26 दिसंबर 2025 को, इज़रायल संयुक्त राष्ट्र का पहला सदस्य देश बन गया जिसने आधिकारिक रूप से सोमालीलैंड गणराज्य को एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता दी। इज़रायल की सरकार ने घोषणा की कि “यह फैसला अब्राहम समझौते के अनुरूप है"। सरकार ने सोमालीलैंड के प्रमुख अब्दिरहमान मोहम्मद अब्दुल्लाही को भी इज़रायल की आधिकारिक यात्रा पर आने का न्यौता दिया। हालांकि सोमालीलैंड ने 1991 में सोमालिया से स्वतंत्र होने की घोषणा कर दी थी लेकिन इज़रायल एकमात्र ऐसा देश है जिसने सोमालीलैंड को औपचारिक रूप से राजनयिक मान्यता प्रदान की है। विशेषज्ञ इज़रायल द्वारा सोमालीलैंड को दिए गए इस मान्यता की वजह रणनीतिक बताते हैं।
इसमें लाल सागर और बाब– अल– मंडेब में शिपमेंट की समुद्री सुरक्षा की आवश्यकता, हॉर्न ऑफ अफ्रीका में ईरान के प्रभाव का मुकाबला करने के प्रयास और खाड़ी देशों के साझीदार, विशेषरूप से संयुक्त अरब अमीरात के साथ रणनीतिक साझेदारी को प्रगाढ़ बनाने की इच्छा शामिल है। इसके अलावा, इज़रायल का तरीका औपचारिक कानूनी मान्यता की बजाय व्यावहारिक मान्यता को अधिक महत्व देता दिख रहा है, यह रणनीति पहले भी कुर्दिस्तान के साथ उसके संबंधों में देखी गई थी।[i] यह फैसला 2023 से सोमालिया के फिलिस्तीन समर्थक रुख का जवाब भी हो सकता है। सोमालीलैंड के लिए, इज़रायल के साथ हाथ मिलाने से सुरक्षा से संबंधित निवेश के लिए अधिक कूटनीतिक मौके मिलेंगे और क्षेत्रीय स्तर पर अलग– थलग पड़ने का मुकाबला करने में मदद मिलेगी।
हालांकि, विश्व भर के देशों, जिनमें संयुक्त राष्ट्र, अफ्रीकी संघ, अरब लीग, इस्लामिक सहयोग संगठन और यूरोपीय संघ जैसे बहुपक्षीय संगठन शामिल हैं, ने, सोमालीलैंड को मान्यता देने के इज़रायल के एकतरफ़ा कदम को खारिज कर दिया है। वहीं, सोमालीलैंड ने इस मान्यता का स्वागत किया है जबकि इथियोपिया जैसे देश इज़रायल की निंदा करने से बच रहे हैं। सोमालीलैंड के साथ करीबी साझेदारी से इथियोपिया की समुद्र तक पहुँचने की रणनीति को और अधिक गति मिली है।
यह साफ– साफ नज़र आ रहा था कि संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों ने जानबूझकर कर चुप्पी साध रखी है क्योंकि सोमालीलैंड के बरबेरा बंदरगाह में उसकी मज़बूत आर्थिक और सुरक्षा मौजूदगी है। वह इज़रायल के साथ अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला देश है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने इज़रायल की निंदा किए बिना सोमालिया को अपना समर्थन दिया है। यूके, चेक गणराज्य और हंगरी जैसे देशों ने सोमालीलैंड को एकतरफ़ा मान्यता देने की आलोचना नहीं की और न ही उन्होंने सोमालिया को अपना समर्थन दिया। इसके विपरीत, यूरोपीय संघ ने इज़रायल के एकतरफ़ा कदम को खारिज करने और सोमालिया की क्षेत्रीय अखंडता एवं सुरक्षा को समर्थन देने में सैद्धांतिक रुख अपनाया है।
