श्रीमती विजया राहटकरजी, अध्यक्ष, राष्ट्रीय महिला आयोग, सम्मानित विशेषज्ञ एवं मित्रो!
आज की हमारी दुनिया में, शक्ति राजनीतिक है; और लैंगिक संबंध भी। शक्ति आर्थिक है; इसीलिए महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रा को सामाजिक प्रगति का द्योतक माना जाता है। शक्ति सामाजिक कारकों से भी प्राप्त होती है; इसीलिए पुरुष पर्दा, वेश्यावृत्ति, बहुविवाह, अश्लीलता वगैरह के ज़रिए महिलाओं के शरीर पर नियंत्रण रखते हैं - ये ऐसे विषय हैं जिन पर हम आज व कल चर्चा करेंगे। और यही वजह है कि आज दुनिया के हर हिस्से में महिलाओं के खिलाफ अपराध और हिंसा इतनी बढ़ गई है।
लैंगिक शक्ति का खेल मानसिक भी है - पुरुषत्व को लेकर की जाने वाली कल्पना व प्रोपेगेंडा, महिलाओं पर शारीरिक हिंसा करने हेतु शरीर की ताकत का अहंकारी और क्रूर तरीके से इस्तेमाल, महिलाओं पर शब्दों के ज़रिए मानसिक हिंसा, महिलाओं की भावनाओं का लगातार दम घोंटने वाली असंवेदनशीलता एवं नैतिक दिवालियापन - ये सब दिखाते हैं कि आज हमारी दुनिया में लैंगिक संबंध कितने निचले स्तर पर पहुँच चुके हैं।
इसलिए अगर लैंगिक संबंध शक्ति से संबंधित हैं, तो वे आज की भू-राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में शक्ति के ऊर्ध्वाधर प्रभाव से अछूते नहीं रह सकते। इसके विपरीत, मौजूदा भू-राजनीतिक अशांति और जारी वैश्विक बदलाव स्थानीय-वैश्विक सतत स्थिति में बेहतर लैंगिक संबंधों के उभरने की गुंजाइश दे रहे हैं। व्यवस्थाओं के बीच बदलाव से गुजरती दुनिया, नई विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ती दुनिया की बातों के बीच वैश्विक या राष्ट्रीय स्तर पर मानदंडों को तय करने के साथ-साथ छोटे स्तर पर अच्छे व्यवहार के कार्यान्वयन एवं प्रोत्साहन के ज़रिए न्यायसंगत और समान लैंगिक संबंधों का ढाँचा स्थापित करने के अवसर भी मौजूद हैं – कुल मिलाकर, खेल के नए नियम - एक नया सामाजिक जुड़ाव। निश्चित रूप से, हम ऐसी नई विश्व व्यवस्था नहीं बना सकते जो महिलाओं को गरिमा एवं सम्मान के साथ उनका उचित स्थान न दे या पुरुषों को उनके भाग्य का निर्णायक बने रहने दे।
और, नई विश्व व्यवस्था कौन तय करेगा? इसे कौन आकार देगा? निश्चित रूप से, इस प्रक्रिया में महिलाओं को समान रूप से, यदि अधिक नहीं, तो योगदान देना होगा। आज हमारी दुनिया, जो न केवल अंतर-नस्लीय, अंतर-धार्मिक, अंतर-राज्यीय संघर्षों में उलझी हुई है, बल्कि बंटे हुए समाजों, बिखरते परिवारों और बिखरी हुई ज़िंदगियों से भी भरी हुई है, को संभालने की ज़रूरत है। क्या मैं खुलकर कह सकती हूँ कि पुरुषों ने इस मामले में अच्छा काम नहीं किया है! तो हाँ, दुनिया को संभालने की ज़रूरत है। और इसके लिए एक महिला के स्पर्श एवं महिला के आलिंगन से बेहतर क्या हो सकता है। आज दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती मानवीय असुरक्षा की है और मुझे लगता है कि इस चुनौती से निपटने में महिलाओं को एकजुट करना, यदि एकमात्र समाधान नहीं तो संभावित समाधान ज़रूर है।
हिंसा, कट्टरवाद, उग्रवाद, अतिवाद, घृणा को कम करने में महिलाओं की भूमिका आज और भविष्य में हमारी बदलती दुनिया के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। यह महिलाओं की अंतर्निहित शक्ति और बदलाव की चाहत के साथ-साथ एक अच्छा परिवेश ही है जो उन्हें और दूसरों को इसे संभव बनाने में प्रेरक शक्ति का काम करेगा। ऐसा इस तथ्य के बावजूद है कि वह पुरुषों की तुलना में कई गुना ज़्यादा काम का बोझ उठाती है और इस तथ्य के बावजूद कि ज़्यादातर मौकों पर खुद को अपर्याप्त साधनों और बीमारियों से घिरा हुआ पाती है - ऐसा मैट्रिक्स जिसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाना चाहिए।
