माननीय श्री चंद्रपुरम पोन्नुसामी, भारतीय वैश्विक परिषद के अध्यक्ष,
माननीय अतिथिगण, दोस्तों,
नमस्ते!
भारतीय वैश्विक परिषद का दौरा करना और आपसे, अपने देश के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अग्रणी विद्वान एवं विशेषज्ञों, से, मिलना मेरे लिए अत्यंत हर्ष का विषय है। यह परिषद प्रमुख रणनीतिक अनुसंधान संस्था है और विश्व की सबसे प्रतिष्ठित संस्थाओं में से भी एक है। अस्सी (80) वर्षों के इतिहास वाले इस संस्था ने भारत के विदेश संबंधों को दिशा एवं आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐतिहासिक सप्रू हाउस भारत, एशियाई देशों, विश्व एवं वियतनाम के इतिहास के अनेक निर्णायक क्षणों का साक्षी रहा है। यह विश्व भर के नेताओं, राजनेताओं और राजनयिकों के मिलन का केंद्र भी है।
यहाँ, 1947 में, एक ऐतिहासिक सम्मेलन हुआ था, पहला एशियाई संबंध सम्मेलन, जिसने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव रखी। इस आंदोलन ने भारत, वियतनाम और दूसरे ऐसे देशों को आपस में जोड़ा जो स्वतंत्रता, शांति, सहयोग और निष्पक्ष विकास एवं समृद्धि की एक जैसी आकांक्षा रखते थे। राष्ट्रपति हो ची मिन्ह ने इस सम्मेलन में शांति और एकजुटता का जो संदेश दिया, वह था: "एकजुटता से हम वैश्विक शांति और लोकतंत्र के सबसे मज़बूत रक्षकों में से एक बनेंगे"। भारत और विश्व भर में इस संदेश की बहुत सराहना की गई थी। यह भारत और वियतनाम, इन दो नव– स्वतंत्र देशों के बीच शुरुआती कड़ियों में से एक था और स्वतंत्र वियतनाम द्वारा भाग लिए गए पहले बहुपक्षीय कूटनीतिक कार्यक्रमों में से एक का प्रतीक था।
आज की हमारी चर्चा के लिए मैं आपसे एक नए युग में वियतनाम और भारत के बीच संबंधों के बारे में बात करना चाहूँगा, एक उन्नत व्यापक रणनीतिक साझेदारी, जो साझा नज़रिए, रणनीतिक हितों के संमिलन और मजबूत सहयोग पर आधारित है।
देवियों और सज्जनों, प्यारे मित्रों,
1. यदि हम अपने दोनों देशों के हज़ारों वर्षों के निर्माण काल पर नज़र डालें तो इतिहास और संस्कृति ही वे सूत्र रहे हैं जिन्होंने वियतनाम और भारत को आपस में जोड़ा है।
दोनों देश एक–दूसरे से सीमा साझा नहीं करते। फिर भी, वियतनाम और भारत के बीच संबंध बहुत पहले ही स्थापित हो गए थे। समुद्री व्यापार मार्गों के माध्यम से, भारतीय आस्थाओं, धर्मों, दर्शन एवं सभ्यता का प्रसार बहुत पहले ही हो गया था और वे वियतनामी लोगों के सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक जीवन का अभिन्न अंग बन गए थे। ये संबंध पूरे वियतनाम में फैले सैकड़ों स्मारकों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है– चाहे लुई लाऊ बौद्ध केंद्र हो, माई सोन तीर्थस्थल, चाम टावर, पोनागर टावर, ये सभी हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म के अवशेष हैं जो वियतनामी लोगों के परोपरकार के दर्शन के साथ–साथ चलते हैं। ये कड़ियां आज भी हैं जो नए और अलग–अलग रूपों में व्यक्त होती हैं। जैसे, आपके राष्ट्रीय नेताओं ने अंतरराष्ट्रीय वेसाक दिवस में शामिल होने के लिए कई बार वियतनाम का दौरा किया है– इनमें से मैं भारत के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू की वर्ष 2019 में की गई यात्रा का विशेष रूप से उल्लेख करना चाहूँगा।