सोमालीलैंड का अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण बहुत अधिक रणनीतिक महत्व है, विशेषरूप से लाल सागर और बाब अल– मंडेब के पास होने की वजह से, जहाँ से विश्व के लगभग 12 प्रतिशत व्यापार का पारगमन होता है।[ii] बरबेरा बंदरगाह गहरे पानी वाला बंदरगाह है जो व्यावसायिक, नौसैनिक और समुद्री निगरानी गतिविधियों के लिए बहुत अच्छा है। समुद्री डाकुओं के खतरों और हूती हमलों के संदर्भ में इसका रणनीतिक महत्व बढ़ा है, जिससे लाल सागर में व्यापक सुरक्षा में मदद मिली है और व्यापार में विविधता लाने में सहूलियत हुई है।[iii]
साथ ही, सोमालीलैंड का स्थिर शासन व्यवस्था इसे विश्वसनीय रसद और सुरक्षा साझीदार के रूप में काम करने में मदद करता है। इसलिए, सोमालीलैंड हॉर्न ऑफ अफ्रीका और लाल सागर इलाके में रणनीतिक समुद्री और भू– राजनीतिक संपत्ति के रूप में उभर रहा है। इस संदर्भ में, इस शोधपत्र का उद्देश्य इज़रायल द्वारा सोमालीलैंड को मान्यता देने के पीछे के कारणों और उसके परिणामों की पड़ताल करना है।
सोमालीलैंड को मान्यता मिले के पीछे के कारणों की पहचान
7 अक्टूबर 2023 को हमास– इज़रायल युद्ध के क्षेत्रीयकरण ने लाल सार और अदन की खाड़ी में यातायात के सुचारू प्रवाह को बाधित कर दिया है। नवंबर 2023[iv] में हूतियों ने इज़रायली एमवी गैलेक्सी लीडर को हाईजैक कर लिया था और इज़रायल जाने वाले कार्गो एवं कंटेनर जहाज़ों पर मिसाइल एवं ड्रोन से हमले किए थे, जिससे इज़रायल जाने वाले कार्गो जहाज़ों को केप ऑफ गुड होप का रास्ता लेना पड़ा, इसकी वजह से शिपिंग लागत 30–40 प्रतिशत तक बढ़ गई।[v]
7 अक्टूबर के बाद सोमाली समुद्री डकैती के फिर से शुरू होने से अदन की खाड़ी में शिपिंग पर खर्च बढ़ गया है। इसलिए, यह फैसला सोमालीलैंड और इज़रायल के बीच खुफिया साझा करने, बंदरगाहों तक पहुँच बनाने और लाल सागर, अदन की खाड़ी और बाब अल– मंडेब के साथ निगरानी में सहयोग के लिए गहन राजनीतिक और रणनीतिक नींव का रास्ता खोल सकता है।

स्रोत: द इकॉनमिस्ट
इस बात को भी ध्यान में रखने की ज़रूरत है कि यह कदम इज़रायल को हॉर्न ऑफ अफ्रीका में ईरान के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने में मदद करता है। हॉर्न ऑफ अफ्रीका में ईरान के रणनीतिक हित बाब अल– मंडेब और लाल सागर में समुद्री मार्गों से अपने तेल निर्यात की सुरक्षा से संबंधित हैं। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, इज़रायल और अमेरिका के साथ प्रतिस्पर्धा ने ईरान को पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र के आस– पास के इलाकों में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए और विवश किया है। इसलिए, तेहरान ने लाल सागर और बाब अल– मंडेब पर नियंत्रण करने हेतु हूतियों को रक्षा क्षेत्र में और आर्थिक क्षेत्र में मदद दी है जिससे वह अपनी सेना का इस्तेमाल किए बिना ही अपने हक में क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों को बदल सके।
ईरान ने अक्टूबर 2023 के बाद सूडान के साथ अपने राजनयिक संबंधों की फिर से शुरूआत की थी और रैपिड सपोर्ट फोर्सेस के खिलाफ गृहयुद्ध के बीच सूडान आर्म्ड फोर्सेस को ड्रोन और सैन्य रसद की आपूर्ति की थी, जिसमें कथित रूप से संयुक्त अरब अमीरात ने मदद की थी। तेहरान ने संयुक्त अरब अमीरात का मुकाबला करने और लाल सागर के किनारे अपनी मौजूदगी मजबूत करने के लिए सूडान के साथ सहयोग बढ़ाया। ईरान ने लाल सागर में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए इरिट्रिया के साथ सहयोग को बढ़ाया है और असब जैसे इरिट्रिया के बंदरगाहों को विकसित करने में मदद कर रहा है।
