सारांश: जनवरी 2025 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्हाइट हाउस में वापस आने पर इतिहास में अमेरिकी आप्रवासन नीति में सबसे बड़े बदलावों में से एक बदलाव हुआ है। प्रशासन का उद्देश्य अमेरिकी आप्रवासन प्रणाली में ‘ऑर्डर वापस लाना’ और विदेशी कामगारों की बजाय अमेरिका के नागरिकों को प्राथमिकता देना रहा है। अमेरिका में उच्च– कौशल वाले प्रवासियों के सबसे बड़े स्रोतों में से एक और अमेरिकी विश्वविद्यालयों में सबसे तेज़ी से बढ़ते छात्रों की आबादी में से एक होने के नाते, भारतीय नागरिक स्वयं को इन बदलावों के केंद्र में पाते हैं।
परिचय: अमेरिका में हाल ही में हुए आप्रवासन नीति में बदलाव
अपने शपथ ग्रहण के बाद से, ट्रंप प्रशासन ने कई कार्यकारी आदेश और घोषणाओं के माध्यम से अमेरिकी आप्रवासन नीति में बदलाव किए हैं।
20 जनवरी 2025 को, घोषणा 10888 ने अमेरिका के दक्षिण सीमा पर “लगातार घुसपैठ” की पुष्टि की जिसमें राष्ट्रपति के अधिकारों का प्रयोग कर ‘राज्यों को हमले से सुरक्षा की गारंटी’ दी गई।[i] इस घोषणा ने गैर– नागरिकों के कुछ समूहों के भौतिक प्रवेश को निरस्त करने के लिए कानूनी आधार दिया, जो राष्ट्रपति के इस फैसले पर आधारित था कि ‘बड़े पैमाने पर प्रवेश’ या ‘घुसपैठ’ हो रहा है। आगे चल कर इसने प्रशासनिक कार्रवाईयों का मार्ग प्रशस्त किया जैसे कि सीमित मात्रा में शरणार्थियों को अनुमति देना और सीमा पर पाबंदियों को और सख्त करना।
उसी दिन जारी की गई घोषणा 10886 ने दक्षिणी सीमा पर राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर संघीय कार्रवाई को और बढ़ा दिया।[ii] इसने रक्षा विभाग (DoD) को गृह सुरक्षा विभाग (DoHS) और उससे संबंधित एजेंसियों को सीमा पर “संचालन नियंत्रण” पाने के लिए रसद और संचान समर्थन देने का निर्दश दिया– जिससे प्रवर्तन पर गहन अंतर– एजेंसी सहयोग का रास्ता साफ हो सके। इन दो घोषणाओं के साथ, राष्ट्रपति ट्रंप ने आप्रवासन से संबंधित मुद्दों पर पांच कार्यकारी आदेश भी जारी किए।
कार्यकारी आदेश 14165 में एक संचालन रोडमैप बताया गया था। इसमें गृह सुरक्षा विभाग और न्याय, स्वास्थ्य और मानव सेवा विभाग और रक्षा विभाग समेत कई संघीय एजेंसियों को आप्रवासन प्रवेश और पैरोल नीति को सख्त करने, निर्वासन बढ़ाने और प्रवर्तन के प्रयासों में तालमेल बिठाने का काम दिया गया था।[iii] दूसरे आदेशों के अलावा, इस आदेश में कुछ पैरोल प्रोग्राम को समाप्त करने, प्रवर्तन कर्मियों की संख्या बढ़ाने और बंदरगाहों पर नए चेकप्वाइंट के लिए धन उपलब्ध कराने की बात कही गई है।
कार्यकारी आदेश 14159 के साथ, प्रशासन ने बिना इज़ाजत आप्रवासन के खिलाफ अपने कानून और प्रवर्तन संरचना को पहले से सख्त बनाया।[iv] इस आदेश ने त्वरित निर्वासन की प्रक्रिया को और बढ़ाया, एक ज़रूरी एलियन पंजीकरण नीति शुरू की (जिसका पालन न करना सबसे बड़ी प्रवर्तन प्राथमिकता मानी जाएगी) और आप्रवासन एवं सीमा शुल्क प्रवर्तन (ICE) और सीमा शुल्क एवं सीमा सुरक्षा (CBP) के लिए बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की नियुक्ति करने का निर्देश दिया। इसने अमेरिका में रहने के औपचारिक मार्गों को भी कम कर दिया– विवेकाधीन राहत हेतु समय–सीमा को कम कर दिया और पैरोल के लिए पात्रता को सख्त कर दिया जबकि निर्वासन प्रक्रियाओं को तेज़ कर दिया।