वियतनाम की कई पीढ़ियों ने रामायण में अपनेपन का अनुभव किया है। यह एक भारतीय वीरगाथा है जो बहादुरी, वफ़ादारी और बलिदान की कहानी है और इन गुणों के अर्थ को परिभाषित भी करती है। योग की उत्पत्ति भारत में हुई थी लेकिन उसके बाद से धीरे–धीरे यह पूरे विश्व में फैली और वियतनाम में योग की लोकप्रियता बहुत बढ़ी। यहाँ देश भर में चार हज़ार क्लब हैं और 500,000 से अधिक लोग नियमित रूप से योग करते हैं। हर साल हज़ारों की संख्या में वियतनाम के बौद्ध और पर्यटक बिहार स्थित बोधगया की तीर्थयात्रा पर जाते हैं।
राष्ट्रीय स्वतंत्रता और निर्माण के लिए संघर्ष की यात्रा ने हमारे दोनों देशों के लोगों और नेताओं के बीच एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक, गहरी सहानुभूति, एकता और एकजुटता पैदा की है। इसकी शुरुआत राष्ट्रपति हो ची मिन्ह के महात्मा गांधी के प्रति सम्मान और भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ उनकी घनिष्ठ मित्रता से हुई थी, जब वे मिलकर स्वतंत्रता, शांति, समानता और समृद्धि के लिए प्रयास कर रहे थे। हम यह कभी नहीं भूलेंगे कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पहले ऐसे विदेशी राष्ट्राध्यक्ष थे जिन्होंने 1954 में हनोई की मुक्ति के ठीक एक सप्ताह के बाद, वियतनाम का दौरा किया था।
यह उस ज़बरदस्त समर्थन का एक प्रदर्शन था जो आपके लोगों और सरकार ने वियतनामी लोगों को दिया था। न ही हम कभी "मेरा नाम, तेरा नाम– वियतनाम, वियतनाम" को भूलेंगे जो भारत के कई शहरों की सड़कों पर गूंजा था, जिसने हमारे राष्ट्र की शांति, स्वतंत्रता एवं स्वतंत्रता संग्राम में दोनों देशों के लोगों के बीच एकजुटता और भाईचारे को साबित किया था। निश्चित रूप से न ही हम अपने उन भारतीय मित्रों को भूल पाएंगे जो राष्ट्रीय एकीकरण के बाद के मुश्किल वर्षों में हमारे साथ मज़बूती से खड़े रहे।
वियतनाम उस विशाल, गहन और अमूल्य समर्थन को संजोकर रखता है और उसका स्मरण करता है जो भारत की जनता, राजनीतिक दलों और सरकार ने अतीत में राष्ट्रीय स्वतंत्रता एवं आज़ादी की रक्षा के संघर्ष के वर्षों में वियतनाम को प्रदान किया था, ठीक उसी तरह जैसे आज हमारे राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास में वियतनाम को दिए गए ठोस समर्थन और मदद को।
देवियों और सज्जनों, प्यारे दोस्तों,
2. वास्तव में, बीते अस्सी वर्षों के दौरान दोनों देशों की विकास यात्राओं में कई समानताएं रही हैं और इनसे जबरदस्त उपलब्धियाँ हासिल हुई हैं।
सबसे पहले, दोनों देशों की शुरुआत ऐसी औपनिवेशिक अर्थव्यवस्थाओं के रूप में हुई ती जो भारी संकट में थीं, कहा जा सकता है कि जिनका पूरी तरह से शोषण किया गया थाः जहाँ कौशल की कमी थी, जो असंतुलित थीं और दूसरे देशों पर निर्भर थीं। फिर भी, समृद्धि के अपने सपने के साथ, अपने लोगों के लिए खुशहाली और सुख लाने के लक्ष्य के साथ, दोनों देशों ने धीरे–धीरे अपने लिए स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और सुदृढ़ अर्थव्यवस्थाओं का निर्माण किया है।
