1 फरवरी को घोषित भारत के केंद्रीय बजट 2026 –27 में अफ़गानिस्तान के लिए 150 करड़ो रु. का आवंटन और जनवरी 2026 में नई दिल्ली में अफ़गान दूतावास में तालिबान द्वारा नियुक्त प्रथम प्रभारी राजदूत का पदभार संभालना, भारत– तालिबान संबंधों के धीरे– धीरे फिर से ठीक होने में दो महत्वपूर्ण घटनाएं हैं। अक्टूबर 2025 में तालिबान के कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी के भारत के ऐतिहासिक दौरे के बाद चार महीने से भी कम समय में, ये विकास राजनीतिक दूरी से व्यावहारिक, कार्यात्मक जुड़ाव की ओर सोच–विचार कर किए गए बदलाव का संकेत देते हैं। यह लेख इन कदमों के संदर्भ, महत्व और रणनीतिक प्रभाव की पड़ताल करता है और उन्हें भारत की व्यापक पड़ोस नीति और बदलते क्षेत्रीय सुरक्षा माहौल के लिहाज़ से देखता है।
हाल में हुए विकास: बजट आवंटन और दूतावास में बदलाव
1 फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत किए गए केंद्रीय बजट 2026–27 में, अफ़गानिस्तान को भारत की विकास सहायता में 27 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि शामिल थी, जिससे 2025–26 में आवंटित 100 करोड़ रु. नए वित्त वर्ष में 150 करोड़ रु. हो गई।[i] यह मामूली लेकिन सोच–समझकर की गई वृद्धि विदेश मंत्रालय के कुल 22,118 करोड़ रु. के बजट का हिस्सा है जो पिछले साल 20,516 करोड़ रु. था। यह वृद्धि पड़ोस में दूसरी जगहों पर ही कटौती के विपरीत है; विशेष बात यह है कि बांग्लादेश में राजनीतिक बदलाव के बाद खराब हुए संबंधों के बीच उसे दी जाने वाली मदद आधी कर 60 करोड़ रु. कर दी गई है। नेपाल (800 करोड़ रु.) और श्रीलंका (400 करोड़ रु.) को दी जाने वाली मदद में थोड़ी वृद्धि की गई है जो रणनीतिक प्राथमिकताओं और आपसी संबंधों के आधार पर क्षेत्रीय साझीदारों के लिए भारत के विशेष नज़रिए को दर्शाता है।[ii]
एक महीने से भी कम समय से पहले, जनवरी 2026 के मध्य में, तालिबान के विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, मुफ़्ती नूर अहमद नूर ने नई दिल्ली में अफ़गान दूतावास में प्रभारी राजदूत के रूप में औपचारिक रूप से पदभार ग्रहण किया था।[iii] अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद यह पहली बार था जब तालिबान के किसी नामित राजनयिक ने शांतिपथ पर मिशन का नेतृत्व संभाला हो। यह बदलाव महीनों तक चली शांति वार्ता के बाद हुआ और एक दीर्घकालिक निर्वात समाप्त हुआ जब दूतावास को 2021 से पहले के अफ़गान गणराज्य के वफ़ादार कर्मचारी चला रहे थे। लगभग उसी समय, तालिबान ने भारत में एक अफ़गान छात्र इकामुद्दीन कामिल को मुंबई में वाणिज्यिक दूतावास मामलों का उत्तरदायित्व सौंपा था, जो गैर–मान्यता की शर्तों के अधीन विदेशों में प्रतिनिध्तव हेतु सरकार के तात्कालिक लेकिन व्यवहारिक नज़रिए को दिखाता है।[iv]
भारत के विदेश मंत्रालय, विशेषरूप से पाकिस्तान अफ़गानिस्तान ईरान (पीएआई/PAI) डिवीज़न के साथ नूर की बाद की बातचीत में काम के सहयोग पर ध्यान दिया गया– व्यापार में सहूलियत, वाणिज्यिक दूतावास सेवाएं, मानवीय गलियारे और सीमित द्विपक्षीय तालमेल।[v] प्रथम राजनीतिक विभाग के पूर्व महानिदेशक नूर पिछले साल अक्टूबर में विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी के भारत दौरे के दौरान भी उनके साथ थे। [vi]