इससे ईरान लाल सागर और अदन की खाड़ी में नौसैनिक शक्ति दिखाने और समुद्री डाकुओं के खिलाफ मिशन चलाने में सक्षम हुआ है।[vi] इसके अलावा, विश्लेषकों का कहना है कि ईरान ने यमन के हूतियों के माध्यम से अल– शबाब जैसे गैर– राज्य अभिकर्ताओं के साथ अनौपचारिक संबंध हैं।[vii] इसकी वजह से, ईरान ने छद्म गठबंधन, सैन्य समर्थन, कूटनीतिक साझेदारी, तकनीकी और आर्थिक सहयोग एवं परंपरागत गठबंधनों के माध्यम से हॉर्न ऑफ अफ्रीका में अपना प्रभाव बढ़ाया है। इन कारणों से सोमालीलैंड को मान्यता देने का इज़रायल का कदम अल– शबाब जैसे समूहों समेत अंतरराष्ट्रीय जिहाद को बढ़ते से रोकने के लिए है। सोमालीलैंड की राजनीतिक स्थिरता गहन खुफिया और समुद्री सहयोग में मदद करती है। फिर, यह इलाका रणनीतिक रूप से ईरान पर निर्भर नहीं है।
इसके साथ ही, कई विश्लेषक यह भी बताते हैं कि यह एकतरफ़ा मान्यता पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र के बाहर अब्राहम समझौते का विस्तार है।[viii] इस मान्यता से खाड़ी और पश्चिम एशिया क्षेत्रों के बाहर संयुक्त अरब अमीरात और इज़रायल के बीच सहयोग का दायरा और मजबूत हुआ है। संयुक्त अरब अमीरात ने दीर्घकालिक बंदरगाह रियायत और रसद नियंत्रण के माध्यम से बरबेरा बंदरगाह पर पहले ही अपना नियंत्रण मज़बूत कर लिया है और वह अदन की खाड़ी में एक अहम सुरक्षा प्रदाता और व्यावसायिक हब के तौर पर उभर रहा है।[ix] इज़रायल के लिए, संयुक्त अरब अमीरात में स्थिरक की भूमिका निभाता है। इस प्रकार, मान्यता मिलने से ईरानी प्रभाव को रोकने, समुद्री रास्तों की सुरक्षा पक्का करने और मोगादिशु जैसे कमज़ोर देशों पर निर्भरता से बचने में मदद मिल सकती है।
एक और कारण यह है कि 7 अक्टूबर 2023 से सोमालिया ने फिलिस्तीन के पक्ष में कड़ा रुख अपनाया है। उसने गाज़ा में इज़रायल की सैन्य गतिविधियों की सार्वजनिक रूप से निंदा की है[x], संयुक्त राष्ट्र महासभा के युद्धविराम प्रस्तावों का पूरी तरह से समर्थन किया है, कब्ज़े, फिलिस्तीनियों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून को लागू करने का मुद्दा उठाया है और तटस्थ रवैया अपनाने की बजाय गाज़ा पर अरब लीग और इस्लामिक सहयोग संगठन का खुला सहयोग किया है। सोमालिया के फ़िलिस्तीन समर्थक रुख के पीछे दो कारण हैं– पहला, यह एक सामान्य विचार के तहत है क्योंकि यह पहले कब्ज़े में था और अभी भी राजनीतिक बंटवारे का सामना कर रहा है।[xi] दूसरा, सोमालिया अरब देशों से कूटनीतिक और वित्तीय मदद पर निर्भर है।