आज भारत विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बन गया है। बीते वर्ष वैश्विक चुनौतियों के बावजूद इसने 7.6% की दर से प्रगति की और लगातार तीन दशकों तक औसतन छह प्रतिशत की रिकॉर्ड वृद्धि दर बनाए रखते हुए स्वयं को वैश्विक विकास के सबसे महत्वपूर्ण इंजनों में से एक के रूप में स्थापित किया है। अब भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व में चौथे स्थान पर है और तीसरे स्थान पर पहुंचने की राह पर तेज़ी से आगे बढ़ रही है।
यह एक तकनीकी महाशक्ति बन चुका है, विश्व की सबसे गतिशील डिजिटल, नवोन्मेषी और एआई अर्थव्यवस्थाओं में से एक, जिसमें बेंगलुरु केंद्र, हैदराबाद बायोटेक केंद्र और विश्व स्तर पर प्रभावशाली भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी/IIT) जैसे उच्च–गुणवत्ता वाले एचआर प्रशिक्षण केंद्र शामिल हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अंतरिक्ष कार्यक्रम ने भारत को वैश्विक अंतरिक्ष क्षमताओं वाले अग्रणी देशों की सूची में शामिल कर दिया है।
वियतनाम, दोई मोई (Doi Moi) के चालीस वर्षों और गहन क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय एकीकरण के बाद, अब 514-अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बन चुका है, यह दोई मोई से पहले की स्थिति की तुलना में सौ गुना अधिक है। इस उपलब्धि के साथ यह विश्व में 32वें और आसियान में चौथे स्थान पर है। वैश्विक नवाचार सूचकांक में 139 देशों में इसका स्थान 44वां है और इसका स्टार्टअप इकोसिस्टम विश्व में 55वें स्थान पर है। बहुपक्षीय गरीबी मानक के अनुसार, गरीबी दर में भी कमी आई है, 1980 के दशक के मध्य में जहाँ गरीबी 70% थी वही 2025 तक कम होकर 2.95% रह गई। इस प्रक्रिया में लाखों लोग गरीबी से बाहर निकल आए हैं।
विदेश संबंधों के क्षेत्र में, दोनों देश स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता, स्व– सशक्तिकरण एवं शांति के संबंध में एक जैसा नज़रिया रखते हैं। साथ ही वे संवाद का दृढ़ समर्थन करते हैं और क्षेत्रीय एवं वैश्विक मुद्दों के प्रति सक्रिए, संतुलित एवं उत्तरदायी नज़रिया अपनाते हैं।
मैं वसुधैव कुटुंबकम यानि पूरा विश्व एक परिवार है, के भारतीय दर्शन से बहुत प्रभावित हूँ। यह मित्रता, सम्मान, एकजुटता और शांति एवं समृद्धि की कामना का समर्थन करता है। ये वही मूल्य हैं जिनके लिए वियतनाम निरंतर प्रयासरत रहा है। हम रणनीतिक सहयोग की रूपरेखा और कनेक्टिविटी पहलों के माध्यम से आपके उत्तरदायित्वपूर्ण सहयोग की भूरि–भूरि प्रशंसा करते हैं।
दक्षिण–पूर्व एशिया के साथ घनिष्ठ संबंध बनाने के लिए एक्ट ईस्ट पॉलिसी और एक खुले, समावेशी एवं नियम आधारित क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए हिंद–प्रशांत पहल। हम बहुपक्षीय मंचों पर भारत के बढ़ते महत्व की भी सराहना करते हैं, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र, जी20, ब्रिक्स, इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन और बहुक्षेत्रीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग हेतु बंगाल की खाड़ी पहल (बिमस्टेक) में, इन सभी ने संवाद, कनेक्टिविटी और साझा चुनौतियों के समाधान में योगदान दिया है।
