बीते कुछ दशकों में पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका का क्षेत्र वैश्विक भू– राजनीति का एक केंद्र बिंदु बन गया है। पिछले कई वर्षों से क्षेत्रीय राजनीतिक अयन स्थायी अस्थिरता और राजनीतिक अनिश्चितता भरा रहा है। अरब के बड़े क्षेत्र में लंबे समय से जारी युद्धों के कारण रणनीतिक समुदाय के कई लोगों का मानना है कि अस्थिरता एवं अनिश्चितता आने वाले वर्षों में क्षेत्रीय राजनीति को आकार देने वाली है।
इज़रायल– गाज़ा युद्ध की वजह से, अलग– अलग पैमाने और स्तर की एक के बाद एक विनाशकारी घटनाएं सामने आई हैं जो निकट भविष्य में रुकने वाली नहीं लगतीं। याद कीजिए किस तरह लेबनान में हिज़बुल्लाह ने बिना कुछ सोचे– समझे इज़रायल के खिलाफ हमास का साथ दिया था और किस तरह यमन में हूथियों ने भी ऐसा ही रास्ता चुना और हमास के साथ एकजुटता दिखाते हुए लाल सागर में जहाजों को निशाना बनाया था। हमले आज भी जारी हैं।
इज़रायल– गाज़ा युद्ध के एक साल के भीतर ही हिज़बुल्लाह की लड़ने की क्षमता जवाब दे गई। आखिरकार दिसंबर 2024 में युद्ध विराम लागू कर दिया गया। हालाँकि, दक्षिणी लेबनान– शिया बहुल क्षेत्र एवं हिज़बुल्लाह का केंद्र, में, इज़रायली सैन्य हमले जारी रहे हैं।
लेबनान में नाम के युद्धविराम के तुरंत बाद सीरिया में राष्ट्रपति बश़र अल– असद को पद से हटा दिया गया जिससे इज़रायल को बार– बार सैन्य कार्रवाई करने का एक रणनीतिक बहाना मिल गया। इसके अलावा, ईरान और यमन में हुए वर्तमान घटनाएं बताती हैं कि किस तरह इज़रायल की बहु– मोर्चा सैन्य कार्रवाइयों ने, यदि पूरी तरह से बर्बाद नहीं भी किया हो तो क्षेत्र की अधिकांश इज़रायल विरोधी शक्तियों को कमज़ोर ज़रूर कर दिया है।
1980 के दशक के मध्य में लेबनान की राजनीति में एक मजबूत शक्ति के रूप में उभरने के बाद से, हिज़बुल्लाह ने इज़रायल के खिलाफ कई युद्ध लड़े हैं– कुछ सफल रहे, कुछ असफल। लेकिन आज ऐसा लगता है कि उसने अपनी रणनीतिक गहराई, सैन्य क्षमता और जन समर्थन को खो दिया है। महासचिव हसन नसरल्लाह समेत इसके कई बड़े नेता गुप्त सैन्य अभियानों में मारे जा चुके हैं।
आज, ऐसा लगता है कि हिज़बुल्लाह ने देश में अपनी राजनीतिक अपील खो दी है और कई लोग उसकी सैन्य शक्ति की वैधता पर सवाल उठा रहे हैं। उससे अपने हथियार डाल देने को कहा जा रहा है। इसके अनेक घरेलू और क्षेत्रीय विरोधियों का मानना है कि हिज़बुल्लाह के शस्त्रागार को समाप्त कर दिया जाना चाहिए और उसकी जगह राष्ट्र की संरचना को मजबूत बनाना चाहिए। अपने चार दशक के अस्तित्व के ज्यादातर समय में हिज़बुल्लाह ने अपनी मिलिशिया बनाए रखी है और देश की राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लिया है, भले ही कभी– कभार निरस्त्रीकरण की मांगे निष्फल रही हों।
देश में और देश के बाहर बदलती राजनीतिक गतिशीलता को देखते हुए हिज़बुल्लाह का लगातार युद्ध करते रहने के खिलाफ़ राय रखने वालों को नई शक्ति मिली है। इस बढ़ते दबाव के कारण राष्ट्रीय राजनीति में हिज़बुल्लाह की कम होती भूमिका, इज़रायल का बढ़ता प्रभुत्व, हिज़बुल्लाह के खिलाफ बढ़ते बाहरी दबाव (इज़रायल, अमेरिका और खाड़ी देशों का संदर्भ) और लेबनान की नई सरकार की अपनी हठ नीति है– जिसमें हिज़बुल्लाह को हथियार रखने, देश में राज्य की तरह काम करने और राष्ट्र की वैधता को चुनौती देने की इज़ाजक नहीं दी जा रही है।[i]
हिज़बुल्लाह और उसके विसैन्यीकरण का सवाल