कार्यकारी आदेश 14163 ने 27 जनवरी 2025 से शरणार्थियों के प्रवेश पर रोक लगा दी।[v] इसने 90-दिन की समीक्षा की शुरूआत की जिसका उद्देश्य शरणार्थी कार्यक्रम को नवीनतम सुरक्षा और जांच प्राथमिकताओं के अनुसार ‘बदलना' था, जिसमें अंतरएजेंसी समीक्षा के बाद केवल कुछ विशेष छूट देने की अनुमति दी गई। इस आदेश के कुछ तात्कालिक परिणाम मिले: पुनर्वास उड़ानें रद्द कर दी गईं, पहले से स्वीकृत शरणार्थियों का मामला अधर में लटक गया और यूनएचसीआर एवं शरणार्थियों की सेवा करने वाली स्वयं सेवी संगठनों ने कई देशों में फंसे हुए आवेदकों के बारे में चिंता जताई।
व्यापक सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखते हुए, कार्यकारी आदेश 14161 जारी किया गया जिसमें एक सख्त जांच की रूपरेखा प्रस्तुत की गई।[vi] इसने नई जांच प्रक्रियाओं का आदेश दिया, संघीय– एजेंसियों के बीच डाटा–साझा करने के दायरे को बढ़ाया और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा या जन सुरक्षा’ संबंधी चिंताओं के लिए संदिग्ध माने गए लोगों के प्रवेश पर रोक लगाने की इज़ाजत दी। असल में, इसका मतलब है पृष्ठभूमि की लंबी पड़ताल, सोशल मीडिया स्क्रीनिंग के नए प्रोटोकॉल और अधिक दस्तावेजों की आवश्यकता– विशेष रूप से खास इलाके के आवेदकों के लिए।
शायद सबसे अधिक संवैधानिक कार्रवाई कार्यकारी आदेश 14160 के साथ की गई, जिसमें जन्म के अधिकार वाली नागरिकता पर रोक लगाने की कोशिश की गई थी। इसने संघीय एजेंसियों को निर्देश दिया कि वे ऐसी नीति लागू करें जिनसे जन्म के साथ स्वतः ही मिलने वाली अमेरिकी नागरिकता न मिल सके, यदि, माँ “गैर– कानूनी रूप से अमेरिका में रह रही हो” या माँ को अस्थायी दर्जा मिला हो या पिता (या माता/ दूसरा पेरेंट) न तो अमेरिकी नागरिक हो न ही कानूनी रूप से अमेरिका का स्थायी निवासी हो।[vii] इस आदेश से तत्काल ही बड़ी कानूनी चुनौतियाँ पैदा हो गईं। संघीय न्यायालय और अपीलीय न्यायालय ने इसकी संवैधानिकता पर विचार– विमर्श किया है। मामला सुप्रीम कोर्ट में है।
उपरोक्त कार्यकारी आदेशों के अलावा अमेरिकी कांग्रेस ने द लैकेन रैली एक्ट भी पास किया, जिस पर 29 जनवरी 2025 को हस्ताक्षर किया गया और यह कानून बन गया।[viii] यह एक्ट आप्रवासन और राष्ट्रीयता अधिनियम में बदलाव करता है ताकि कुछ विशेष अपराधों में गिरफ्तार या आरोपित गैर– नागरिकों के लिए ज़रूरी रोक श्रेणी का दायरा बढ़ाया जा सके, साथ ही रिहाई देने के लिए कानूनी अधिकार पर रोक लगाई जा सके। यह सीमा–पार संपत्ति अपराध के लिए अधिक सख्त दंड का भी प्रावधान करता है। असल में, इस कानून ने पुलिस हिरासत का दायरा बढ़ा दिया है– कभी– कभी इसमें छोटे– मोटे अपराध और रोक से जल्द ही निकालना भी शामिल है–– और रोक कर रखने की शर्तों को लेकर कानूनी लड़ाइयां शुरू हो गई हैं। आप्रवासन अधिकारों के समर्थकों एवं लोक अभियोजक ने अधिक समय तक रोक कर रखे जाने और गलत तरीके से निर्वासन के संकट के बारे में चिंता जताई है।
नीतिगत निर्णयों के परिणाम