वियतनाम ने भी अपनी ओर से कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों को सफलतापूर्वक निभाया है, जैसे कि आसियान की अध्यक्षता, एपीईसी (APEC) की मेज़बानी, यूएनएससी (UNSC) का अस्थायी सदस्य, यूएनएचआरसी (UNHRC) का सदस्य, संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय विधि आयोग का उपाध्यक्ष, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स का सदस्य और यूनेस्को (UNESCO) में विभिन्न शासी निकायों का सदस्य। वियतनाम ने संयुक्त राष्ट्र के शांति स्थापना मिशनों में अपने अधिकारी और सैनिक भी भेजे हैं।
वियतनाम और भारत, दोनों ही अपनी स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे होने का जश्न मनाने के लिए नए विकास लक्ष्यों की ओर अग्रसर हैं ताकि विकास एवं सामाजिक प्रगति के बीच संतुलन बनाए रखा जा सके। इस प्रक्रिया में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भूमिका अपरिहार्य है। भारत ने विकसित भारत 2047 का लक्ष्य निर्धारित किया है जिसका उद्देश्य भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाना है और ऐसा करने के लिए आर्थिक विकास , सामाजिक प्रगति, पर्यावरणीय स्थिरता, शासन–प्रशासन की दक्षता और वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षमताओं के बीच उचित संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
वियतनाम ने भी दोहरा लक्ष्य निर्धारित किया हैः 2030 तक आधुनिक उद्योगों एवं उच्च– मध्यम आय वाला विकासशील देश बनना और 2045 तक एक विकसित, उच्च–आय वाला देश बनना। ये दोहरे शताब्दी लक्ष्य रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और नए युग में विकास के प्रति वियतनामी राष्ट्र की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति हैं।
ऐसा करने के लिए, हमें अपने विकास मॉडल में ज़ोरदार तरीके से नए प्रयोग करने होंगे, तेज़ और स्थायी विकास को बढ़ावा देना होगा और साथ ही गहन व प्रबावी अंतरराष्ट्रीय एकीकरण के साथ– साथ अपनी स्वतंत्रता एवं आत्मनिर्भरता को भी बनाए रखना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम विज्ञान, प्रौद्योगिकी, नवाचार एवं डिजिटल परिवर्तन के विकास को न केवल विकास में सहायक साधन के रूप में देखते हैं बल्कि इसे स्वयं विकास का मुख्य संचालक भी मानते हैं।
इसलिए, हमारे दोनों देशों के बीच के संबंध विश्वास और सौहार्द की नींव पर गढ़े और संवारे गए हैं। राजनयिक संबंधों की शुरुआत 1972 में हुई, 2007 में इन्हें रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया गया, जिसके बाद 2016 में व्यापक रणनीतिक साझेदारी स्थापित हुई और तब से ये संबंध लगातार और अधिक व्यापक एवं गहन होते गए हैं। केवल एक दशक में ही द्विपक्षीय व्यापार तीन गुना बढ़ा और 2025 में 16.5 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया। भारत के वियतनाम में फिलहाल 400 से अधिक निवेश परियोजनाएं चल रही हैं जिनकी कुल लागत 1 अरब डॉलर से अधिक है। वियतनाम की कंपनी विनफास्ट भारत में ईवी (लेक्ट्रिक वाहन) उत्पादन में निवेश कर रही है और उसने शुरुआती पांच वर्षों में 2 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया है।
रक्षा और सुरक्षा सहयोग, व्यापक ऋण सहायता और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यक्रमों के साथ, एक रणनीतिक स्तंभ बना हुआ है। शिक्षा, प्रशिक्षण, पर्यटन और लोगों के बीच आपसी संबंधों का भी विस्तार किया गया है। दोनों देशों के बीच हर सप्ताह 80 से अधिक सीधी उड़ाने आती–जाती हैं।