हिज़बुल्लाह (अल्लाह की पार्टी) लेबनान की सबसे शक्तिशाली धार्मिक– सह– राजनीतिक– सह– उग्रवादी संस्थाओं में से एक रही है और 1985 में अपनी स्थापना के बाद के दशकों में,[ii] इसने देश में एक अपरिहार्य राजनीतिक शक्ति का दर्जा हासिल कर लिया है। इसकी उत्पत्ति 1980 के दशक के आरंभ में लेबनान में फिलिस्तीनी शरणार्थियों के खिलाफ युद्ध के विरुद्ध इज़रायल की अभूतपूर्व सैन्य कार्रवाई के बाद सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक पुनरुत्थान से विकसित राजनीतिक स्थिति में देखी जा सकती है।[iii]
सबसे पहले यह लेबनानी प्रतिरोध बलों में एक गुट के रूप में उभरा था जिसने देश में इज़रायल विरोधी संगठनों के खिलाफ इज़रायली सैन्य बलों द्वारा आक्रामक रुख अपनाने के तुरंत बाद सुलह की राह पर बढ़ चला था। धीरे– धीरे हिज़बुल्लाह एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में विकसित हुआ और पूर्ण रूप से राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश कर गया। वर्ष 1992 में, पहली बार, इसने नेशनल असेंब्ली में आठ सीटें जीतीं।[iv]
राष्ट्रीय राजनीति में इसका अस्तित्व असाधारण है। चाहे यह देश में काम करे या देश के बाहर काम करे। आधुनिक राजनीतिक अर्थों में जवाबदेही के बिना, देश की सत्ता संरचना पर इसका निश्चित एकाधिकार है,[v] क्योंकि इज़रायल– लेबनान सीमा पर इसका पूर्ण सैन्य नियंत्रण रहा है और सीरिया से लगी लेबनान की सीमा पर भी इसका जबरदस्त नियंत्रण रहा है। यह सुविधानुसार देश और गैर– राष्ट्रीय कारक के रूप में बदलता रहा है, जिससे इलाके में उसकी पहचान धुंधली बनी रही और क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती चली गई।
यह पहली बार नहीं है कि लेबनान में हिज़बुल्लाह के निरस्त्रीकरण का मुद्दा उठा है। हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करने की आज की मांग संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव (1701) से उपजी है जो 11 अगस्त 2006 को इज़रायल– हिज़बुल्लाह युद्ध के बाद पारित हुआ था, जो लगभग एक महीने तक चला था।[vi] प्रस्ताव (1701) में दोनों देशों के बीच शत्रुता समाप्त करने का आग्रह करने के अलावा, लेबनान के सभी मिलिशियों द्वारा हथियारों के पूर्ण समर्पण की भी मांग की गई थी। प्रस्ताव 1701 से पहले, 2004 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा एक और प्रस्ताव (1559) पारित किया गया था जिसमें सीरियाई सेनाओं को लेबनान से वापस जाने के आह्वान के अलावा, सभी लेबनानी और गैर– लेबनानी मिलिशियाओं के हथियारों को नष्ट करने की बात कही गई थी। [vii]
प्रस्ताव सं. 1559 के अनुसार, सीरियाई सेनाएं लेबनान से हट गईं लेकिन हिज़बुल्लाह ने हथियार डालने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि वह कोई मिलिशिया नहीं बल्कि एक राष्ट्रीय प्रतिरोध आंदोलन है।[viii] इसके बाद, हिज़बुल्लाह का शस्त्रीकरण जारी रहा और लेबनान के राजनीतिक इतिहास में पहली बार, 2006 में प्रधानमंत्री फौद सानियोर के नेतृत्व में हिज़बुल्लाह सरकार का हिस्सा बन गया।[ix]
मार्च 2006 में लेबनान में आयोजित राष्ट्रीय सहमति वार्ता में प्रस्ताव (1559) के आलोक में हिज़बुल्लाह के हथियारों को नष्ट करने के मुद्दे पर चर्चा हुई। शरणार्थी शिविरों के बाहर रहने वाले फ़िलिस्तीनी मिलिशिया को निरस्त्र करने का फैसला किया गया। हिज़बुल्लाह ने तब तक वार्ता में भाग लेने से इनकार कर दिया जब तक कि उसे मिलिशिया के रूप में नहीं बल्कि प्रतिरोध के रूप में संबोधित नहीं किया गया, एक ऐसा वर्गीकरण जो उसे निरस्त्रीकरण को रोकता है। इस पर सहमति बन गई।[x]