विशेष बात यह है कि इज़रायल की मान्यता वैश्विक राजनीति में नियमों पर आधारित व्यवस्था के बड़े पैमाने पर कमज़ोर होने को भी दिखाती है, जहाँ स्थापित नियमों को या तो चुनिंदा तरीके से लागू किया जाता है, कमज़ोर किया जाता है या नज़रअंदाज़ किया जाता है। वेस्टफेलियन सिद्धांत के अनुसार क्षेत्रीय अखंडता को इज़रायल के एकतरफ़ा फैसले से नज़रअंदाज़ कर दिया गया है। मान्यता कूटनीतिक तर्क और कानूनी संरचना पर आधारित थी, जबकि सुरक्षा संबंधी विचारों को अंतरराष्ट्रीय कानून और मिसालों की चुनिंदा व्याख्या के ज़रिए फिर से बनाया गया है।
सोमालीलैंड संप्रभुता के सवाल पर विचार करने का एकमात्र उदाहरण नहीं है; संप्रभुता की दुविधा यूक्रेन, सीरिया, लीबिया और यमन में भी देखी जा सकती है जहाँ सत्ता बंटी हुई और अनसुलझी है। यह इस बात का संकेत देता है कि कानूनन संप्रभु कौन है, इससे हटकर, अब यह देखा जा रहा है कि प्रभावी तरीके से शासन कौन करता है और रणनीतिक रूप से तालमेल बिठाने की क्षमता किसके पास है। इसलिए, इस मान्यता ने सोमालीलैंड को संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और भू– राजनीतिक हितों के लिए परीक्षण स्थल बना दिया है। इसके अलावा, यमन में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार को फिर से स्थापित करने के लिए वर्षों के सहयोग के बाद सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच हालिया टकराव ने यह साबित कर दिया है कि पश्चिम एशिया क्षेत्र की क्षेत्रीय व्यवस्था भी बहुत हद तक बाधित हुई है, जिससे हित–आधारित व्यावहारिक क्षेत्रीय व्यवस्था हेतु एक ठोस तर्क मिलता है।
सोमालीलैंड को मान्यता देने के परिणाम
इस मान्यता ने सोमालिया की क्षेत्रीय अखंडता का स्पष्ट रूप से उल्लंघन किया है, जो वर्षों से अलग हुए क्षेत्र को अपने राष्ट्रीय क्षेत्र में फिर से मिलाने के लिए संघर्ष कर रहा है। इस फैसले से सोमालिया का इज़रायल के साथ जुड़ाव कम हो गया। इसके अलावा, यह एकतरफा कदम सोमालिया में क्षेत्रीय दावे करने वाले चरमपंथियों की अभिव्यक्तियों को प्रखर कर सकता है, जिससे क्षेत्रीय, संस्थागत और राजनयिक कमज़ोरियां बढ़ सकती हैं। जैसे, अल– शबाब इस स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश करेगा और यह दावा करेगा कि सोमालियाई देश अपनी संप्रभुता या “मुस्लिम देशों” की रक्षा करने में सक्षम नहीं है।[xii]
साथ ही, सोमालीलैंड को मान्यता मिलने से उसे प्रतीकात्मक वैधता और कूटनीतिक शक्ति मिली है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश ने उसे मान्यता दी है। इससे क्षेत्रीय देशों के साथ उसकी सौदाबाज़ी की शक्ति बढ़ी है। यह इथियोपिया के साथ बरबेरा बंदरगाह तक पहुँच, वस्तुओं के लिए पारगमन गलियारे और सुरक्षा एवं रक्षा सहयोग पर संवाद करने में मदद करता है। इससे सोमालीलैंड का खाड़ी देशों, विशेषरूप से संयुक्त अरब अमीरात के साथ संबंधों का दायरा बढ़ा है, जिससे आर्थिक और रसद सहयोग मज़बूत हुआ है। इसने स्थानीय नेताओं का आत्मविश्वास बढ़ाया है और अलग हुए प्रदेशों पर शासन करने की उनकी वैधता को मज़बूत किया है।