देवियों और सज्जनों, प्यारे दोस्तों,
3. वियतनाम और भारत के बीच संबंध नए युग में प्रवेश कर रहा है।
दुनिया पहले कभी न देखे गए तरीके से, तेज़ी से और गहनता के साथ बदल रही है। सत्ता के प्रमुख केंद्रों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र और बहुपक्षीय संस्थाएं अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना कर रही हैं।
वियतनाम और भारत समेत सभी देश, आज के समय के विरोधाभासों का सामना कर रहे हैं। सहयोग की आवश्यकता तो बढ़ती जा रही है लेकिन आपसी विश्वास कमज़ोर पड़ रहा है। आर्थिक ढांचे एक–दूसरे से और भी गहना से जुड़े हुए हैं, फिर भी वे बहुत संवेदनशील हैं। तकनीक तेज़ी से आगे बढ़ रही है, फिर भी यह देशों के बीच विकास के अंतर को और गहरा कर रही है। ये परिवर्तन भरी चुनौतियाँ खड़ी कर रहे हैं लेकिन सबसे बढ़कर, ये ऐसे अवसर भी पैदा करते हैं जिन्हें हम सही समय पर पहचानकर भुना सकते हैं और यदि हम आपस में जुड़े रहें तो ये अवसर कई गुना बढ़ जाएंगे।
देवियों और सज्जनों, प्रिय मित्रों,
4. हमारे दोनों देशों के विकास के नए चरण की नई पृष्ठभूमि और मांगें यह अपेक्षा करती हैं कि हम वियतनाम और भारत के बीच संबंधों को सुदृढ़ करें, उनमें नवीनता लाएं और नई ऊँचाईयों तक ले जाएं।
हमारी अपनी–अपनी विकास यात्रा और आपसी संबंधों की यात्रा ने यह दिखाया है कि वियतनाम और भारत शांति, सुरक्षा एवं विकास के मामले में एक– दूसरे के स्वाभावित साझेदार बन चुके हैं। हम अपने राष्ट्र, क्षेत्र, विश्व और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के निर्माण को लेकर एक जैसा नज़रिया एवं विज़न रखते हैं जो कुछ इस प्रकार हैं: (i) रणनीतिक आत्मनिर्भरता और संतुलन, (ii) अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान और संयुक्त राष्ट्र एवं बहुपक्षीय प्रणाली का समर्थन, (iii) रक्षा एवं शांति की स्थापना और भागीदारों का विविधीकरण, (iv) मतभेदों को कम करने के लिए समानताओं की खोज में संवाद का समर्थन; और (v) निष्पक्ष एवं समावेशी क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए समर्थन।
हमारे कई रणनीतिक हित भी आपस में मेल खाते हैं, विशेष रूप से निम्नलिखित मामलों में: (i) विकास एवं समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करने के लिए शांति और स्थिरता को बढ़ावा देना; (ii) विभिन्न क्षेत्रों, जैसे अर्थव्यवस्था, व्यापार, रक्षा, सुरक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, में, परस्पर जुड़े हितों का निर्माण, ताकि हमारे द्विपक्षीय संबंधों की कनेक्टिविटी और मज़बूती को बढ़ाया जा सके; (iii) नेविगेशन और ओवरफ्लाइट की स्वतंत्रता एवं सुरक्षा का समर्थन करना, विवादों का शांतिपूर्ण तरीकों से समाधान करना और खुले, समावेशी और स्थिर हिंद– प्रशांत क्षेत्र को बढ़ावा देना; (iv) क्षेत्रीय बहुपक्षीय व्यवस्थाओं में सहयोग को बढ़ाना।
ये कड़ियां समान नज़रिए और रणनीतिक तालमेल वियतनाम एवं भारत को सहयोग बढ़ाने और नए युग में दोनों देशों की विकास यात्रा में प्रभावी योगदान हेतु ठोस आधार प्रदान करते हैं। साथ ही ये अधिक स्थिर और स्थायी क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय माहौल को आकार देने में भी योगदान देते हैं।