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने मई 2006 में पारित अपने एक अन्य प्रस्ताव (1680) में, फ़िलिस्तीनी मिलिशिया को निरस्त्र करने के राष्ट्रीय सहमति वार्ता के फैसले का स्वागत किया लेकिन इस बात पर ज़ोर दिया कि लेबनान में दूसरे सभी उग्रवादी समूहों को निरस्त्र करने के प्रयास जारी रहने चाहिए।[xi] राष्ट्रीय सहमति वार्ता के फैसले के अनुसार, कई सांप्रदायिक मिलिशिया को भंग कर दिया गया और उन्हें निरस्त्र कर दिया गया लेकिन सरकार अमल या हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करने में विफल रही, क्योंकि दोनों ही देश में शक्तिशाली शिया गुट हैं।
ईरान और हिज़बुल्लाह
ईरान–हिज़बुल्लाह संबंध कभी भी गुप्त नहीं रहे हैं। इसके अधिकांश संस्थापक नेताओं, जैसे मोहम्मद हुसैन फ़ज़ुल्लाह और शम्सुद्दीन ने अपनी धार्मिक शिक्षा ईरान के मदरसों में प्राप्त की थी।[xii] हिज़बुल्लाह का वर्तमान नेतृत्व ईरान में प्रचलित शिया धार्मिक धर्मशास्त्र से प्रेरित है। वे अली ख़ामेनेई के भी कट्टर अनुयायी हैं और उनके मिलिशिया ईरानी अल– कुद्स बलों के साथ घनिष्ठ संबंध रखते हैं। लेबनान में हिज़बुल्लाह पर हमेशा से देश में ईरानी राजनीतिक एजेंडा थोपने का आरोप लगाया जाता रहा है और दूसरे शिया गुटों को ईरानी शासन के साथ उसके वैचारिक और राजनीतिक संबंधों के कारण कभी– कभी उसके साथ गठबंधन करने में समस्या होती है।
सीरिया और ईरान दोनों ही हाल तक हिज़बुल्लाह को हथियार और समर्थन देते रहे और इज़रायल विरोधी ताकतों को हथियार पहुँचाने के लिए उसे प्रॉक्सी के रूप में इस्तेमाल करते रहे।[xiii] वर्षों तक, हिज़बुल्लाह सीरिया और ईरान, दोनों के लिए इज़रायल के विरुद्ध एक अग्रिम पंक्ति के बफ़र ज़ोन की तरह काम करता रहा। यहाँ यह याद रखना ज़रूरी है कि इज़रायल इस वर्ष जून में ईरान पर तभी हमला कर पाया जब एक सैन्य शक्ति के रूप में हिज़बुल्लाह का दमन हो गया और सीरिया में राष्ट्रपति असद को सत्ता से हटा दिया गया।
हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करने के मुद्दे पर सरकार और हिज़बुल्लाह के बीच बढ़ते टकराव और हिज़बुल्लाह को उसके लंबे समय से चले आ रहे समर्थन के कारण, ईरान ने सरकार द्वारा हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करने के फैसले की निंदा की।[xiv] अप्रैल 2025 में, लेबनान के विदेश मंत्री यूसुफ राज़िया ने लेबनान में ईरानी राजदूत को बुलाया था और उनके बयान– 'हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करना दुश्मन देशों की एक चाल थी', पर अपनी नाराज़गी जताई थी।[xv]
15 अगस्त 2025 को, आध्यात्मिक नेताओं की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव और मज़लिस (विधानसभा),[xvi] पूर्व अध्यक्ष अली लारीजानी ने लेबनान का दौरा किया और हिज़बुल्लाह के अधिकारियों के साथ हुई बैठक के दौरान कहा कि हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करने की कोई भी योजना एक सपना है जो सच नहीं होगा। उन्होंने इसे संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़रायल द्वारा निर्देशित नीति बताया।[xvii]
अपनी यात्रा के दौरान, लेबनानी राष्ट्रीय नेतृत्व ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया और लेबनान के विदेश मंत्री ने कहा कि लेबनान किसी भी परिस्थिति में इस प्रकार के अस्वीकार्य आचरण को बर्दाश्त नहीं करेगा। किसी भी बाहरी पक्ष को अनुमति नहीं देगा। लेबनान के वरिष्ठ अधिकारियों ने ईरान पर अपनी संप्रभुता का उल्लंघन करने का भी आरोप लगाया क्योंकि ईरान ने क्षेत्र में शक्ति संतुलन को बाधित करने के लिए हमेशा हिज़बुल्लाह को अपनी रणनीतिक संपत्ति के रूप में इस्तेमाल किया है।[xviii]
अब क्यों?