इज़रायल के फैसले से जुड़े कुछ स्पष्ट जोखिम भी हैं। सैन्यीकरण का खतरा बढ़ रहा है। जैसे– जैसे यह इज़रायल का करीबी साझीदार बनता जाएगा, यह एक सक्रिए भू– राजनीतिक केंद्र बन सकता है, जहाँ खुफिया गतिविधियां, सुरक्षा अवसंरचना और जासूसी ऑपरेशंस बढ़ जाएंगे। यह ऐसे विवादों में फंस सकता है जो इसके नियंत्रण से बाहर होंगे जबकि यह कोई विश्वसनीय सुरक्षा गारंटी भी नहीं दे पाएगा। सोमालीलैंड के लाल सागर युद्ध में एक और प्रॉक्सी बनने का खतरा है। खतरा यह है कि उसे इज़रायल, संयुक्त अरब अमीरात, पश्चिमी समुद्री सुरक्षा और हॉर्न ऑफ अफ्रीका में ईरान के नेतृत्व वाले अभियानों के बीच युद्ध में घसीटा जा सकता है।[xiii]
इज़रायल के इस कदम को लगभग सभी संस्थानों ने खारिज कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र ने सोमालिया की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की पुष्टि की है। अमेरिका को छोड़कर, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी/ UNSC) के सदस्य देशों ने सोमालीलैंड को इज़रायल द्वारा मान्यता दिए जाने की घटना की निंदा की है। यूएनएससी की बैठक के दौरान, संयुक्त राष्ट्र में सोमालिया के प्रतिनिधि ने कहा कि “इज़रायल को मान्यता देना फिलिस्तीनियों को सोमालिया के उत्तर– पश्चिमी इलाके में जाने के लिए विवश करने की योजना का हिस्सा है।” इसी बीच, अमेरिकी दूत टैमी ब्रूस ने सोमालीलैंड को मान्यता देने के कदम की तुलना फिलिस्तीन से करते हुए कहा कि “संयुक्त राष्ट्र के 150 से अधिक सदस्य देश एक ऐसे फिलिस्तीन को मान्यता देते हैं जिसका स्वयं का कोई अस्तित्व नहीं है और कोई आपात बैठक नहीं बुलाई गई है,” और यूएनएससी पर “दोहरे मापदंड” अपनाने का आरोप लगाया।[xiv]
अफ्रीकी संघ, यूरोपीय संघ, अरब लीग और इस्लामिक सहयोग संगठन के प्रमुखों ने सोमालिया की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता को पूरा समर्थन दिया है जबकि सोमालीलैंड के अस्तित्व को वैध बनाने के इज़रायल के फैसले को खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा है कि यह मान्यता एक खतरनाक मिसाल कायम करती है जिसके वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए दूरगामी परिणाम होंगे।
इज़रायल के लिए, यह कदम बाब अल– मंडेब चोकप्वाइंट के पास खुफिया और बंदरगाह सहयोग के ज़रिए रणनीतिक गहराई और समुद्री पहुंच प्रदान करता है, जिससे इज़रायल और उसके सहयोगियों के जुड़े शिपिंग मार्गों को मज़बूती मिलती है। पश्चिम एशिया क्षेत्र के क्षेत्रीय देशों ने इज़रायल के फैसले को सिरे से खारिज कर दिया है। मिस्र बाब अल– मंडेब के पास किसी भी नए बाहरी सुरक्षा देश को लाल सागर– स्वेज़ समुद्री सुरक्षा के संरक्षक के तौर पर अपनी पारंपरिक भूमिका के लिए खतरा मानता है। इसलिए, 10 जनवरी 2026 को जेद्दा में हुई इस्लामिक सहयोग संगठन विदेश मंत्रियों की परिषद की बैठक में मिस्र ने इस कदम को "फिलिस्तीनियों को ज़बरदस्ती विस्थापित करने और गाज़ा पट्टी में फूट डालने की गैर– कानूनी साज़िशें" बताया।[xv] तुर्की इज़रायल के इस कदम को इज़रायल – संयुक्त अरब अमीरात सुरक्षा गठबंधन को बढ़ाने की नींव के तौर पर देखता है, जो हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका में तुर्की के हितों के लिए खतरा है।