कुल मिलाकर राष्ट्रपति की घोषणा, कार्यकारी आदेश एवं लैकेन रैली एक्ट के तीन तात्कालिक नतीजे सामने आए: (i) प्रक्रिया का धीमा हो जाना (शरणार्थियों के प्रवेश पर रोक, शरण चाहने वालों के लिए ‘ मैक्सिको में रहें’ नीति को फिर से लागू करना[ix], और कुछ विवेकाधीन मार्गों को बंद करना); (ii) प्रवर्तन क्षमता बढ़ाई गई (ICE/CBP की भर्ती और पुनर्नियुक्ति, आपातकाल की घोषणा के तहत DoD समर्थन और लैकेन रैली एक्ट के तहत ज़रूरी रोक का दायरा बढ़ाना); और (iii) जांच के बेहतर तरीके (सोशल– मीडिया जांच और कुछ कमियों को लागू करने की प्राथमिकता के रूप में मानने के एजेंसी के निर्देश)।[x] एजेंसियों ने नए दिशानिर्देश जारी करने, वाणिज्य दूतावास संबंधी कार्यों में बदलाव करने और निर्वासन प्रक्रिया को प्राथमिकता देने के लिए कार्यकारी आदेशों का प्रयोग कानूनी एवं नियामक आधार के रूप में किया। इसका मानवीय परिणाम तुरंत नज़र आने लगेः शरणार्थियों की उड़ानें रद्द कर दी गईं, शरण मिलने में परेशानी होने लगी और कई अमेरिकी इलाकों में हिरासत में लिए जाने वाले लोगों की संख्या बढ़ गई।[xi]
आप्रवासन नीति में बदलावों का यह दौर, अपने पैमाने, गति और कानूनी मंजूरी की वजह से 2017 – 2021 की पिछली ट्रंप प्रशासन से अलग है। पिछले उपायों के उलट, ये नई नीति केवल कुछ समय के लिए या आपातकाल में दखल देने के लिए नहीं है बल्कि ये अमेरिकी आप्रवासन को एक बड़े संरचनात्मक तरीके से फिर से परिभाषित करती हैं, इसे केवल मानवीय या आर्थिक कारणों से नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी मुद्दा बनाती हैं। इन नीतिगत बदलावों की वजह से देश और विदेश, दोनों जगहों से अलग– अलग प्रतिक्रियाएं मिली हैं।
घरेलू मोर्चे पर, नागरिक–स्वतंत्रता समूहों, लोक अभियोजकों और आप्रवासन अधिकार संगठनों ने प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं और इसे उचित प्रक्रिया का उल्लंघन बताया है। कई संघीय न्यायाधीशों ने कार्यकारी आदेश 14160 के खिलाफ शुरुआती रोक भी जारी की है और अपील के कार्य ने उस आदेश को 2025 के मध्य तक मुकदमेबाज़ी का केंद्र बना दिया था।[xii] ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ की कार्यकारी व्याख्या के बारे में न्यायिक दलीलों पर असल में आप्रवासन और गतिशीलता नियमों एवं कार्यप्रणाली की रूपरेखा के गलत इस्तेमाल के खिलाफ विचार किया जाना चाहिए।
विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों ने सुझाव दिया कि शरणार्थियों को रोकने और छात्र– वीज़ा नियमों को और सख्त बनाने (और ज्यादा अच्छी तरह से जांचने) से अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या कम हो जाएगी और शोध कार्यों में गठबंधन भी कम होगा। उन्होंने नियोजित नियामक बदलावों का समर्थन किया लेकिन चेतावनी भी दी कि वर्तमान उच्च– शिक्षा संगठनों की बड़ी पाबंदियां दीर्घकाल में व्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकती है। F-1 और J-1 वीज़ा की जांच को और सख्त करना न केवल सत्तावादी चुनौती है बल्कि अमेरिका के साख के लिए भी एक चुनौती है– अमेरिका की 'वैश्विक प्रतिभा के लिए चुंबक' के रूप में बनी छवि के खराब होने का खतरा है।
नीति में किए गए बदलावों का असर उद्योग और व्यावसायिक समूहों पर भी पड़ा है, विशेषरूप से तकनीक और कृषि के क्षेत्र में। प्रौद्योगिकी फर्मों और व्यापार संगठनों ने कहा है कि अधिक जांच, बढ़ी हुई अनुपालन लागत और पहले से अधिक होने वाली रोक एवं निष्कासन गतिविधि संभावित आप्रवासियों को हतोत्साहित करेगी; कृषि और खाद्य सामग्रियों की आपूर्ति करनेवालों ने आप्रवासी मज़दूरों पर छापे और कार्रवाई करने के तरीके, जिससे मौसमी कामगारों की संख्या कम हो गई है, से होने वाले आर्थिक नुकसान की ओर संकेत किया है।[xiii]
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, बहुपक्षीय और मानवीय कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई है। यूएनएचसीआर और शरणार्थी संगठनों ने चेतावनी दी है कि शरणार्थी प्रवेश कार्यक्रम[xiv] को रद्द करने और प्रवासी सुरक्षा प्रोटोकॉल [xv] को फिर से लागू करने से वैश्विक शरणार्थी सुरक्षा रूपरेखा की अखण्डता कमज़ोर होगी, जिससे कमज़ोर लोग सीमा ज़ोन या तीसरे देशों में फंस कर रह जाएंगे। स्वंसेवी संघठनों ने मैक्सिको और शरणार्थियों को पनाह देने वाले देशों में बढ़ती मानवीय सहायता पर ज़ोर दिया।[xvi] अमेरिका की पाबंदियों का असर पश्चिमी यूरोप और लैटिन अमेरिका के कुछ इलाकों में शरणार्थी नीति को और सख्त करने में पहले से ही देखा जा सकता है और राष्ट्रपति ट्रंप की नीति का वैश्विक आप्रवासन एवं गतिशीलता पर कुल मिलाकर क्या असर होगा, यह देखना अभी बाकी है।
इन नीतियों की प्रकृति को लेकर दुनियाभर की सरकारों ने भी चिंता जताई है। जिन देशों में अमेरिका में आप्रवासन का प्रवाह अधिक है, उन्होंने निष्कासन के तरीकों और मानवीय व्यवहार पर राजनयिक तीरके से बातचीत की, कई सरकारों ने अपने नागरिकों की वापसी के दौरान वाणिज्य दूतावास के अधिकारी से मिलने, बात करने या कानूनी मदद प्राप्त करने, रोकथाम का उपयोग और धार्मिक/सांस्कृतिक संवेदनशीलता पर विश्वास की मांग की। कनाडा और यूरोपीय साझीदारों ने पारस्परिक नीति स्पिलओवर की ओर संकेत किया क्योंकि छात्र और कामगार दूसरी जगहों पर चले गए।[xvii][xviii] स्पष्ट है कि अमेरिका की बदलती आप्रवासन नीति एक विशेष वैश्विक भू–राजनीतिक पहलू का रूप ले रही है–– जो आप्रवासन गलियारे को नया आकार दे रही है और आप्रवासन एवं गतिशीलता की बुनियादी बातों पर फिर से सोचने को मजबूर कर रही है।
आखिर में, अमेरिका में राज्य और स्थानीय सरकारें बंटी हुई हैं– शरणस्थल शहर और कुछ राज्य विधानसभाओं ने संघीय वित्तपोषण को रोकने और कानून लागू करने की सज़ा देने वाला संघीय दखल बताया, जबकि दूसरों ने प्रशासन के कानून– व्यवस्था बनाने की तरीके का समर्थन किया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने कुछ देशव्यापी रोक को सीमित कर दिया लेकिन उन्हें ध्यान से लागू करने में मदद की, जिससे बहस और मुकदमेबाज़ी औऱ बढ़ गई।[xix] अमेरिका में यह विभाजन दिखाता है कि आप्रवासन एक नीतिगत बहस से बढ़कर नैतिक और पहचान संबंधी बहस बन गया है जो अमेरिका का ‘अवसरों का स्वर्ग’ और ‘आप्रवासियों का देश’ होने की कल्पना की परीक्षा ले रहा है।
इस विकास का प्रभाव स्पष्ट है: अमेरिका “चयनात्मक खुलेपन,” के युग में आ गया है जिसमें रणनीतिक रूप से बहुमूल्य प्रवेशकों– निवेशकों, रक्षा साझीदारों और स्टेम (STEM) विशेषज्ञों– के लिए दरवाज़े अभी भी खुले हैं लेकिन मानवीय और कम वेतन वाली श्रेणी के लिए दरवाज़े लगभग बंद हैं। यह दोहरी– ट्रैक प्रणाली से असमानता को संस्थागत बनाने का संकट पैदा हो गया है जिससे न केवल यह तय होगा कि कौन अंदर आएगा, बल्कि यह भी तय होगा कि किसकी मौजूदगी अमेरिकी एजेंडा के लिए उपयोगी मानी जाएगी।
भारत– विशेष प्रभाव और प्रतिक्रियाएं
भारत इन बदलावों से कई प्रकार से सीधे तौर पर प्रभावित हुआ है– निर्वासन, छात्र गतिशीलता, कुशल कामगार मार्ग, प्रेषण और दूतावास कार्यभार। विदेश मंत्रालय ने बताया कि 20 जनवरी से 22 जुलाई 2025 के बीच, अमेरिका से कुल 1,703 भरतीय नागरिकों (1,562 पुरुष 141 महिलाएं) को निर्वासित किया गया था। ये निर्वासन अमेरिकी सेना के विमानों, आईसीई (ICE) के चार्टर विमानों और व्यावसायिक निर्वासन के माध्यम से किए गए थे। नई दिल्ली ने निर्वासित किए गए लोगों के साथ होने वाले बर्ताव, विशेष रूप से पारगमन के दौरान पाबंदियों की खबरों पर आधिकारिक रूप से चिंता जताई और मानवीय तरीकों पर स्पष्टीकरण एवं विश्वास की मांग की।[xx]
कार्यकारी आदेश (14161 और 14165) के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा और जांच के तरीके एवं तत्काल निर्वासन एवं गहन पृष्ठभूमि जांच के व्यावहारिक प्रभाव ने एच–1बी (H-1B) और नियोक्ता के दूसरे प्रायोजित मार्गों को और पक्का कर दिया है। भले ही ये आदेश सीधे तौर पर एच–1बी (H-1B) कानून में बदलाव न करें लेकिन अधिक वेतन और फीस बढ़ाने पर सरकार का ध्यान नियोक्ता के लिए अधिक लागत और पेशेवरों को कम विकल्प देता है जिसका असर मुख्य रूप से भारतीय आईटी पेशेवरों और कामगारों पर पड़ता है। चूंकि भारत एच–1बी (H-1B) लाभार्थियों का एक बड़ा हिस्सा भेजता है, इसलिए भारतीय कंपनियों और बहुपक्षीय कामगारों की गतिशीलता के लिए व्यापक आर्थिक जोखिम बहुत ज्यादा है।[xxi]
कार्यकारी आदेश 14159 और 14163 के तहत सख्त दूतावास प्रक्रिया नियमों और कुछ विवेकाधीन मार्गों को निलंबित करने के साथ– साथ गहन जांच– पड़ताल ने छात्र– वीज़ा प्रक्रिया को लंबा बना दिया है, साक्षात्कार में छूट की उपलब्धता कम कर दी है और दस्तावेज़ी एवं सोशल– मीडिया जांच को गहन कर दिया है। इसकी वजह से कई विश्वविद्यालय और वहाँ पढ़ने की इच्छा रखने वाले छात्र अब दूसरे विकल्पों के रूप में कनाडा, यूके और ऑस्ट्रेलिया के बारे में विचार करने लगे हैं। सरकार– से– सरकार के बीच संवाद ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि कामगार और छात्रों के कानूनी रास्ते सुरक्षित रखने के साथ– साथ अनियमित आप्रवासन को बढ़ावा न दिया जाए।
कार्यकारी आदेशों के साथ लागू किए गए कानूनी उपायों और वित्तीय प्रस्तावों ने भी घर पैसे भेजना महंगा कर दिया है और प्रवासी परिवारों के लिए प्रशासनिक मुश्किलें बढ़ा दी हैं जो उन भारतीयों के आप्रवासन की संभावनाओं को और कम कर देता है जिनके लिए पीछे छूटे परिवारों से जुड़ी आर्थिक चिंताएं अनिवार्य हैं।
नई दिल्ली का रवैया सतर्क और व्यावहारिक रहा है। इसने वाशिंगटन से देश– प्रत्यावर्तन के मामलों में मानवीय व्यवहार, दूतावास से संपर्क और देश–प्रत्यावर्तन के मामले में सत्यापन प्रक्रिया को तेज़ एवं पक्का करने के लिए कहा है, साथ ही घरेलू पुनःएकीकरण योजना (कौशल पंजीयन और स्वदेश वापसी करने वालों के लिए सहयोग प्लेटफॉर्म्स) को भी बेहतर बनाया है। यह देखते हुए कि अमेरिका– भारत एकीकरण गलियारा अब तक बहुत धीमा रहा है भारत को आप्रवासन और गतिशीलता पर अमेरिका के बदलते नज़रिए के हिसाब से उचित नीति बनानी होगी।
निष्कर्ष: – भारत पर असर और प्राथमिकताओं का संक्षिप्त सेट
हाल के अमेरिकी नीतिगत बदलावों ने आप्रवासन शासन को पूरी तरह से बदल दिया है, जो मानवीय मदद और आर्थिक व्यावहारिक सोच से चलने वाली रूपरेखा से हटकर, प्रवर्तन और निवारण केंद्रित हो गया है। यह बदलाव वैश्विक गतिशीलता राजनीति में एक अहम मोड़ है, जहाँ आप्रवासन को मुख्य रूप से विकास का मुद्दा नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला माना जाता है। इस बारे में राष्ट्रपति ट्रंप के फैसलों को एक बार के फैसले के रूप में नहीं बल्कि लंबे समय तक असर दिखाने वाले तरीके के रूप में देखना ज़रूरी है।