फरवरी 2025 में लेबनान में दो साल से अधिक समय तक चली अंतरिम कैबिनेट के बाद नई सरकार बनने के तुरंत बाद हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करने का सवाल सरकार के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण काम बन गया। 5 अगस्त 2025 को, लेबनान की कैबिनेट ने एक योजना को मंजूरी दी जिसमें हिज़बुल्लाह और देश के दूसरी मिलिशिया संगठनों से सरकार के समक्ष हथियार डालने का आह्वान किया गया था। सरकार ने लेबनानी राष्ट्रीय सेना से अगस्त के आखिर तक एक खाका पेश करने और साल के अंत तक खाका में निर्धारित उद्देश्य को पूरा करने को कहा था।[xix]
सितंबर 2025 के पहले सप्ताह में, लेबनानी सेना के कमांडर रोडॉल्फ हेइकल ने हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करने के लिए पांच चरणों वाली योजना प्रस्तुत की, जो तीन माह तक चलेगी। इस योजना में इस बात का भी प्रावधान किया गया है कि साल के अंत तक हिज़बुल्लाह और अन्य मिलिशिया, लिटानी नदी के दक्षिण में पूरे इलाके में पूर्ण रूप से निरस्त्र हो जाएंगे।[xx]
इससे पहले यूसुफ़ राजिया ने कहा था कि हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करने का सरकार का फैसला किसी भी स्थिति में बदला नहीं जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा था कि शिया संप्रदायों को डरने की कोई ज़रूरत नहीं है और राजिया ने हिज़बुल्लाह पर शियाओं को अपनी विचारधारा का बंधक बनाने का भी आरोप लगाया।[xxi] लेबनान के आर्थिक मंत्री, अमीर बिसात ने कहा है कि हिज़बुल्लाह के पास हथियार होना देश के आर्थिक विकास में एक बड़ी बाधा है।[xxii]
हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करने के इस बढ़ते दबाव के कई कारण हैं लेकिन सबसे स्पष्ट कारण हिज़बुल्लाह की अपनी बढ़ती कमियों और अपने रणनीतिक आकाओं (ईरान और सीरिया) से समर्थन का नुकसान ही लगता है। इज़रायल– गाज़ा युद्ध के बीते दो वर्षों ने न केवल पूरे क्षेत्र में इज़रायल के सैन्य प्रभाव को बढ़ाया है बल्कि हिज़बुल्लाह को राष्ट्रीय राजनीति में अप्रासंगिक भी बना दिया है।
हमास के साथ– साथ हिज़बुल्लाह पर भी खुद को निरस्त्र करने के लिए अभूतपूर्व दबाव है और यह दबाव सीधे तौर पर खाड़ी राजतंत्रों एवं उनके अमेरिकी साझेदारों के बीच क्षेत्र में किसी भी मिलिशिया की उपस्थिति के खिलाफ बनी आम सहमति से जुड़ा हुआ है।
हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करने की क्षेत्रीय और वैश्विक मांग में सबसे आगे इज़रायल है, जिसे अमेरिका का पूरा समर्थन मिला हुआ है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने हाल ही में कहा था कि यदि लेबनान सरकार हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करने के लिए ठोस कदम उठाती है तो इज़रायल लेबनान में अपनी सैन्य उपस्थिति को कम करने पर विचार कर सकता है।[xxiii] नेतन्याहू ने यह भी कहा कि अब समय आ गया है कि लेबनान और इज़रायल हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करने के साझा लक्ष्य के साथ आगे बढ़ें।
दूसरी तरफ, अमेरिका ने लेबनान सरकार से बार– बार हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करने का आह्वान किया है और लेबनान में अमेरिकी दूत टॉम बैरक ने दक्षिणी सीमा से धीरे– धीरे सैनिकों को हटाने का आग्रह किया है ताकि नई सरकार के लिए हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करने का मार्ग प्रशस्त हो सके।[xxiv]
लेबनान के दौरे पर आए अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, टॉम बैरक ने 25 अगस्त 2025 को कहा कि इज़रायल की इस क्षेत्र पर कब्ज़ा करने की कोई योजना नहीं है लेकिन जब तक इज़रायल हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करने की सरकारी योजना की समीक्षा नहीं करता, तब तक वह वहाँ से नहीं हटेगा। उन्होंने यह भी कहा कि बदले में, इज़रायल उन पांच स्थानों से हटने का प्रतिप्रस्ताव देगा, जहाँ इज़रायल की सेना कब्ज़ा कर चुकी है, जिन्हें 29 नवंबर की युद्ध विराम योजना के तहत उन्हें छोड़ना था।[xxv]
अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के एक दूसरे सदस्य ने कहा कि हिज़बुल्लाह के निरस्त्रीकरण के बाद इज़रायल लेबनान को अलग नज़रिए से देखेगा।[xxvi] यह भी बताया जा रहा है कि इज़रायल– लेबनान सीमा के आसपास एक ट्रम्प आर्थिक क्षेत्र विकसित करने की भी योजना है। इस फैसले को अमेरिका द्वारा हिजबुल्लाह को इज़रायल– लेबनान सीमा के पास भविष्य में खुद को फिर से बनाने की किसी भी कोशिश से वंचित करने और हिज़बुल्लाह के विघटन एवं निरस्त्रीकरण के बाद इज़रायल और लेबनान के बीच किसी भी टकराव से बचने के कदम के रूप में देखा जा रहा है।
लेबनान की सरकार के वर्तमान कदम के आर्थिक पहलू को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। वर्षों की अस्थिरता एवं अराजकता जैसी स्थिति के कारण राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था तबाह हो गई है। क़तर और सऊदी अरब पहले ही दक्षिणी लेबनान के युद्धग्रस्त क्षेत्र के पुनर्निर्माण में निवेश करने का वादा कर चुके हैं।[xxvii] नई सरकार को पता है कि यह सहायता तब तक नहीं मिलेगी जब तक हिज़बुल्लाह के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई नहीं की जाती, विशेषरूप से खाड़ी देशों एवं समूह के बीच असहज संबंधों को देखते हुए।
लेबनान के प्रधानमंत्री नवाब सलाम के साथ हाल ही में हुई एक बैठक में, जॉर्डन के राजा अब्दुल्ला द्वितीय ने कहा कि उनका देश लेबनान सरकार को उसकी सुरक्षा को मज़बूत करने एवं उसकी संप्रभुता की रक्षा करने में पूरा समर्थन देता है।[xxviii] लेबनान की नई सरकार अपनी भू– राजनीतिक और रणनीतिक आवश्यकताओं एवं आर्थिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रही है।
28 अगस्त को, लेबनानी सेना ने टायर शहर के दक्षिणी हिस्से में शिविरों में रह रहे फ़िलिस्तीनी शर्णार्थियों से हथियार ज़ब्त करने के लिए अपने अभियान का पहला दौर शुरू किया। इन शिविरों से बी–2 (B-2) मिसाइलों समेत हल्के और भारी हथियारों से लदे कई ट्रक निकलते देखे गए।[xxix] सेना की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि यह कदम राष्ट्रपति महमूद अब्बास और राष्ट्रपति औन के बीच मई में हुई बैठक में लिए गए फैसले के मद्देनज़र उठाया गया है।[xxx]
हिज़बुल्लाह की प्रतिक्रिया
चूँकि नई सरकार ने हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करने की अपनी योजना का खुलासा कर दिया है इसलिए हिज़बुल्लाह ने इस फैसले की निंदा करने में ज़रा भी देर नहीं लगाई। देश के दो प्रमुख शिया गुटों, अमल मूवमेंट और हिज़बुल्लाह ने एक संयुक्त बयान जारी कर इस फैसले को राष्ट्रीय हित का उल्लंघन एवं राष्ट्रीय सहमति वार्ता का उल्लंघन बताया है। बयान में कहा गया है कि उनकी अस्वीकृति उन हथियारों को संरक्षित करने के अधिकार की पुष्टि है जिन्होंने दुश्मनों (यानी इज़रायल) की कमर तोड़ने की अपनी क्षमता को साबित कर दिया है।[xxxi]
हिज़बुल्लाह ने लेबनान की सरकार पर इज़रायल की मर्ज़ी के आगे घुटने टेकने का भी आरोप लगाया और कहा कि वह अपने हथियार नहीं छोड़ेगा और ज़रूरत पड़ने पर अपने हथियार बनाए रखने के लिए युद्ध भी लड़ेगा।[xxxii] उन्होंने इस बात की भी धमकी दी है कि इस दिशा में उठाया गया कोई भी कदम गृहयुद्ध को जन्म दे सकता है,[xxxiii] लेकिन लेबनान के विदेश मंत्री ने इसका खंडन करते हुए कहा कि सरकार के निर्णय को कोई भी नहीं पलट सकता।
हिज़बुल्लाह के नवनियुक्त महासचिव नईम कासिम ने कहा कि यदि इज़रायली सेनाएं दक्षिणी लेबनान की कब्ज़े वाली ज़मीन से पीछे नहीं हटती हैं, कैदियों को रिहा नहीं करती हैं, अपने हमलों को नहीं रोकतीं और वार्ता शुरू नहीं करतीं तो हिज़बुल्लाह अपने हथियार नहीं डालेगा और कर्बला जैसी जंग कर सकता है।[xxxiv]