इसलिए, तुर्की सरकार ने कहा कि “यह मान्यता नेतन्याहू सरकार की गैर– कानूनी कार्रवाइयों का एक और उदाहरण है, जिसका मकसद क्षेत्रीय और वैश्विक दोनों स्तरों पर अस्थिरता पैदा करना है।”[xvi] सोमालीलैंड को मान्यता मिलने के बाद, संयुक्त अरब अमीरात ने बरबेरा बंदरगाह में अपने निवेश से भू– राजनीतिक शक्ति प्राप्त की है। इससे संयुक्त अरब अमीरात और इज़रायल के बीच बंदरगाह, शिपमेंट, रसद और समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ेगा। सऊदी अरब और क़तर ने भी सोमालीलैंड को मान्यता देने और वैधता देने के क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ने वाले प्रभाव को महसूस किया है।
उन्होंने एकतरफ़ा मान्यता का विरोध करने के लिए अरब लीग और इस्लामिक सहयोग संगठन के मंच का प्रयोग किया है। उन्होंने इज़रायल के इस फैसले को खारिज कर दिया ताकि ऐसे उदाहरण न बनें जो कमज़ोर अफ्रीकी और अरब देशों को अस्थिर कर सकें।[xvii] इसके अलावा, ईरान और हूती मानते हैं कि तेल अवीव का यह फैसला खतरे के दायरे को बढ़ाता है और इस बात की संभावना बढ़ाता है कि भविष्य में सोमालीलैंड से जुड़े समुद्री रसद को निशाना बनाया जा सकता है।
जैसे– जैसे खाड़ी में एक स्पष्ट विभाजन सामने आ रहा है, हॉर्न ऑफ अफ्रीका खाड़ी की दुश्मनी का मुख्य केंद्र बनता जा रहा है जिसका सीधा असर खाड़ी में व्यापार मार्गों, राजनीतिक स्थिरता और समुद्री सुरक्षा पर पड़ेगा।
विश्व स्तर पर, यह मान्यता इस बात को फिर से परिभाषित करने वाली है कि संप्रभुता और राष्ट्र का दर्जा कैसे तय किया जाए। यह मान्यता के लिए लेन–देन वाले तरीके को सामान्य बनाता है और क्षेत्रीय शासन प्रणालियों एवं संयुक्त राष्ट्र के तहत सिद्धांत आधारित वार्ता से होने वाले समझौतों को कमजोर करता है। इस तरह, यह नियमों और सिद्धांतों से ध्यान हटाकर रणनीतिक और सुरक्षा गठबंधनों की ओर ले जाता है, जिससे संघर्ष शास्त्रीय यथार्थवादी परिणाम के करीब आ जाते हैं और बहुपक्षीय सहमति– आधारित तंत्र कमज़ोर पड़ जाते हैं। इससे अफ्रीका, पश्चिम एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया में अधिक संकट होता है, जहाँ सीमाएं तय नहीं हैं, जातीय संघर्ष आम हैं और सरकारी संस्थान शक्तिहीन हैं।
निष्कर्ष
इज़रायल द्वारा सोमालीलैंड को मान्यता देने के कदम को लगभग पूरी दुनिया ने खारिज़ किया और उसके इस कदम की निंदा भी की है। हालांकि, यह मान्यता ऐसा समय में दी गई है जब वैश्विक शासन व्यवस्था दबाव में है, और इसके सिद्धांत एवं नियम शक्तिशाली देशों के फैसलों को आकार देने में उत्तरोत्तर अप्रभावी होते जा रहे हैं। वैश्विक शासन तंत्र के घटते प्राधिकार से इस क्षेत्र में दूसरे अलगाववादी और अलग होने वाले समूहों, विशेष रूप से पश्चिमी सहारा में राष्ट्रीयता की जारी मांग को बढ़ावा मिलने का खतरा है।
*****
*डॉ. अरशद, शोधकर्ता, भारतीय वैश्विक परिषद, नई दिल्ली।
अस्वीकरण: व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण
[i] Israel’s Kurdish Dilemmas, The Institute for National Security Studies, January 1, 2026, accessed https://www.inss.org.il/publication/kurdish-dilemma/, January 3, 2026.