रचनात्मकता, भावना एवं विचार के साथ नई विश्व व्यवस्था में इस परिवर्तन को शक्ति प्रदान करने हेतु हमें किस तरह की महिलाओं की ज़रुरत है? ऐसी महिलाएँ नहीं जो पुरुषों की तरह व्यवहार करें, बल्कि ऐसी महिलाएँ जो महिलाओं की तरह व्यवहार करें; ऐसी महिलाएँ नहीं जो निर्णय लेने व नेतृत्व करने के पुरुषों के तरीके की नकल करें, बल्कि ऐसी महिलाएँ जो अपने विवेक और अपनी भावनाओं के अनुसार कार्य करें; ऐसी महिलाएँ नहीं जो स्वतंत्रता का झूठा बोध रखती हों, बल्कि ऐसी महिलाएँ जो मानवीय गरिमा व सभी मनुष्यों की समानता में अपने दृढ़ विश्वास पर अड़ी रहें; ऐसी महिलाएँ नहीं जो पुरुषों के शक्ति प्रदर्शन एवं चित्रण के अनुसार चलें, बल्कि ऐसी महिलाएं जो अपने आसपास की दुनिया की अपनी समझ के अनुसार चलें; पारस्परिक संबंधों को निभाने में विफल महिलाएँ नहीं, बल्कि ऐसी महिलाएँ जो देखभाल, एक-दूसरे से साझा करने व देने की अपनी मातृ या स्त्री प्रवृत्ति का उपयोग करना जानती हों; और अंत में, लेकिन बेहद महत्वपूर्ण, ऐसी महिलाएँ नहीं जो केवल अपने अधिकारों के बारे में बहस करना जानती हैं, बल्कि ऐसी महिलाएँ जो अलग-अलग परिस्थितियों में अपनी ज़िम्मेदारियों को भी समान रूप से अच्छी तरह समझती हों।
अगला स्वाभाविक सवाल यह उठता है कि नई विश्व व्यवस्था में महिलाओं की जगह क्या होनी चाहिए? आप सभी मुझसे सहमत होंगे कि यह ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें महिलाएं नेतृत्व करे, न कि केवल अनुसरण करे, जहाँ वह केवल नियमों को मानने वाली न होकर नियम बनाने वाली हो, और जहाँ उसे निर्णय लेने का अधिकार हो। यह ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जो सदियों के उत्पीड़न को दरकिनार करते हुए, परछाईं से उभरी हो। यह ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जो स्त्री मूल्यों एवं विचारों को स्वतंत्र अभिव्यक्ति प्रदान करे, उन्हें फलने-फूलने दे, महिलाओं को अपने अंतर्ज्ञान व सहज ज्ञान का अनुसरण करने दे। यह ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जो महिलाओं को एक शिक्षिका, एक पालनकर्ता, एक दाता की भूमिका दे। महिलाएँ परिवार में स्वाभाविक रूप से एक सूत्र होती हैं; नई विश्व व्यवस्था उन्हें अपने इसी स्वाभाविक स्वरूप में रहने हेतु प्रोत्साहित करेगी - परिवार, पड़ोस, समुदायों, समाजों, देशों और विभिन्न देशों व भौगोलिक क्षेत्रों के संबंधों हेतु एक सूत्र के रूप में। यह बिखरती हुई दुनिया में महत्वपूर्ण नहीं तो मुख्य बात अवश्य है।
इस बदलती दुनिया में, अपने उद्भव में, अपने दम पर आगे बढ़ते हुए, महिलाएँ पुरुषों को अपना समर्थन देती हुई पाएँगी - ऐसा विकल्प की कमी के कारण नहीं, बल्कि इसलिए कि उनके पास कोई अन्य विकल्प ही नहीं है। यह अहसास बढ़ रहा है कि महिलाओं के नेतृत्व में सामाजिक प्रगति व विकास, महिलाओं को प्रमुख राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक भूमिकाओं में स्थान देना, उनकी मानसिक क्षमताओं एवं भावनात्मक शक्तियों का उपयोग व्यापक हित के साथ-साथ स्वयं के हित हेतु करना, उनके साथ समान सम्मान और गरिमा का व्यवहार करना, न केवल महिलाओं की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है, बल्कि समाज और राष्ट्रों की भी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
