भारतीय वैश्विक परिषद (आईसीडब्ल्यूए) ने प्रिंस सऊद अल फैसल इंस्टीट्यूट फॉर डिप्लोमैटिक स्टडीज (पीएसएआईडीएस) के सहयोग से 05 फरवरी 2025 को रियाद, सऊदी अरब में अपना 9वाँ संवाद आयोजित किया। यह संवाद बदलती विश्व व्यवस्था, क्षेत्रीय मुद्दों और द्विपक्षीय संबंधों पर भारत-सऊदी के दृष्टिकोण पर केंद्रित था। इस संवाद के लिए आईसीडब्ल्यूए के चार सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने पीएसएआईडीएस, रियाद का दौरा किया। आईसीडब्ल्यूए प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व आईसीडब्ल्यूए के उप महानिदेशक श्री एल. प्रशांत पिसे ने किया, तथा पीएसएआईडीएस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व पीएसएआईडीएस के महानिदेशक डॉ. मोशाबोब अल कहतानी ने किया। इस बात पर जोर दिया गया कि ऐतिहासिक साझेदार होने के नाते भारत और सऊदी अरब को अपनी साझेदारी को और अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है, विशेषकर इसलिए क्योंकि क्षेत्र विभिन्न स्तरों पर संकट का सामना कर रहा है।
संवाद के पहले सत्र की अध्यक्षता नोजौद बिन श्राइम ने की और इस सत्र में राजनीतिक और सांस्कृतिक द्विपक्षीय संबंधों पर ध्यान केंद्रित किया गया। पीएसएआईडीएस के एशियाई अध्ययन केंद्र के प्रमुख डॉ. अली अल कर्नी और आईसीडब्ल्यूए की शोधकर्ता डॉ. लक्ष्मी प्रिया ने दोनों देशों के बीच मीडिया सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया, क्योंकि यह धारणा-निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण है। दोनों पक्षों ने रक्षा और अंतरिक्ष के क्षेत्रों में भारत और सऊदी अरब के बीच सहयोग की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। सऊदी पक्ष ने यह भी रेखांकित किया कि भारत एक महत्वपूर्ण देश है और उसे इस क्षेत्र में सुरक्षा प्रदाता के रूप में उभरने के लिए अधिक सक्रियता से शामिल होना चाहिए। सत्र के दौरान सांस्कृतिक जुड़ाव के महत्व पर तथा लोगों को दूसरे देश की संस्कृति और जीवनशैली से परिचित कराने के लिए कार्यक्रमों को आयोजित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। लोगों से लोगों के बीच आपसी संबंध द्विपक्षीय साझेदारी का आधार बनते हैं और प्रतिभागियों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि दोनों देशों को इन संबंधों को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
डीडीजी आईसीडब्ल्यूए की अध्यक्षता में आयोजित दूसरे सत्र में आर्थिक संबंधों, व्यापार और निवेश पर ध्यान केंद्रित किया गया और आर्थिक एवं योजना मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार तथा पीएसएआईडीएस के आर्थिक प्रभाग के संकाय डॉ. रज्जा अल मरज़ौकी और आईसीडब्ल्यूए के रिसर्च फेलो डॉ. अरशद ने बढ़ते द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग पर जोर दिया। सत्र में क्षेत्र के भीतर और उससे आगे भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (आईएमईसी) की कनेक्टिविटी और प्रासंगिकता के महत्व पर ध्यान केंद्रित किया गया। प्रतिभागियों का यह निष्कर्ष था कि आईएमईसी की सफलता लागत और समय के संदर्भ में इसकी दक्षता पर निर्भर करती है। यह भी उल्लेख किया गया कि आईएमईसी अंतर्राष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारा (आईएनएसटीसी) और चाबहार का पूरक है। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय कंपनियों के लिए निओम परियोजना, लाल सागर तटरेखा विकास, 2034 विश्व कप बुनियादी ढाँचे के विकास में निवेश करने का अवसर है।
तीसरे और चौथे सत्र में क्षेत्रीय मुद्दों और क्षेत्र में महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा पर ध्यान केंद्रित किया गया। डॉ अब्दुल्ला अल हमादी, डॉ असद अल शामलान, निदेशक, सेंटर फॉर यूरोपियन स्टडीज, पीएसएआईडीएस और डॉ फज्जुर रहमान सिद्दीकी, वरिष्ठ अनुसंधान फेलो, आईसीडब्ल्यूए ने चिंतित करने वाले क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर गहन चर्चा की। वक्ताओं ने ब्रिक्स और हिंद-प्रशांत जैसे बहुपक्षीय संस्थानों के बढ़ते महत्व पर जोर दिया। वार्ता का समापन क्षेत्रीय संकटों पर जोर देने के साथ हुआ - सीरियाई संकट, गाजा युद्ध और यमन संकट क्षेत्र में मानव सुरक्षा के लिए चिंता का विषय हैं और इन पर वैश्विक समुदाय को अत्यधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।
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