[ii] Global oil traffic at risk at five international maritime “chokepoints”, Rystad says, EUCI, September 23, 2025, accessed https://tinyurl.com/yc5kjfkt, December 29, 2025.
[iii] The Battle for Berbera: Inside the global scramble for Somaliland’s strategic Red Sea Port, The African Report, April 7, 2025, accessed https://tinyurl.com/38vey988, January 4, 2026.
[iv] Yemen’s Houthis release crew of seized cargo ship Galaxy Leader, BBC, January 22, 2025, accessed https://www.bbc.com/news/articles/c9d5q0jn067o, December 29, 2025.
[v] The global economic consequences of the attacks on Red Sea shipping lanes, Center for Strategic & International Studies, January 22, 2024, accessed https://tinyurl.com/46pudjpu, January 2, 2026.
[vi] Eritrea breaks West’s Red Sea chokehold, pivots to Iran, Russia, China, Janata Weekly, May 25, 2025, accessed https://tinyurl.com/yvkcdffu, January 4, 2026.
[vii] Regional power struggles fuel simmering tensions across the Red Sea, ACLED, December 11, 2025, accessed https://tinyurl.com/3jmf2jvz, January 5, 2026.
[viii] Israel, Turkey, Somalia and Somaliland Recognition, The Times of Israel, January 7, 2026, accessed https://tinyurl.com/yd26tfv4, January 9, 2026
[ix] The UAE’s long game in East Africa, RANE, September 15, 2025, accessed https://tinyurl.com/3ryfxzs3, January 6, 2026
[x] Press Statement, Ministry of Foreign Affairs, Federal Republic of Somalia, April 14, 2024, accessed https://tinyurl.com/5t486f43, January 3, 2026.
[xi] Somalia urges Gaza ceasefire and aid access at OIC Emergency meeting, Ministry of Foreign Affairs, Somalia, August 25,2025, accessed https://tinyurl.com/55wfu2zw, January 8, 2026
[xii] Hundreds in Somalia’s capital protest Israel’s recognition of breakaway territory of Somaliland, AP, January 9, 2026, accessed https://tinyurl.com/3r48ym8z, January 12, 2026.
[xiii] Why is Somaliland strategically important? Reuters, January 6, 2026, accessed https://tinyurl.com/2saxnt4k, January 12, 2026.
[xiv] UN Security Council members condemn Israel’s recognition of Somaliland, Al-Jazeera, December 30, 2025, accessed https://tinyurl.com/5h3e7wsn, January 12, 2026.
[xv] Egypt rejects Israel’s recognition of Somaliland, Egyptian Streets, January 12, 2026, accessed https://tinyurl.com/4a6ndujm, January 13, 2026.
[xvi] Statement of the Spokesperson of the Ministry of Foreign Affairs of Turkiye on Recognition of the Independence of the Somaliland Region, Ministry of Foreign Affairs, December 26, 2025, accessed https://tinyurl.com/277vtj23, January 13, 2026.
[xvii]Joint statement by 21 Arab, Islamic, and African nations stressing their unequivocal rejection of Israel’s recognition of the Somaliland region, Ministry of Foreign Affairs, Qatar, December 27, 2025, accessed https://tinyurl.com/2ep9hhj5, January 14, 2026.