बीते पचास वर्षों में हमारे संबंधों की जो ठोस नींव रही है, उसे आगे बढ़ाते हुए और सहयोग के इस बंधन को नए युग और ऊंचाईयों तक ले जाने के लिए, बेहतर व्यापक रणनीतिक साझेदारी की ओर, जिसमें साझा नज़रिया, एक जैसे रणनीतिक हित और ठोस सहयोग स्थापित करना हमारे मूल मंत्र होंगे, ताकि हम अपनी क्षमताओं को पूरा तरह से प्रयोग में ला सकें, नए क्षेत्रों की खोज कर सकें और नए अवसर पैदा कर सकें। इसी क्रम में हमें निम्न प्रमुख बिंदुओं पर काम करना चाहिएः
(i) सबसे पहला, हमें रणनीतिक विश्वास को मज़बूत और प्रगाढ़ करना चाहिए, जो एक स्थिर संबंध की बुनियाद है। यह साझा चुनौतियों का प्रभावी तरीके से सामना करने और सहयोग करने का आधार भी है। बीते पचास वर्षों में वियतनाम और भारत के बीच एक विशेष संबंध रहा है, जैसा कि स्वर्गीय प्रधानमंत्री वान डोंग ने कहा था, बादलों से रहित आसमान की तरह स्वच्छ, ऐसा संबंध है वियतनाम और भारत का। यह बहुत ही विशेष है, पवित्र है क्योंकि इसकी नींव ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों, आपसी समझ, सहानुभूति और सम्मान एवं नीतिगत निरंतरता पर रखी गई है। यह दोनों देशों के नेताओं और पीढ़ियों के बीच साझा उद्देश्य से बना है। यह विशेष और पवित्र इसलिए भी है क्योंकि हमारे हितों के बीच कोई टकराव नहीं है, और हमारे आपसी सहयोग में अत्यधिक स्थिरता विद्यमान है।
इस नए दौर में, हमें करना चाहिए: (1) सभी माध्यमों, सरकारी, संसदीय, पार्टी और जनता, के बीच और सभी स्तरों– केंद्रीय और स्थानीय, पर व्यापक आदान– प्रदान को बढ़ावा देना जारी रखना चाहिए; (2) रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार करें। रक्षा और सुरक्षा सहयोग जितना भी बेहतरीन रहा हो, इसे और भी बेहतर और प्रगाढ़ होना चाहिए और सहयोग के जो भी तंत्र उपलब्ध हैं, उनका और भी बेहतर ढंग से उपयोग किया जाना चाहिए। हमें बहुपक्षीय मंचों– जिनमें आसियान, संयुक्त राष्ट्र और गुटनिरपेक्ष आंदोलन शामिल हैं, पर, अपनी– अपनी स्थितियों के संबंध में सहयोगात्मक कार्रवाई और समन्वय को बढ़ाना चाहिए। विशेष रूप से ऐसे समय में जब क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य अत्यंत जटिल तरीकों से बदल रहा है।
(ii) दूसरा, हमें कनेक्टिविटी के दायरे को बढ़ाना चाहिए और विकास से जुड़े संपर्कों को बेहतर बनाना चाहिए ताकि क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को और अधिक गति मिल सके। अवसंरचना, रसद, डिजिटलीकरण और वैल्यू चेन लिंकेज का विकास द्विपक्षीय कनेक्टिविटी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। फार्मास्युटिकल्स, आईटी, उन्नत कृषि और स्वच्छ ऊर्जा जैसे अत्यधिक पूरक क्षेत्रों के लिए हमें ठोस सहोग परियोजनाओं को आगे बढ़ाना चाहिए, जिनमें संयुक्त उत्पादन, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और बाज़ार विकास शामिल हैं, ताकि क्षेत्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ मिलकर अधिक गहनता के साथ जुड़ा जा सके।
