नियामक दोनों के रूप में इसकी स्थिति मजबूत हुई।[11]
दुर्लभ मृदा धातुओं पर चीन की नियामक शक्ति भू– राजनीतिक संकेत का एक साधन बन गई है। हाल ही में अमेरिका– चीन व्यापार विवाद में, जो वाशिंगटन द्वारा सेमीकंडक्टर निर्यात प्रतिबंधों को सख्त करने से शुरू हुआ था, बीजिंग ने नौकरशाही माध्यमों से चुपचाप जवाबी कार्रवाई की। चीन के सीमा शुल्क अधिकारियों ने अमेरिकी कंपनियों को भेजे जाने वाले दुर्लभ मृदा उत्पादों के निर्यात लाइसेंसों में से चुनिंदा रूप से देरी करनी शुरू कर दी। हालाँकि कोई औपचारिक प्रतिबंध नहीं था लेकिन मंदी ने अमेरिकी आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित कर दिया, विशेष रूप से इलेक्ट्रिक वाहन निर्माताओं एवं रक्षा ठेकेदारों के लिए। उपादन में देरी की वजह से अस्थायी रूप से पुनःस्रोतीकरण करना पड़ा। कई फर्मों के लिए, संदेश स्पष्ट था– महत्वपूर्ण सामग्रियों तक पहुँच अब केवल खरीद अनुबंधों पर ही नहीं बल्कि भू– राजनीति पर भी निर्भर हो सकती है।[17]
इन रणनीतिक साधनों ने चीन को इलेक्ट्रिक वाहनों और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में डाउनस्ट्रीम एकीकरण के माध्यम से आरईई की प्रत्येक इकाई से अधिक आर्थिक मूल्य प्राप्त करने में सक्षम बनाया। उद्योग पर्यवेक्षकों के अनुसार, वैश्विक दुर्लभ मृदा चुंबक उत्पादन का लगभग 90 प्रतिशत चीनी प्रसंस्करण सुविधाओं से संबंधित है।[12] व्यापार रिपोर्टों के अनुसार, जब 2025 में निर्यात नियंत्रण लागू किए गए तो वर्तमान तिमाही में दुर्लभ मृदा चुंबकों की वैश्विक शिपमेंट में 70 प्रतिशत से अधिक की कमी आई।[13]

स्रोत: अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस/ USGS), 2024.
वैश्विक प्रतिरोध
इस बीच भारत, जापान, अमेरिका और यूरोपीय संघ के सदस्य देश अपनी आरईई (REE) आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने के लिए काम कर रहे हैं। भारत ने हाल ही में प्रस्तावित ₹1,345 करोड़ (लगभग 160 मिलियन डॉलर) की उत्पादन– आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर चुंबक निर्माण करना औऱ रणनीतिक भंडार तैयार करना है।[4] महिंद्रा एंड महिंद्रा, ऊनो मिंडा और सोना कॉमस्टार जैसी कंपनियां चीनी आयात पर निर्भरता को कम करने के लिए स्वदेशी दुर्लभ मृदा– आधारित चुंबक उत्पादन की संभावना तलाश रही हैं।[5] अमेरिका ने माउंटेन पास में उत्पादन को फिर से शुरू किया है, जबकि ऑस्ट्रेलिया ने जापान और दक्षिण कोरिया के सहयोग से शोधन तकनीकों में निवेश किया है।[14]
यह वैश्विक गति खनिज निर्भरता के रणनीतिक और मानवीय प्रभावों के बारे में बढ़ती जागरूकता को दर्शाती है। जब यूरोपीय संसद ने जुलाई 2025 के शिखर सम्मेलन,[3] से पहले चीन के दुर्लभ मृदा धातुओं के निर्यात नियंत्रणों की औपचारिक रूप से निंदा की तो यह सिर्फ नीतिगत नहीं था बल्कि उद्योगों, रोज़गारों और आर्थिक संप्रभुता की रक्षा का भी सवाल था।
गौरतलब है कि 2010 में, विवादित सेनकाकू/ दियाओयू द्वीप समूह के पास एक समुद्री दुर्घटना के बाद चीन ने बिना किसी आधिकारिक घो,णा के जापान को दुर्लभ मृदा धातुओं का निर्यात रोक दिया था जो दुर्लभ मृदा आपूर्ति श्रृंखलाओं के सशस्त्रीकरण का एक प्रारंभित और स्पष्ट उदाहरण था। जापान के निर्माता, विशेष रूप से सटीक साधनों और हाइब्रिड वाहन घटकों के निर्माता रातोंरात प्रमुख इनपुट बदलने के लिए संघर्ष करते हुए स्वयं को मुश्किल स्थिति में पा रहे थे। इस व्यवधान ने जापान की महत्वपूर्ण खनिज रणनीति को नया रूप दिया औऱ औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं के लिए चेतावनी के रूप में काम किया।[17]
दुर्लभ मृदा धातुओं (आरईई/ REEs) क्षेत्र में चीन का प्रभुत्व उसकी सतत रणनीतिक योजना को दर्शाता है जो औद्योगिक नीति, भौगोलिक लाभ और भू– राजनीतिक विचारों में गहराई से निहित है। इसके अलावा, इसकी बढ़त, व्यवस्थित कार्यप्रणाली और नियामकीय क्षमताएं अल्पावधि में इसकी स्थिति को प्रतिद्वंद्वी बनाना कठिन बना देती हैं। वर्ष 2025 के निर्यात प्रतिबंधों से संकेत मिलता है कि आरईई केवल औद्योगिक इनपुट नहीं है बल्कि वैश्विक शासन कला में रणनीतिक साधन भी हैं।
*****
*श्रेयस श्रीराम, भारतीय वैश्विक परिषद, नई दिल्ली में शोध प्रशिक्षु हैं।
अस्वीकरण : यहां व्यक्त किए गए विचार निजी हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण: