सारांश: ताइवान को लेकर बीजिंग और टोक्यो के बीच चल रहे तनाव और डोनाल्ड ट्रंप शासन में अमेरिका द्वारा पैदा की गई वैश्विक मुश्किलों के बीच दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे–म्युंग की चीन और जापान के नियमित राजकीय दौरे और नेताओं के द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन एक कुशल राजनयिक संतुलन का प्रयास एवं वैश्विक व्यवस्था में अपनी स्थिति को फिर से निर्धारित करने के नए प्रयासों का संकेत देते हैं।
परिचय
दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे–म्युंग ने जून 2025 में पदभार ग्रहण करने के बाद जनवरी 2026 में चीन की अपनी पहली राजकीय यात्रा के साथ नव वर्ष की शुरुआत की। राष्ट्रपति मून जे–इन की 2017 और 2019 की यात्रा के बाद वर्तमान राष्ट्रपति के इस दौरे को किसी भी दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति के पहले दौरे के रूप में भी देखा गया [1]। 4 से 7 जनवरी 2026 की चार दिवसीय राजकीय यात्रा के महत्व को देखते हुए, ली जे–म्युंग और शी जिनपिंग के बीच हुई बैठक को रणनीतिक हलकों में दक्षिण कोरिया– चीन संबंधों की सूक्ष्म बहाली के रूप में देखा गया है। इस दौरे के यादगार खुशनुमा पलों में से एक था राष्ट्रपति ली का राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ चीन के शाओमी स्मार्टफोन से ली गई सेल्फ़ी [2]।
चीन के दौरे के ठीक एक सप्ताह के बाद दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे–म्युंग, जापान के प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के साथ होने वाले शिखर बैठक में हिस्सा लेने के लिए 13 जनवरी 2026 को जापान के शहर नारा पहुँचे। यदि चीन में राजनीतिक वार्ताओं के अलावा सेल्फ़ी एकमात्र यादगार वस्तु थी, तो राष्ट्रपति ली जे– म्युंग और जापान के प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने अपनी शिखर बैठक को बहुत ही मज़ेदार अंदाज़ में समाप्त किया और ड्रम सेट पर के– पॉप हिट्स की धुन पर सुर में सुर मिलाया[3]। शायद एक सकारात्मक सोच के संकेत के रूप में दक्षिण कोरिया और जापान के दोनों नेताओं की आपस में बहुत अच्छी बनी और उनके बीच एक ऐसा तालमेल नज़र आया जिसने मज़बूत व्यक्तिगत और द्विपक्षीय संबंधों को सुनिश्चित करने की उनकी प्रतिबद्धता को उजागर किया।
दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति का चीन दौरा
शी जिनपिंग ने 31 अक्टूबर और 1 नवंबर 2025 के बीच हुई 32वीं एपीईसी (APEC) बैठक के लिए दक्षिण कोरिया के ग्योंगजू शहर के दौरे पर थे और इसी के बदले राष्ट्रपति ली जे–म्युंग 4 से 7 जनवरी 2026 तक चीन के चार– दिवसीय राजकीय दौरे पर थे। रिपोर्टों के अनुसार, चीन की अपनी राजकीय यात्रा के दौरान दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे– म्युंग के साथ 200- सदस्यों का एक व्यापार प्रतिनिधिमंडल भी था जिसमें सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स के अध्यक्ष जे वाई ली, एसके ग्रुप के अध्यक्ष चेई ताए– वॉन और हुंडई मोटर ग्रुप के कार्यकारी अध्यक्ष यूइसुन चुंग भी थे [4]।
चीन में हुए ली– शी शिखर सम्मेलन में तकनीक, पर्यावरण और जलवायु सहयोग, सीमाओं पर बौद्धिक संपदा अधिकार, खाद्य सुरक्षा एवं क्वारंटाइन प्रक्रियाओं से संबंधित 14 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए जिसका उद्देश्य आर्थिक सहयोग हेतु संबंधों को बेहतर बनाने पर था [5]। इन 14 समझौते के अलावा कोरिया– चीन व्यापार मंच में दक्षिण कोरियाई और चीनी कंपनियों के बीच नौ और समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए [6]। दक्षिण कोरिया में चीन के ऐतिहासिक कलाकृतियों को वापस लौटाने पर भी एक और समझौता किया गया जो सियोल– बीजिंग संबंधों को फिर से बेहतर बनाने के बड़े प्रयास में प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण था [7]।
बीजिंग में हुए इस शिखर सम्मेलन में एक मात्र कमी स्पष्ट रूप से नज़र आई और वह थी दक्षिण कोरिया एवं चीन, दोनों देशों के नेताओं का संयुक्त वक्तव्य जारी न किया जाना। पिछली बार दोनों देशों द्वारा जुलाई 2014 में संयुक्त वक्तव्य जारी किया गया था जिसमें ‘कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु हथियार मुक्त करने’ की प्रतिबद्धता शामिल थी [6]। 12 वर्ष पूर्व जब 2014 में दक्षिण कोरिया और चीन के बीच संयुक्त वक्तव्य जारी किया गया था, तब से क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा माहौल में बहुत बड़ा बदलाव आया है। कुछ विशेष घटनाओं की बात करें तो विश्व ने एक वैश्विक महामारी और लॉकडाउन देखा, रूस का यूक्रेन पर विशेष सैन्य अभियान, इज़रायल– गाज़ा युद्ध, रूस– उत्तर कोरिया संधि समझौते के तहत उत्तर कोरिया का रूस को यूक्रेन के नागरिकों के खिलाफ लड़ने के लिए सैनिकों को भेजना, चीन– रूस– उत्तर कोरिया का एक अनौपचारिक गठबंधन बनना और अमेरिका– वेनेज़ुएला संकट के साथ– साथ ट्रंप के टैरिफ की मार।
संयुक्त वक्तव्य जारी नहीं किए जाने का मुख्य कारण कोरियन प्रायद्वीप के परमाणु निरस्त्रीकरण को लेकर बीजिंग के नज़रिए में बदलाव है। सितंबर 2025 में उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग– उन का बीजिंग दौरा, जो ‘जापानी आक्रमण के खिलाफ चीन के लोगों के प्रतिरोध युद्ध और विश्व फासीवाद विरोधी युद्ध की 80वीं वर्षगांठ’ [8] के उपलक्ष्य में हुआ था और चीन द्वारा उत्तर कोरिया को समर्थन का वादा, कोरियन प्रायद्वीप में परमाणु निरस्त्रीकरण लक्ष्यों एवं उत्तर कोरिया के निरस्त्रीकरण से पीछे हटने का एक रणनीतिक संकेत था।
हालांकि, संयुक्त वक्तव्य जारी न किए जाने के बावजूद, दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे–म्युंग ने कहा कि उन्होंने शी जिनपिंग से कहा है कि चीन कोरियाई प्रायद्वीप से संबंधित मामलों, जिसमें उत्तर कोरिया का परमाणु मुद्दा भी शामिल है, पर, 'शांति के मध्यस्थ' के रूप में काम करे [9]। उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग– उन के सियोल की सुलह की नई कोशिशों पर जवाब देने में हिचकिचाहट की वजह से, विशेष रूप से 2024 से, दक्षिण कोरियाई पक्ष को एक उदार सरकार के अधीन भी, प्योंगयांग के साथ गतिरोध समाप्त करने में परेशानी हो रही है। डोनाल्ड ट्रंप के शायद अब किम जोंग– उन के साथ कोई सौदा करवाने में दिलचस्पी न होने या कहें कि अभी तक दिलचस्पी न दिखाने की वजह से, सियोल प्योंगयोंग के साथ जल्द समाधान के लिए बीजिंग में अपने परंपरागत क्षेत्रीय मध्यस्थ की ओर झुकता दिख रहा है।
भले ही दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे–म्युंग चीन के नेता शी जिनपिंग पर विश्वास कर रहे हैं लेकिन सच यह है कि हाल के वर्षों में बीजिंग ने उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर ज्यादा दूरी वाला रवैया अपनाया है। यह देखते हुए कि उत्तर कोरिया के साथ चीन के संबंध हाल ही में सुधरने शुरू हुए हैं [10], बीजिंग शायद सियोल के कहने पर ही प्योंगयांग के साथ वार्ता में कोई भूमिका निभाने में हिचकिचाएगा।
दक्षिण कोरिया– जापान नारा शिखर सम्मेलन
दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे–म्युंग और जापान के प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची 13 जनवरी 2026 को जापान के नारा प्रांत में आयोजित शिखर सम्मेलन में मिले [11]। वर्ष 1965 में राजनीतिक संबंध बनने के 60 वर्षों के बाद इस बैठक ने सियोल और टोक्यो के बीच ठोस संबंधों की पुष्टि की। हालांकि, यह शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हुआ जब ताइवान फैक्टर की वजह से जापान और चीन के संबंध अपने सबसे मुश्किल दौर से गुज़र रहे हैं। ली जे– म्युंग के एक सप्ताह पहले ही चीन का दौरा करने के बाद, पहले से ही इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि दक्षिण कोरिया– जापान शिखर सम्मेलन कैसा रहेगा और क्या चीन ने जापान के बारे में दक्षिण कोरिया को कुछ निर्देश दिए होंगे।
जैसा कि लगता है, दक्षिण कोरिया विश्व को दिखा रहा है कि वह एक ज़िम्मेदार संप्रभु देश की भूमिका निभाने वाला गंभीर खिलाड़ी है जो एक व्यावहारिक कूटनीतिक नज़रिए के माध्यम से रणनीतिक स्वायत्तता का आनंद लेता है। दक्षिण कोरिया और जापान के बीच नारा शिखर सम्मेलन दोनों देशों के इतिहास में एक और महत्वपूर्ण घटना है जो 1965 से सुलह और विवादों के चक्रों से युक्त है। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे– म्युंग ने पहले अगस्त 2025 में पद संभालने के तत्काल बाद अपनी पहली आधिकारिक विदेश यात्रा के लिए जापान के टोक्यो को चुना था [12]।
इसके बाद, 13 जनवरी 2026 को जापान के नारा में होने वाला शिखर सम्मेलन और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह इस बात का संकेत देता है कि दक्षिण कोरिया की उदार डेमोक्रेटिक पार्टी (डीपी/DP) व्यावहारिक, भविष्योन्मुख विचार और संबंधों को फिर से बेहतर बनाने के लिए शटल कूटनीति को जारी रखे हुए है।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दूरी को पाटने की कोशिश के तौर पर, जो अक्सर विवाद का कारण रही है, जापानी प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने ली जे– म्युंग का जापान के पहले यूनेस्को विश्व धरोहर बौद्ध स्थल, होर्यु– जी मंदिर, जिसकी स्थापनी सातवीं (7वीं) सदी में हुई थी, में स्वागत किया [13]। नारा में हुई ली– काराइची शिखर बैठक में आगामी 60 वर्षों के भावी द्विपक्षीय संबंधों को दिखाने और आकार देने वाला बताया गया था [14]।
दोनों नेताओं ने ‘कोरियन प्रायद्वीप के पूरी तरह से परमाणु निरस्त्रीकरण और स्थायी शांति स्थापना’ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को फिर से दोहराया और उत्तर कोरिया नीति पर करीबी तालमेल बनाए रखने पर सहमति जताई [15]।
रणनीतिक समन्वय के मामले में, दोनों नेताओं ने इस क्षेत्र में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए दक्षिण– कोरिया– जापान संबंधों के महत्व पर बात की, साथ ही अमेरिका– जापान– दक्षिण कोरिया सुरक्षा सहयोग के महत्व पर भी ज़ोर दिया [16]। इसके अलावा, दोनों नेताओं ने आपूर्ति श्रृंखला, अर्थव्यवस्था के क्षेत्र और आर्थिक सुरक्षा के बारे में सहयोग पर विस्तार से चर्चा की। बताया गया है कि दोनों नेताओं ने दक्षिण कोरिया– जापान संबंधों को विकसित करने के लिए आपसी दौरों और शटल कूटनीति को सक्रिए रूप से जारी रखने की ज़रूरत पर बार– बार ज़ोर दिया [13]।
ताइवान मुद्दे पर बीजिंग के साथ टोक्यो के तनावपूर्ण संबंध भी राष्ट्रपति ली के जापान दौरे से पहले मुख्य कारक था। दरअसल, यह मुद्दा जापान में रिपोटरों द्वारा उठाया गया था, जिस पर राष्ट्रपति ली ने कहा था कि समस्या चीन और जापान के बीच है और दक्षिण कोरिया इस समस्या में किसी भी तरह से शामिल नहीं होगा या दखल नहीं देगा [17]। दक्षिण कोरिया और जापान के नेताओं के बीच एक व्यक्तिगत तालमेल था जिसे वे आने वाले वर्षों में बेहतर और अधिक विश्वसनीय संबंधों के संकेत के रूप में अपने देश के नागरिकों तक पहुंचाना चाहते थे।
पिछले मुद्दों को सुलझाने के प्रयासों का एक और उदाहरण, दोनों नेताओं ने 1942 में हुई चोसेई अंडरसी कोलमाइन आपदा के पीड़ितों के अवशेषों की डीएनए जांच में सहयोग का स्वागत किया है और इसके लिए उत्सुकता दिखाई है। इस आपदा में 183 लोगों की मौत हुई थी। मृतकों में कोरियाई प्रायद्वीप के नागरिक भी थे [18]।
निष्कर्ष
अमेरिका– चीन की शत्रुता से बन रही अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था क्रम और डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए वैश्विक टैरिफ को देखते हुए, वाशिंगटन के सहयोगी के रूप में सियोग का बीजिंग के प्रति सावधानी से कदम उठाना समझ में आता है। हालांकि, राष्ट्रपति ली जे– म्युंग ने 2026 की शुरुआत में बीजिंग की चार दिवसीय राजकीय दौरा करने का फैसला किया जिससे यह संकेत मिला कि दक्षिण कोरिया अपने राष्ट्रीय हितों के लिए सबसे उपयुक्त रणनीतिक रूप से स्वतंत्र विदेश नीति अपनाएगा। इसके अलावा, जापान और चीन के बीच चल रहे तनाव के बीच, नारा में ली– ताकाइची शिखर बैठक ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि दक्षिण कोरिया उत्तर– पूर्व एशिया में क्षेत्रीय सुरक्षा मालौह के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए राजनयिक कार्रवाई में संतुलन बनाने में सक्षम है।
साथ ही, यह भी आशा है कि ली जे–म्युंग के नेतृत्व में दक्षिण कोरिया उत्तरपूर्व एशिया से आगे बढ़कर हिंद– प्रशांत क्षेत्र में अपनी साझेदारी को बढ़ाने के लिए एक व्यावहारिक रणनीतिक पहल जारी रखेगा। हिंद– प्रशांत के केंद्र में भारत की स्थिति, साथ ही दक्षिण कोरिया का समान सोच वाले साझीदार की तलाश, नई दिल्ली और सियोल के बीच विशेष रणनीतिक साझेदारी को विशेष महत्व देती है। इस संदर्भ में दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति का भारत दौरा एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना होगी जो द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाईयों पर ले जाने के लिए सियोल और नई दिल्ली की प्रतिबद्धता को और मज़बूत कर सकता है।
सभी की नज़र इस बात पर होगी कि वर्तमान राजनयिक रूपरेखा, विशेषरूप से उत्तरपूर्व एशिया के लिए, युद्ध या नेतृत्व में संभावित परिवर्तन के समय कैसा प्रदर्शन करती है, खासकर तब जब जापान फरवरी 2026 के आरंभ में अचानक ही आम चुनाव कराने जा रहा है[19]। एक अहम सवाल यह भी है कि क्या दक्षिण कोरियाई नेतृत्व अपने क्षेत्रीय समकक्षों के साथ मिलकर उत्तरपूर्व एशियाई क्षेत्र और उससे आगे व्यापक हिंद–प्रशांत क्षेत्र में शांति और सुरक्षा बनाए रखने में सक्रिए रूप से योगदान दे सकता है? दक्षिण कोरियाई नेता ने इस रणनीतिक कूटनीतिक संतुलन को जारी रखने की पहल की है, जो एक व्यावहारिक सोच पर आधारित है, और 2026 में पता चलेगा कि यह कौन सा रूप लेती है।
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*डॉ. तुनचिनमांग लैंगेल, शोध अध्येता, भारतीय वैश्विक परिषद (आईसीडब्ल्यूए)
अस्वीकरण: व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
Bibliography
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