हम फार्मास्युटिकल क्षेत्र में भारत के साथ मिलकर काम करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। हम उन भारतीय फार्मा कंपनियों का स्वागत करते हैं जो दक्षिण–पूर्व एशियाई बाज़ार के लिए वियतनाम में विनिर्माण क्षेत्र में निवेश कर रही हैं। हमें सहयोग मंचों और निवेश प्रोत्साहन कार्यक्रमों के माध्यम से अपने व्यवसायों एवं स्थानीय क्षेत्रों के बीच सीधे संपर्क स्थापित करने की व्यवस्था का भी विस्तार करना चाहिए। इस प्रकार, हम सहयोग संबंधी दिशानिर्देशों को ठोस परियोजनाओं में बदल देंगे जो प्रत्येक क्षेत्र, स्थानीयता और आपूर्ति श्रृंखला के अनुरूप होंगी।
वियतनाम और भारत के बीच संबंध एक ऐसा रणनीतिक स्तंभ है जो दक्षिण–पूर्व और दक्षिण एशिया को आपस में जोड़ता है। उन्नत व्यापक रणनीतिक साझेदारी, आसियान– भारत रूपरेखा, मेकांग–गंगा सहयोग और दूसरे क्षेत्रीय सहयोग पहलों के माध्यम से, हमारे दोनों देश मिलकर खुले, समावेशी और गतिशील विकास क्षेत्र को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसके साथ ही, सोचने के नए तरीके, नए मिशन और सहयोग के नए क्षेत्र, काम करने के नए तरीके के साथ– साथ चलने चाहिए, ऐसा तरीका जो निर्णायक हो, जिसकी प्रभावशीलता को उसकी गति एवं ठोस परिणामों के आधार पर मापा जा सके।
(iii) तीसरा, हमें वैज्ञानिक, नवाचार और रणनीतिक प्रौद्योगिकी सहयोग को बढ़ावा देने एवं तेज़ करने की आवश्यकता है, और इस क्षेत्र को वियतनाम– भारत सहयोग का मुख्य आधार बनाना होगा। ज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार विकास के प्रमुख चालक बन गए हैं और ये किसी देश की समग्र शक्ति एवं प्रतिस्पर्धात्मकता को निर्धारित करने वाले नए कारक हैं। इसके लिए उन क्षेत्रों में सहयोग के अधिक गहन एवं विविध तरीकों की आवश्यकता है जो हमारे भविष्य को आकार देंगे जैसे कि डिजिटल अर्थव्यवस्था, डेटा, सेमीकंडक्टर और एआई।
हम विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विशेष रूप से सेमीकंडक्टर, एआई और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में भारत के साथ सहयोग को विशेष महत्व देते हैं। मेरा मानना है कि हम सहयोग के पूरक क्षेत्रों को और अधिक ज़ोर– शोर से आगे बढ़ाने और खोजने एवं विज्ञान, नवाचार और रणनीतिक प्रौद्योगिकी में रणनीतिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए बहुत अच्छी स्थिति में हैं, यह न केवल दिशा–निर्देश निर्धारित करने के माध्यम से बल्कि उनके कार्यान्वयन में भी होगा।
यह काम मुख्य पहलों और उनके डिलीवरी मॉडल की पहचान कर, अनुसंधान केंद्रों, विश्वविद्यालयों और व्यवसायों के बीच सहयोग कार्यक्रम स्थापित कर और दोनों देशों की बीच शिक्षा और उत्कृष्ट प्रतिभाओं के आदान– प्रदान को बढ़ावा देकर किया जा सकता है।
(iv) चौथा, हमें सामाजिक–सांस्कृतिक मूल्यों का प्रसार करना चाहिए और लोगों के बीच के संबंधों को बेहतर बनाना चाहिए। देशों के बीच संबंधों को दीर्घकालिक केवल सहयोग की रूपरेखा से ही नहीं बल्कि नागरिकों और समाजों के बीच आपसी लगाव से भी बनया जाता है। बीते वर्ष दोनों देशों के बीच दस लाख पर्यटकों का आवागमन हुआ जिससे पता चलता है कि हमारे साझा संबंध कितने गहरे और व्यापक हो चुके हैं। पांच–छह वर्ष पहले के मुकाबले यह बहुत बड़ी छलांग है फिर भी हमारी आबादी एवं अर्थव्यवस्थाओं के आकार को देखते हुए यह अभी भी बहुत कम है।
हमें शिक्षा और प्रशिक्षण, संस्कृति, पर्यटन, स्थानीय सहयोग और लोगों के बीच आपसी संपर्कों के माध्यम से इन संबंधों को और अधिक व्यापक और गहन बनाना जारी रखना चाहिए। व्याख्यान कक्षों, प्रयोगशालाओं , अनुसंधान परियोजनाओं और युवा स्टार्टअप्स से ही आपसी समझ और विश्वास स्वाभाविक रूप से विकसित होगा और अपनी जड़े जमाएगा।