दुनिया भर में, ट्रंप प्रशासन के कदमों पर लोगों की राय बहुत अलग रही है। यूरोप और उत्तर अमेरिका में अमेरिका के पुराने साथियों ने शरणार्थी सुरक्षा में कमी, अंतरराष्ट्रीय मानवीय नियमों को कमज़ोर करने और वैश्विक गतिशीलता शासन के लिए इससे जो बड़ी मिसाल कायम हुई है, उस पर चिंता जताई है। यूएनएचसीआर (UNHCR) और आईओएम (IOM) जैसी बहुपक्षीय संस्थानों ने वाशिंगटन से 1951 के शरणार्थी सम्मेलन को फिर से मानने और कम– से– कम मानवीय गलियारे बनाए रखने की अपील की है।
इसके उलट, यूरोप, लैटिन अमेरिका और एशिया के कुछ देशों में कई वामपंथी विचारधारा वाली सरकारों ने अमेरिका के तरीके को 'संप्रभु आप्रवासन प्रबंधन' के मॉडल के तौर पर समर्थन किया है, जिससे ऐसे देशों का एक उभरता हुआ समूह दिखता है जो निवारण–आधारित आप्रवासन नियंत्रण को उचित नीति मानते हैं। कुल मिलाकर नतीजा यह है कि जो देश आप्रवासन को विकास के लिए अच्छा मानते हैं और जो देश संप्रभुता और जनांकिक नियंत्रण को विशेष महत्व देते हैं, उनके बीच विश्व भर में दूरियां और बढ़ती जा रही हैं।
भारत के लिए, इसके तत्काल नतीजे स्पष्ट हैं– निर्वासन में वृद्धि, वीज़ा में देरी और अमेरिकी प्रवेश चैनल से गुज़र रहे छात्रों, पेशेवरों और परिवारों के लिए बढ़ती अनिश्चितता। लेकिन इसके रणनीतिक असर और भी गहरे हैं। अमेरिकी आप्रवासन पर लगातार सख्ती से भारत की सॉफ्ट पावर कम हो सकती है, प्रवासियों द्वारा होने वाला निवेश कम हो सकता है और अमेरिका के साथ उसके द्विपक्षीय संबंध के विशेष पहलू– मानव पूंजी की गतिशीलता, को कमज़ोर कर सकता है। वाशिंगटन के साथ भारत का राजनयिक संबंध और भी नाज़ुक हो गया है जिसमें गैर– कानूनी प्रवास के बारे में अमेरिकी प्रशासन की जायज़ चिंताओं और अपने आर्थिक एवं विकास हितों की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना शामिल है, साथ ही अमेरिका की अर्थव्यवस्था, नवाचार पारितंत्र और सामाजिक ताने– बाने में भारतीय प्रतिभाओं के सकारात्मक, दीर्ध कालिक योगदान पर ज़ोर देना भी शामिल है।
फिर, तीन एक दूसरे से जुड़ी प्राथमिकताओं को भारत की नीति निर्माण का मार्गदर्शन करना चाहिए। पहला, संरचित राजनयिक वार्ता को तेज़ करना जो मानवीय तरीके से लागू करने, पारदर्शी निर्वासन प्रक्रिया औऱ अधिक मांग वाले उद्योगों जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आई), सेमीकंडक्टर और स्वास्थ्यसेवा के लिए क्षेत्र– विशेष छूट पर ध्यान दे, जहाँ भारतीय प्रतिभा अमेरिकी प्रतिस्पर्धा के लिए बहुत आवश्यक है। दूसरा, जाने से पहले और देश में तैयारी के लिए रूपरेखा को संस्थागत बनाना जिसमें कानूनी साक्षरता, दस्तावेज तैयार करने में मदद और कैशल–मिलान कार्यक्रम शामिल हों, ताकि भारतीय प्रवासियों को सख्त नियामक माहौल में भी कोई परेशानी न हो और वापस आने वालों को बिना मानव पूंजी खोए फिर से बसाया जा सके।
आखिरकार, जैसे– जैसे वाशिंगटन का आप्रवासन रवैया और बदलेगा, भारत को अपनी प्रतिक्रिया को प्रतिक्रियाशील कूटनीति से रणनीतिक दूरदर्शिता में बदलना होगा, जिसमें स्थान परिवर्तन को केवल रोज़गार या प्रेषण का मुद्दा न मानकर बल्कि वैश्विक संबंध का एक ज़रिया माना जाएगा। और इन सब में, भारत को प्रवासियों के कल्याण को अपने नज़रिए के केंद्र में रखना होगा, साथ ही प्रवासी चक्र के सभी चरणों के लिए शासन, दखल और प्रबंधन की रणनीति बनानी होगी जो जाने से पहले से लेकर देश– वापसी और फिर से बसने तक होगी।
*****
*तृप्ति नेव, भारतीय वैश्विक परिषद, नई दिल्ली में शोध प्रशिक्षु हैं।
अस्वीकरण : यहां व्यक्त किए गए विचार निजी हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण:
[i] Proclamation 10888: Guaranteeing the States Protection Against Invasion, The White House, January 20, 2025, accessed September 12, 2025, https://www.presidency.ucsb.edu/documents/proclamation-10888-guaranteeing-the-states-protection-against-invasion
[ii] Notice on Declaring a National Emergency at the Southern Border of the United States, Federal Register, August 4, 2025, accessed September 12, 2025, https://www.federalregister.gov/documents/2025/08/04/2025-14789/notice-on-declaring-a-national-emergency-at-the-southern-border-of-the-united-states
[iii] Executive Order 14165: Securing Our Borders, January 20, 2025, The American Presidency Project, accessed September 12, 2025, https://www.presidency.ucsb.edu/documents/executive-order-14165-securing-our-borders
[iv] Protecting the American People Against Invasion, 90 Fed. Reg. (Jan. 29, 2025), accessed September 12, 2025, https://www.federalregister.gov/documents/2025/01/29/2025-02006/protecting-the-american-people-against-invasion
[v] Executive Order 14163: Realigning the United States Refugee Admissions Program, January 30, 2025, The American Presidency Project, accessed September 12, 2025, https://www.presidency.ucsb.edu/documents/executive-order-14163-realigning-the-united-states-refugee-admissions-program
[vi] Protecting the United States From Foreign Terrorists and Other National Security and Public Safety Threats, 90 Fed. Reg. 8451 (Jan. 30, 2025), accessed September 12, 2025, https://public-inspection.federalregister.gov/2025-02009.pdf
[vii] Executive Order 14160: Protecting the Meaning and Value of American Citizenship, US Department of State, January 20, 2025, accessed September 12, 2025, https://travel.state.gov/content/travel/en/News/passports/EO14160.html
[viii] Laken Riley Act, S. 5, 119th Cong. (2025), https://www.congress.gov/bill/119th-congress/senate-bill/5
[ix] Human Rights Watch, “Remain in Mexico,” accessed September 26, 2025, https://www.hrw.org/tag/remain-in-mexico
[x] Baker McKenzie, "United States: Enhanced Vetting & Potential Travel Bans – What Employers Should Know," InsightPlus, March 28, 2025, https://insightplus.bakermckenzie.com/bm/employment-compensation/united-states-enhanced-vetting-potential-travel-bans-what-employers-should-know
[xi] Priscilla Alvarez, "Trump Administration Cancels Flights for 10,000 Refugees," CNN, January 22, 2025, https://edition.cnn.com/2025/01/22/politics/refugee-flights-canceled
[xii] Nate Raymond, "Judge blocks Trump's birthright citizenship order after Supreme Court ruling," Reuters, July 10, 2025, https://www.reuters.com/legal/government/judge-weigh-blocking-trump-birthright-citizenship-despite-supreme-court-ruling-2025-07-10/
[xiii] Reuters, "Trump Administration proposes new H-1B visa process favoring higher-skilled, better-paid workers," Reuters, September 23, 2025, https://www.reuters.com/world/china/trump-Administration-proposes-new-h-1b-visa-process-favoring-higher-skilled-2025-09-23/
[xiv] The United States Refugee Admission Programme is a federal program that partners with non-profit organisations to identify and resettle qualified refugees. To be considered, the refugees must be referred to the programme and then undergo an interview process with the United States Customs and Immigration Services officers to determine eligibility. The programme has experienced recent disruptions, including a temporary suspension of processing and travel in early 2025 and organisations like UNHCR advised applicants not to make major life changes based on anticipated resettlement
[xv] The Migration Protection Protocol is a U.S. immigration policy that requires migrants seeking asylum in the United States to remain in Mexico until their date of hearing with a U.S. immigration court.
[xvi] CWS Global, “Daily State of Play: Trump’s Indefinite Refugee Ban and Funding Halt,” blog post, CWS Global, September 24, 2025, https://cwsglobal.org/blog/daily-state-of-play-trumps-indefinite-refugee-ban-and-funding-halt/
[xvii] Ministry of External Affairs, Government of India, "QUESTION NO- 2272 DEPORTATION OF INDIAN NATIONALS FROM USA," Lok Sabha Unstarred Question, answered August 1, 2025, https://www.mea.gov.in/lok-sabha.htm?dtl/39928/QUESTION_NO_2272_DEPORTATION_OF_INDIAN_NATIONALS_FROM_USA=.
[xviii] Chandelis Duster, "Some European Countries and Canada Issue Advisories for Travelers to the U.S.," NPR, March 22, 2025, https://www.npr.org/2025/03/22/nx-s1-5336792/european-countries-canada-travel-warnings-us.
[xix] Andrew Chung, "U.S. Supreme Court May Rule on Allowing Enforcement of Trump Birthright Citizenship Limits," Reuters, June 27, 2025, https://www.reuters.com/legal/government/us-supreme-court-may-rule-allowing-enforcement-trump-birthright-citizenship-2025-06-27/
[xx] Ministry of External Affairs, Government of India, "QUESTION NO- 2272 DEPORTATION OF INDIAN NATIONALS FROM USA," Lok Sabha Unstarred Question, answered August 1, 2025, https://www.mea.gov.in/lok-sabha.htm?dtl/39928/QUESTION_NO_2272_DEPORTATION_OF_INDIAN_NATIONALS_FROM_USA=.
[xxi] Ted Hesson, "Trump Administration proposes new H-1B visa process favoring higher-skilled, better-paid workers," Reuters, September 23, 2025, https://www.reuters.com/world/china/trump-Administration-proposes-new-h-1b-visa-process-favoring-higher-skilled-2025-09-23/.