ये दो विकास– बजट में वृद्धि और दूतावास हस्तांतरण– अलग– अलग घटनाएं नहीं हैं। ये सीधे तौर पर कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी के 9-15 अक्टूबर 2025 तक भारत दौरे से बने राजनयिक गति पर आधारित है।[vii] उस सप्ताह भर के दौरे से, जो 2021 के बाद किसी भी तालिबान मंत्री का किसी बड़ी राजधानी का पहला दौरा था, कई ठोस नतीजे निकले– नई दिल्ली में तालिबान के चुने हुए राजनयिक को स्वीकार करने पर सहमति बनी, काबुल में “भारत का तकनीकी मिशन” को “भारत का दूतावास”[viii] में अपग्रेड किया जाना और मेडिकल, व्यापार और मानवीय यात्रा के लिए वीज़ा प्रक्रिया को सरल बनाना। मुत्ताकी के दौरे के बाद में दूतावास में बदलाव के लिए संस्थागत नींव रखी गई और व्यावहारिक संबंधों को गहरा बनाने के लिए भारत की तैयारी का संकेत दिया।
मुत्ताकी के दौरे के बाद के संदर्भ का महत्व
तालिबान के राज वाले अफ़गानिस्तान को मदद में वृद्धि और दूतावास में परिवर्तन का महत्व उनके तत्काल वित्तीय और राजनयिक महत्व से कहीं अधिक है। हालांकि 150 करोड़ रु. असल में कम लग सकते हैं लेकिन इसे अफ़गानिस्तान के साथ भारत के संबंध के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। अफ़गान गणराज्य के समय (2001–2021), भारत अफ़गानिस्तान का सबसे विश्वसनीय विकास साझीदार और सबसे बड़ा क्षेत्रीय दानदाता बन कर उभरा था जिसने बुनियादी ढांचा, शिक्षा, स्वास्थ्य, शासन और क्षेत्रीय संपर्क से जुड़ी परियोजनाओं के लिए 3 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का योगदान किया था। अफ़गिनस्तान– भारत मैत्री बांध (पूर्व में सलमा बांध नाम था), अफ़गान संसद भवन, 218- किमी लंबा ज़रंज– डेलाराम राजमार्ग और स्टोर पैलेस का जीर्णोद्धार जैसे प्रमुख प्रयास भारत की भागीदारी के स्थायी प्रतीक बने रहे और अफ़गान लोगों के बीच बहुत सद्भावना बनाई।
इसके उलट, अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता पर कब्ज़ा करने के बाद, भारत ने काबुल में एक दोस्ताना सरकार खो दी, अपने राजनयिकों को वापस बुलाया, अपना दूतावास बंद कर दिया और भारत को अपने उत्तर–पश्चिमी हिस्से में नई सुरक्षा चिंताओं का सामना करना पड़ा। तालिबान के साथ भारत का पहला आधिकारिक संपर्क 31 अगस्त 2021 को हुआ जब क़तर में भारत के राजदूत दीपक मित्तल ने तालिबान के कहने पर दोहा में तालिबान के राजनीतिक कार्यालय प्रमुख शेर मोहम्मद अब्बास स्टेनकज़ई से मुलाकात की और अफ़गानिस्तान में फंसे हुए भारतीयों की सुरक्षा और इलाके में सुरक्षा संबंधी चिताओं पर बात की।[ix] इसके बाद, नई दिल्ली ने संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से मानवीय मदद पहुँचाई। शुरुआत में तालिबान से सीधे संवाद करने से बचा।
इसमें दवाएं, 500,000 से अधिक कोविड-19 वैक्सीन की खुराक, और विश्व खाद्य कार्यक्रम के माध्यम से 50,000 मिट्रिक टन गेहूँ शामिल थे। जून 2022 में एक अहम मोड़ आया, जब भारतीय प्रतिनिधिमंडल काबुल गया, तालिबान द्वारा सत्ता पर कब्ज़ा किए जाने के बाद यह पहली आधिकारिक टीम थी जो काबुल गई थी और सहायता के तहत की जाने वाली डिलीवरी पर नज़र रखने और तालिबान के अधिकारियों के साथ समन्वय करने गई थी। इसके कुछ ही समय के बाद, भारत ने मानवीय मदद की कोशिशों पर नज़र रखने के लिए जून 2022 के आखिर में काबुल में अपने दूतावास में एक “तकनीकी टीम” को तैनात किया। यह टीम बिना किसी औपचारिक सरकारी मान्यता के संबंधों को फिर से स्थापित करने के लिए सीमित और मदद केंद्रित व्यावहारिक बदलाव था।[x]