सदियों से संचित यह समझ और सहानुभूति एक अमूल्य धरोहर है जिसे सहेजकर रखना और संरक्षित करना बहुत ज़रूरी है। साथ ही, यह प्रेरणा का ऐसा स्रोत भी है जो दोनों देशों को इस क्षेत्र एवं पूरे विश्व के लिए उदात्त मूल्यों के प्रसार एवं संवर्धन हेतु मिलकर काम करने के लिए प्रेरित करता है। जब युवा पीढ़ी इन मूल्यों को आत्मसात कर इन्हें आगे बढ़ाएगी, तो भविष्य में ये मूल्य द्विपक्षीय संबंधों की नींव को और अधिक सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
(v) पांचवीं बात, हमें मिलकर शांति और स्थिरता के लिए ऐसा माहौल बनाना और उस माहौल को मज़बूत करना होगा। हम सभी शांति के महत्व से भली– भांति परिचित हैं। आज की दुनिया में, यह बात और भी स्पष्ट रूप से नज़र आती है कि शांति का अर्थ केवल युद्ध और संघर्ष का न होना ही नहीं है। इसका अर्थ है– समस्त मानव जाति के लिए स्थायी शांति, न्याय और समृद्धि को बढ़ावा देने हेतु संरचनात्मक, संस्थागत और सांस्कृतिक परिस्थितियों का निर्माण करना एवं उन्हें सुदृढ़ बनाना। शांति को भी कभी हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।
यह सच्चे संवाद का, देशों के आपसी मामलों के संचालन में उत्तरदायित्व का और संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र एवं अंतरराष्ट्रीय कानून के बुनियादी सिद्धांतों के प्रति अटूट सम्मान का परिणाम है। दोनों देशों द्वारा संवाद को आगे बढ़ाना, कानून के शासन और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन करना और विकास को अपने लोगों के हित के रूप में प्राथमिकता देना, ये न केवल हमारे अपने–अपने वैध हितों की रक्षा करते हैं, बल्कि खुले, पारदर्शी, समावेशी और नियम आधारित क्षेत्रीय व्यवस्था को बनाए रखने में भी प्रत्यक्ष योगदान देते हैं।
देवियों और सज्जनों
5. निष्कर्ष: हज़ारों वर्षों के हमारे आपसी जुड़ाव और पचास वर्षों से भी अधिक के राजनयिक संबंधों ने वियतनाम एवं भारत के बीच संबंधों को सुदृढ़ और अमूल्य आधार प्रदान किया है। हम इतिहास की गहराई और व्यापकता से बुने गए धागों से एवं अपने विकास पक्षों की समानताओँ से आपस में जुड़े हुए हैं। वियतनाम के लिए भारत सदैव से ही महत्वपूर्ण सहयोगी और घनिष्ठ, विश्वसनीय मित्र रहा है।
हम एक नए युग में प्रवेश कर रहे हैं, जो उन्नत व्यापक रणनीतिक साझेदारी से सुसज्जित हैं, जिसे और भी ऊंचे स्तर पर ले जाया गया है, जिसका मूलमंत्र है– साझा नज़रिया, रणनीतिक तालमेल और ठोस सहयोग। सरकार के सक्रिय समाधानों और हमारे संबंधित व्यापारिक समुदायों के दृढ़ संकल्प, एकजुटता, नवाचार और रचनात्मकता की भावना को देखते हुए, यह निश्चित है कि वियतनाम और भारत के बीच संबंध और अधिक सुदृढ़ और प्रगाढ़ होंगे। साथ ही हमारे आपसी संबंध को और बल मिलेगा। इससे दोनों देशों के विकास में प्रत्यक्ष लाभ और सफलता प्राप्त होगी। साथ ही इस क्षेत्र एवं पूरे विश्व में शांति, स्थिरता, सहयोग और समृद्धि को बढ़ावा देने में भी सकारात्मक योगदान मिलेगा।
आप सभी स्वस्थ और सफल हों।
दोनों देशों के बीच मित्रता पहले से प्रगाढ़ हो।
बहुत–बहुत धन्यवाद।
*****