नईम कासिम ने यह भी कहा कि यदि कोई आंतरिक कलह होती है तो उसकी जिम्मेदारी सरकार की होगी।[xxxv] इमाम हुसैन की पुण्यतिथि की पूर्व संध्या पर एक जनसमूह को संबोधित करते हुए,[xxxvi] कासिम ने कहा कि उनके फैसले के खिलाफ सरकार विरोधी सड़क विरोध प्रदर्शन अमेरिकी दूतावास तक भी पहुँच सकते हैं।[xxxvii] इसी तरह की भावनाएं राष्ट्रीय असेंबली के अध्यक्ष और अमल पार्टी के नेता नबीह बेरी ने भी व्यक्त कीं,[xxxviii] उन्होंने कहा कि हथियारों के कब्जे का मामला बातचीत का विषय नहीं हो सकता है और इस मुद्दे पर केवल राष्ट्रीय सहमति वार्ता के आलोक में ही चर्चा की जा सकती है।
उन्होंने उन हथियारों के भविष्य का निर्धारण करने के लिए एक और राष्ट्रीय संवाद का आह्वान किया और कहा कि हथियार लेबनानी प्रतिरोध आंदोलन का सम्मान और गौरव है।[xxxix] उन्होंने यह भी कहा कि मिलिशिया को निरस्त्र करना न केवल युद्ध विराम समझौते का विकल्प है जिसे इज़रायल नज़रअंदाज कर रहा है बल्कि यह सौदेबाज़ी और दबाव बनाने का एक तरीका है।
हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करने और इस काम में राष्ट्रीय सेना को शामिल करने की प्रक्रिया पर अपनी नाराज़गी व्यक्त करते हुए, हिज़बुल्लाह की राजनीतिक परिषद के एक सदस्य, श्री मोहम्मद अल–खांसा ने कहा कि देश ने सेना को शामिल कर बड़ी गलती की है क्योंकि राजनीतिक मुद्दे को सैन्य रूप से नहीं बल्कि राजनीतिक रूप से हल किया जाना चाहिए। इसके अलावा, सेना राष्ट्र के लिए है और इसे अपने ही लोगों के खिलाफ नहीं खड़ा किया जाना चाहिए।[xl]
उन्होंने यह भी कहा कि सऊदी अरब में घरेलू राजनीतिक प्रतिक्रियाएं नहीं होनी चाहिए और किसी भी राष्ट्रीय मुद्दे का समाधान राष्ट्रीय क्षेत्रों में ही किया जाना चाहिए। सुप्रीम इस्लामिक शिया काउंसिल के उपाध्यक्ष अली अल– ख़तीब ने प्रतिरोध (हिज़बुल्लाह) के प्रति अहंकार की निंदा की और कहा कि लेबनान को इज़रायल को उपहार के रूप में नहीं दिया जाना चाहिए।[xli]
हिज़बुल्लाह समर्थक पार्टी ‘लॉयल्टी टू द रेजिस्टेंस’ के एक सदस्य हसन एज़ेद्दीन ने कहा कि सरकार का यह फ़ैसला इजरायल– अमेरिकी दबाव के आगे उसके आत्मसमर्पण को दर्शाता है और यह एक बड़ा गुनाह है। उन्होंने एक दुश्मन देश के समाने अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता का समर्पण करने के लिए लेबनान सरकार की भी निंदा की।[xlii]
हिज़बुल्लाह द्वारा हथियारों के समर्पण के मुद्दे को इज़रायली सेना की वापसी से जोड़ना, अतीत से मुँह मोड़ने जैसा है क्योंकि उसने पहले भी कई बार कहा है कि कोई भी परिस्थिति हिज़बुल्लाह को निरस्त्रीकरण के लिए मज़बूर नहीं कर सकती। लेकिन अपने विसैन्यीकरण को इज़रायली वापसी से जोड़ना, सरकार द्वारा उसे निरस्त्र करने के अभियान के खिलाफ जंग को लंबा खींचने की एक सोची– समझी एवं रणनीतिक चाल प्रतीत होती है। ऐसी खबरें हैं कि अमेरिकी प्रशासन ने इज़रायल से लेबनान में अपनी गैर– ज़रूरी सैन्य कार्रवाइयों को कम करने के लिए कहा है ताकि हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करने की कार्रवाई में तेज़ी लाई जा सके या उसे क्रियान्वित किया जा सके।
निष्कर्ष
उपरोक्त आख्यानों को देखते हुए यह तर्क दिया जा सकता है कि हिज़बुल्लाह को निरस्त्र करने का निर्णय एक प्रकार से ऐतिहासिक है। यदि इज़रायल ने अपने हालिया युद्ध में हिज़बुल्लाह को भारी क्षति न पहुँचाई होती और उसका मुख्य राजनीतिक एवं सैन्य समर्थक सीरियाई शासन ध्वस्त न हुआ होता तो निरस्त्रीकरण का प्रश्न ही नहीं उठता। लेबनान की नई सरकार और हिज़बुल्लाह विरोधी क्षेत्रीय शक्तियां राष्ट्रीय राजनीति में हिज़बुल्लाह की घटती भूमिका को देखते हुए उसकी बढ़ती कमज़ोरी का फायदा उठाने की कोशिश कर रही हैं।
कमज़ोर होते हुए भी हिज़बुल्लाह लोगों को इस दावे के साथ लामबंद करना जारी रखे हुए है कि वही एकमात्र ऐसी शक्ति है जो इज़रायल का सामने करने और लेबनान की सीमा की रक्षा करने में सक्षम है। हिज़बुल्लाह ने अपनी ओर से चेतावनी दी है कि वह उसे निरस्त्र करने के प्रयासों का विरोध करेगा। दरअसल, हिज़बुल्लाह पहले ही सरकार की इस नीति को बाहरी दबाव के आगे समर्पण बता रहा है।