अफ़गानिस्तान में बढ़ते मानवीय संकट के बीच, जिसमें बड़े पैमाने पर भुखमरी, बेरोज़गारी, विस्थापन, प्राकृतिक आपदाएं और कोविड-19 के बाद के प्रभाव शामिल हैं, मानवीय जुड़ाव भारत के लिए मुख्य प्रवेश बिंदु बन गया। उनके इस तरीके से नई दिल्ली को अपने हितों की रक्षा करने, अपनी मौजूदगी वापस पाने और तालिबान के राजनीतिक समर्थन के बिना, ज़िम्मेदार क्षेत्रीय कारक के रूप में अपनी छवि बेहतर करने में मदद मिली।
भारत उन कुछ क्षेत्रीय देशों में से एक था जो तालिबान के कब्ज़े से पहले उनके साथ आधिकारिक संवाद से बचते रहे थे। ऐतिहासिक दूरी और सावधानी से काम करने के इस संदर्भ में, वर्तमान घटनाक्रम बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। बजट में मामूली वृद्धि भारत के “नागरिक केंद्रित” मदद के वादे को सुनिश्चित करती है, भले ही तालिबान शासन को औपचारिक मान्यता अभी भी रोक कर रखी गई है। ये धन मानवीय गलियारे, भोजन और दवा की आपूर्ति, छोटी विकास परियोजनाओं एवं स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा एवं बुनियादी ढांचा जैसे क्षेत्रों को समर्थन देता है और किसी सरकार के बजाय अफ़गानों को मदद देने की परंपरा को जारी रखते हैं।[xi]
यह राजकोषीय संकेत अक्टूबर 2025 में मुत्ताकी के दौरे के ठीक बाद मिला है, जिसने भारत– तालिबान के बीच संबंधों में एक बड़े बदलाव को दर्शाया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर और दूसरे अधिकारियों के साथ अपनी बैठक के दौरान मुत्ताकी ने हेल्थकेयक, सार्वजनिक अवसंरचना और क्षमता–निर्माण में छह नई विकास परियोजनाओं के लिए प्रतिबद्धता हासिल की। भारत ने 20 एम्बुलेंस भी उपहार में दी हैं, e-ICCR योजना के तहत अफ़गान छात्रों के लिए छात्रवृत्ति की घोषणा की है और भूकंप प्रभावित इलाकों में पुनर्निर्माण के लिए मदद की पेशकश की है। दोनों पक्षों ने क्षेत्रीय आतंकवाद की निंदा की है और आपसी विश्वास पर ज़ोर दिया है। मुत्ताकी ने भरोसा दिलाया है कि अफ़गान की ज़मी का इस्तेमाल किसी भी देश को धमकाने के लिए नहीं किया जाएगा– यह भारत की लंबे समय से चली आ रही आंतकवाद विरोधी चिंताओं का सीधा जवाब था।
मुत्ताकी के दौरे का समय अफ़गानिस्तान– पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव के साथ मेल खाता था। यह तनाव 9 अक्टूबर को पाकिस्तान की सीमा पार हवाई हमलों से शुरू हुआ था, जिसमें काबुल समेत कथित टीटीपी (तहरीक– ए– तालिबान पाकिस्तान) के ठिकानों को निशाना बनाया गया था। इसके बाद तालिबान ने कई पाकिस्तानी सीमा चौकियों पर जवाबी हमले किए, जिससे डूरंड रेखा पर ज़ोरदार झड़पें हुईं, तोरखम और चमन जैसे महत्वपूर्ण क्रॉसिंग पर सीमा को बंद कर दिया गया और दोनों तरफ से दर्जनों लोग मारे गए।[xii] यह तनाव 2021 में तालिबान के कब्ज़े के बाद से दोनों देशों के संबंधों में सबसे बड़ी गिरावट में से एक है। इसकी जड़ इस्लामाबाद का यह आरोप है कि काबुल, पाकिस्तान के अंदरूनी इलाकों में हमलों के लिए ज़िम्मेदार टीटीपी के आतंकवादियों को पनाह देता है– एक ऐसा आरोप जिससे तालिबान इनकार करता है।