हम सभी जानते हैं कि सरकारें घरेलू स्तर पर और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर महिलाओं से जुड़े पतित एवं पतनशील मुद्दों को स्वीकार करने में आमतौर पर संकोच करती हैं। इसीलिए हमने इस विषय पर एक अकादमिक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने का विचार किया ताकि पर्दा प्रथा, वेश्यावृत्ति, बहुविवाह, विवाह की आयु, विधवा पुनर्विवाह जैसे विषयों पर आवाज़ उठाई जा सके, जो हमारे समाज के जीवंत मुद्दे हैं, लेकिन वैश्विक या क्षेत्रीय संस्थाओं के एजेंडे में संवाद या विचारों के आदान-प्रदान या इनसे निपटने, इन्हें रोकने करने या इन्हें समाप्त करने के तरीकों शामिल नहीं हैं। सम्मेलन में विचार-विमर्श हेतु चुने गए मुद्दे दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों की वास्तविक सामाजिक चिंताओं को दर्शाते हैं, फिर भी विभिन्न क्षेत्रों में परस्पर जुड़ाव की भावना भी प्रबल है। इस सम्मेलन की संकल्पना करते समय, हमने अपने दृष्टिकोण को वैश्विक रखने का प्रयास किया है - इसीलिए इसका शीर्षक 'विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में महिलाएँ: मुद्दे एवं परिप्रेक्ष्य' रखा गया है।
हमारे विचार-विमर्श का उद्देश्य महिलाओं के मुद्दों की अंतर-सांस्कृतिक समझ को बढ़ाना और इन चुनौतियों के समाधान हेतु भविष्य की रूपरेखा तैयार करना है। हमारे बीच भारत, कज़ाकिस्तान, रूस, अमेरिका, ब्रिटेन, इंडोनेशिया, मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका और अर्जेंटीना के विभिन्न विषयों के वक्ता मौजूद है, जिनमें लैंगिक अध्ययन में विशेषज्ञ व शिक्षक, अंतर्राष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक, वकील, मीडिया, सशस्त्र बलों एवं संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि शामिल हैं - जो पाँच महाद्वीपों के 9 देशों का प्रतिनिधित्व करते हैं। पुरुष और महिला दोनों वक्ताओं की उपस्थिति सुनिश्चित करके, यह सम्मेलन महिलाओं की समानता, उत्थान, सशक्तिकरण एवं न्यायसंगत लैंगिक संबंधों में पुरुषों को सशक्त भागीदार बनाने की भी वकालत करता है।
आप में से कुछ लोग सोच रहे होंगे कि हम लैंगिक संबंधों के लिए नए प्रतिमान, नए सामाजिक जुड़ाव और नई विश्व व्यवस्था की बात क्यों कर रहे हैं, जबकि दुनिया में युद्ध - यहाँ तक कि तृतीय विश्व युद्ध की संभावना - के बीच बहुत कम लोग इस पर ध्यान दे रहे हैं? इसका उत्तर देने हेतु मैं औपनिवेशिक उत्पीड़न के विरुद्ध भारत की प्रसिद्ध महिला स्वतंत्रता संग्राम की प्रतिपादक और स्वयं प्रसिद्ध कवयित्री सरोजिनी नायडू की बात को उद्धृत करना चाहूँगी, जिन्होंने कहा था, "आस्था वो पक्षी है जो भोर के अँधेरे में भी उजाले को महसूस करती है।"
इसके साथ ही, मैं इस सम्मेलन में होने वाले विचार-विमर्श को लेकर काफी उत्साहित हूँ, जो मुझे विश्वास है कि हमारे सामने मौजूद संभावनाओं की सकारात्मक और अच्छी बातों पर केंद्रित होंगे।
अब मैं राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष श्रीमती विजया के. रहाटकर को हमारे सम्मेलन में विशेष भाषण देने हेतु आमंत्रित करती हूँ।
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