हालाँकि, लेबनान की नई सरकार और प्रमुख बाहरी शक्तियों ने हिज़बुल्लाह के संकट के बावजूद उसे कड़ा संदेश देना जारी रखा है। इसके अलावा, इस क्षेत्र की राजनीति को बदलने की क्षमता रखने वाले कदम के तहत, इज़रायल ने संकेत दिया है कि यदि हिज़बुल्लाह को निरस्त्र और भंग कर दिया जाता है तो वह अपनी लेबनानी नीति, सैन्य और सीमाओं पर अपने रुख में बदलाव कर सकता है।
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*डॉ. फज्जुर रहमान सिद्दीकी आईसीडब्ल्यूए (ICWA) में वरिष्ट शोध अध्येता हैं।
अस्वीकरण: व्यक्त किए गए विचार लेखिका के व्यक्तिगत विचार हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण
[i] Bilqeez, Abduallah. Hezbollah Min-al-Tahreer El-al-Rad (1984-2006). (Lebanon: Centre for Studies of the Arab Unity). p.n.
[ii] Bilqeez, Abduallah. Hezbollah Min-al-Tahreer El-al-Rad (1984-2006). (Lebanon: Centre for Studies of the Arab Unity). p.n.
[iii] Bilqeez, Abduallah. Hezbollah Min-al-Tahreer El-al-Rad (1984-2006). (Lebanon: Centre for Studies of the Arab Unity). p.n. 64.
[iv] Bilqeez, Abduallah. Hezbollah Min-al-Tahreer El-al-Rad (1984-2006). (Lebanon: Centre for Studies of the Arab Unity). p.n. 38.
[v] Lina Khatib, How Hezbollah holds sway over Lebases state, Research Paper: Middle East and North Asia Program, Chatham House, June 2021. Accessed https://www.chathamhouse.org/2021/06/how-hezbollah-holds-sway-over-lebanese-state September 4, 2025.
[vi] Joseph Aoun: Israel defies the will of international al community by attacking UNIFIL, Rail-Youm (Arabic). September 4, 2025. Accessed https://sl1nk.com/dzEVs September 6, 2025.
[vii] UN Security Council Resolution 1559. September 2 2004. Middle East Web, September 2, 2024, Accessed http://mideastweb.org/1559.htm September 4, 2025.
[viii] Bilqeez, Abduallah. Hezbollah Min-al-Tahreer El-al-Rad (1984-2006). (Lebanon: Centre for Studies of the Arab Unity). p.n.62.
[ix] Bilqeez, Abduallah. Hezbollah Min-al-Tahreer El-al-Rad (1984-2006). (Lebanon: Centre for Studies of the Arab Unity). p.n.64.
[x] Martin Wahlisch, The Lebanese National Dialogue, Bergoh Foundation, March 2007. Accessed https://berghof-foundation.org/files/publications/NDH_Lebanon.pdf September 11, 2025.
[xi] http://unscr.com/en/resolutions/1680
[xii] Bilqeez, Abduallah. Hezbollah Min-al-Tahreer El-al-Rad (1984-2006). (Lebanon: Centre for Studies of the Arab Unity). p.n.35.
[xiii] Anthony H. Cordesman, Lebanese Security and Hezbollah. Centre for Strategic and International Studies. July 14, 2006. Accessed https://csis-website-prod.s3.amazonaws.com/s3fs-public/legacy_files/files/media/csis/pubs/060714_lebanese_security.pdf September 7, 2025.
[xv] https://www.newarab.com/news/lebanon-fm-summon-iranian-envoy-over-x-post-hezbollah-arms
[xvi] Lebanese Foreign Minister: The decision to disarm Hezbollah is irreversible, Al-Quds-Al-Arabia, August 5, 2025. Accessed https://l1nq.com/lpJM September 7, 2025.
[xvii] Fix Your Own’s Woes: Beirut condemns Iran over Hezbollah disarming remarks, Iran International, August 9 2025. Accessed https://www.iranintl.com/en/202508099703 September 10 2025.
[xviii] Yassar Aslan, Hezbollah once Again, Al-Qaherah 24 (Arabic), August 15, 2025. Accessed https://www.cairo24.com/2262696 September 6, 2025.
[xix] Lebanese Foreign Minister: The decision to disarm Hezbollah is irreversible, Al-Quds-Al-Arabia, August 5, 2025. Accessed https://l1nq.com/lpJM6 September 7 2025.