क़तर, तुर्की और सऊदी अरब की मध्यस्थता से आखिरकार 19 अक्टूबर को एक नाज़ुक युद्धविराम हो गया लेकिन अंदरूनी अविश्वास बना हुई है जिसमें 2025 के आखिर और 2026 में छिट –पुट घटनाएं और नाकाम वार्ताएं शामिल हैं। इस पृष्ठभूमि ने भारत की भागीदारी को रणनीतिक वज़न दिया: मुत्तकी की मेज़बानी करके और दूतावास का सामान्यीकरण और मदद बढ़ाकर नई दिल्ली ने स्वयं को एक स्थिर कारक के रूप में स्थापित किया, जो काबुल– इस्लामाबाद संबंधों में तनाव का फ़ायदा उठाते हुए, अफ़गानिस्तान को पाकिस्तान या दूसरी शक्तियों पर बहुत अधिक निर्भरता का एक विकल्प दे सकता है।
इसके बाद, नवंबर 2025 में, तालिबान के वाणिज्य और उद्योग मंत्री अलबाज नूरुद्दीन अज़ीज, द्विपक्षीय व्यापार, निवेश और व्यापक आर्थिक सहयोग पर भारतीय अधिकारियों के साथ संवाद करने के लिए नई दिल्ली आए।[xiii] इसके बाद दिसंबर 2025 में तालिबान के स्वास्थ्य मंत्री नूर जलाल जलाली का दौरा हुई, जिसमें फार्मास्युटिकल्स समेत हेल्थकेयर क्षेत्र में सहयोग को बेहतर करने पर फोकस किया गया। [xiv]
ये बातचीत दोनों तरफ से कार्यपरक कूटनीति को सामान्य बानने के लिए उठाए गए संस्थागत कदमों के साथ हुई: भारत ने काबुल में अपने टेक्निकल मिशन को अपग्रेड किया और उसे दूतावास बना दिया। साथ ही करण यादव को सीडीए नियुक्त किया।[xv] इसके जवाब में जनवरी 2026 में तालिबान ने भी नई दिल्ली में अफ़गान दूतावास में सीडीए के रूप में मुफ्ती नूर अहमद नूर को नियुक्त किया। कुल मिलाकर, इन कदमों ने नई दिल्ली और काबुल के बीच एक संरचनात्मक लेकिन सोच– समझकर बातचीत को मज़बूत करने पर ज़ोर दिया, जिसे औपचारिक पहचान नहीं मिली।
रणनीतिक चालक, जोखिम और भविष्य की राह
कई दूसरे देशों के जैसे ही भारत ने भी तालिबान के प्रति एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया है, यह मानते हुए कि, आम पसंद के बावजूद, यह समूह अफ़गानिस्तान में वर्तमान राजनीतिक प्राधिकारी है। यह बदलाव एक मज़बूत घरेलू विपक्ष की कमी और 1990 के दशक में मौजूद तालिबान– विरोधी ताकतों के लिए क्षेत्रीय समर्थन के समाप्त होने से और मज़बूत हुआ है। इस जुड़ाव में भारत के मुख्य हित प्रमुख रूप से सुरक्षा से संबंधित हैं; अफ़गानिस्तान को भारतीय हितों के खिलाफ़ शत्रुता की भावना रखने वालों को पैदा करने का अड्डा बनने से रोकना; ईरान के चाबहार बंदरगाह के माध्यम से क्षेत्रीय संपर्क को बढ़ाना (राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शासन द्वारा लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण पैदा हुई नई मुश्किलों के बावजूद, जिन्हें बाद में कुछ समय के लिए परिचालन संबंधी छूट देकर छोड़ा कम किया गया) ताकि क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखते हुए मध्य एशिया तक हवाई और ज़मीनी पहुँच सुनिश्चित हो सके।
सीमा पार से आतंकवादी गतिविधियों, अफ़गान इलाके से टीटीपी के तेज़ हमलों, पाकिस्तान के जवाबी हमलों और आपसी आरोप– प्रत्यारोप की वजह से तालिबान– पाकिस्तान के संबंधों में आई भारी गिरावट ने भारत के लिए इस्लामाबाद से सीधे मुकाबले के बिना व्यावहारिक तरीके से फिर से जुड़ने के लिए रणनीतिक स्थान को और खोल दिया है।