[xx] Lebanese Foreign Minister: The army to disarm the Hezbollah within three months, Al-Quds Al-Arabi (Arabic), September 9, 2025. Accessed https://l1nq.com/Hj3xK September 9, 2025.
[xxi] Lebanese Foreign Minister: The decision to disarm Hezbollah is irreversible, Al-Quds-Al-Arabia, August 5, 2025. Accessed https://l1nq.com/lpJM September 7, 2025.
[xxii] Lebanese Economic Minister: monopoly over weapons by other than sate is an obstacle to economic growth, Al-Sharq (Arabic). September 12, 2025. Accessed https://l1nq.com/tJFHm September 13 2025.
[xxiii] Netanyahu calls for disarming Hezbollah in exchange for reducing Israeli military actives, Al-Ikhbar (Arabic). August 25, 2025. Accessed https://l1nq.com/QQLqp September 7, 2025.
[xxiv] Axios: Trump Plans to develop special economic zone in southern Lebanon, Al-Ikhbar (Arabic). August 22, 2025. Accessed https://sl1nk.com/bzEvU September 7, 2025
[xxv] US Envoy: Israeli withdrawal l is linked to Hezbollah disarmament. Al-Sharq (Arabic). August 26, 2025. Accessed https://sl1nk.com/kE0h5 September 2, 2025.
[xxvi] US Envoy: Israeli withdrawal l is linked to Hezbollah disarmament. Al-Sharq (Arabic). August 26, 2025. Accessed https://sl1nk.com/kE0h5 September 2, 2025.
[xxvii] Axios: Trump Plans to develop special economic zone in southern Lebanon, Al-Ikhbar (Arabic). August 22, 2025. Accessed https://sl1nk.com/bzEvU September 12, 2025.
[xxviii] King of Jordan: Jordan fully supports Lebanon in its effort to strengthen its security, Al-Sharq (Arabic). August 19, 2025. Accessed https://l1nq.com/UYqqJ September 5, 2025.
[xxix] https://www.nna-leb.gov.lb/en/justice-law/804774/palestinian-weapons-handover-to-lebanese-army-at-t
[xxx] The Lebanese army officially begins receiving the Palestinian arms, Rail Youm (Arabic). August 28, 2025. Accessed https://l1nq.com/dovZE September 10, 2025.
[xxxi] Hezbollah and Amal to hold rally, Al-Ikhbar (Arabic). August 25, 2025. Accessed https://sl1nk.com/JjS9G September 3, 2025.
[xxxii] Yassar Aslan, Hezbollah once Again, Al-Qaherah 24 (Arabic) August 15, 2025. Accessed https://www.cairo24.com/2262696 September 6, 2025.
[xxxiii] Lebanese Foreign Minister: The decision to disarm Hezbollah is irreversible, Al-Quds-Al-Arabia, August 5, 2025. Accessed https://l1nq.com/lpJM6 September 7, 2025.
[xxxiv] Lebanese Foreign Minister: The decision to disarm Hezbollah is irreversible, Al-Quds-Al-Arabia, August 5, 20025. Accessed https://sl1nk.com/lpJM6 September 7, 2025.
[xxxv] Lebanese Foreign Minister: The decision to disarm Hezbollah is irreversible, Al-Quds-Al-Arabia, August 5, 2025. Accessed https://sl1nk.com/lpJM6 September 7, 2025.
[xxxvi] Lebanese Foreign Minister: The decision to disarm Hezbollah is irreversible, Al-Quds-Al-Arabia, August 5, 20025. Accessed https://sl1nk.com/lpJM6 September 7, 2025.
[xxxvii] Lebanese Foreign Minister: The decision to disarm Hezbollah is irreversible, Al-Quds-Al-Arabia, August 5, 2025. Accessed https://sl1nk.com/lpJM6 September 7, 2025.
[xxxviii] This is an older party than Hezbollah, an ally of Hezbollah and formed soon after the civil war broke out in Lebanon in 1975.
[xxxix] Berrih like Qassim: Weapons are our pride, Al-Quds-Al-Arabia, July 31, 2025, Accessed https://sl1nk.com/MI27n September 10, 2025.
[xl] Al-Khansa: The dialogue with the Shiites should not be through Saudi Arabia or Hadas Channal, Al-Akhbar (Arabic). August 20, 2025. Accessed https://sl1nk.com/JQk7s September 5, 2025.
[xli] Al-Khatib: Do not give Lebanon as a gift to Israel, Al-Ikhbar (Arabic). August 31, 2025. Accessed https://l1nq.com/FamNa September 5, 2025.
[xlii] Ezzaddeen: Disarming Hezbollah is the US and Israeli Objectives, Al-Ikhbar (Arabic). August 31, 2025. Accessed https://l1nq.com/7gfx2 September 6, 2025.