तालिबान के लिए, भारत के साथ बातचीत से भौतिक और सांकेतिक, दोनों तरह के उद्देश्य पूरे होते हैं। आर्थिक रूप से, यह खेती, खनन और बुनियादी अवसंरचना जैसे क्षेत्र में भारत की भागीदारी से थोड़ी राहत की उम्मीद देता है, जो लड़ाई के बाद फिर से बनाने के लिए पश्चिम से बाहर बाहरी साझीदारों को अलग– अलग तरह से जोड़ने की सरकार की बड़ी कोशिशों से मेल खाता है। यह पहुँच विशेष रूप से पश्चिमी मदद पर रोक, लंबे समय से चल रहे आर्थिक प्रतिबंधों और अफ़गानिस्तान के विदेशी वित्तीय संपत्तियों पर जारी रुकावट के संदर्भ में बहुत ज़रूरी है।
राजनीतिक रूप से, भारत के साथ संबंध बहुत मायने रखता है। विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी का भारत दौरा (सरकार के सत्ता में लौटने के बाद किसी वरिष्ठ तालिबान नेता का पहला दौरा) घरेलू और क्षेत्रीय मतदाताओं तक राजनयिक पहुँच का संकेत देने और उन बातों का जवाब देने में अहम था जो तालिबान को रावलपिंडी पर बहुत ज्यादा निर्भर या उसके नीचे दिखाती हैं। मोटे तौर पर भारत के साथ संबंध तालिबान को कुछ हद तक विदेश नीति की आज़ादी दिखाने और किसी एक क्षेत्रीय संरक्षक पर बहुत अधिक निर्भर होने से बचने में मदद करते हैं। भारत का नज़रिया सावधानीपूर्ण रहता है; वह शासन को औपचारिक मान्यता देने से बचता है और सारी मदद तालिबान अधिकारियों के बजाय अफ़गानों को देता है।
हालांकि, बड़े जोखिम और रुकावटें बनी हुई हैं। समीक्षकों का कहना है कि गहरे संबंध से एक ऐसी व्यवस्था को सही ठहराने का जोखिम है जिसकी लिंग आधारित कड़े प्रतिबंध, मीडिया पर रोक और महिलाओं एवं जातीय अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभाव वाली नीति के लिए बहुत अधिक आलोचना की जाती है जबकि मानवाधिकारों को लेकर भारत में घरेलू संवेदनशील नीति चुनने को और मुश्किल बनाती है। साथ ही, पूरी तरह से अलग होने से चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मनों को क्षेत्रीय प्रभाव मिल जाएगा, अफ़गानिस्तान का मानवीय संकट बढ़ेगा और बड़े पैमाने पर क्षेत्रीय असुरक्षा बढ़ेगी।
तालिबान के साथ भारत का जुड़ाव, विचार में तालमेल न होने, समूह के अंदरूनी हालात स्पष्ट न होने और बदलते क्षेत्रीय तालमेल, जिसमें तालिबान– पाकिस्तान के अस्थिर संबंध भी शामिल हैं, की वजह से और भी मुश्किल हो रही है। आने वाले महीनों में, यदि नई दिल्ली अफ़गानिस्तान में अपनी मौजूदगी को और मज़बूत करना चाहती है, तो उसे ज़मीनी स्तर पर अपने संबंधों को बेहतर बनाना होगा और तालिबान के अंदरूनी झगड़ों एवं लगातार मानवीय मुश्किलों से भरे जटिल राजनीतिक माहौल में सावधानी से कदम बढ़ाने होंगे।
निष्कर्ष
संक्षेप में कहें तो भारत के केंद्रीय बजट 2026–27 में अफ़गान सहायता के लिए बजट को 100 करोड़ रु. से बढ़ाकर 150 करोड़ रु. करना और जनवरी 2026 में नई दिल्ली में अफ़गानिस्तान के दूतावास में तालिबान द्वारा नामित प्रभारी राजदूत का कार्यभार संभालना, तालिबान के नेतृत्व वाले अफ़गानिस्तान के प्रति भारत के व्यवहारिक पुनर्प्राप्ति में अहम पड़ाव है। अक्टूबर 2025 में कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी के भारत के महत्वपूर्ण दौरे के साथ ये विकास 2021 के बाद के मनमुटाव से इतर लोगों पर केंद्रित मानवीय मदद, व्यापार में सहूलियत, वाणिज्यिक दूतावास सेवाएं और सीमित सहयोग पर ध्यान देने वाले संरचित, कार्यात्मक संबंध की रूपरेखा की ओर परिवर्तन का संकेत देते हैं।
यह तरीका हमेशा रहने वाली रणनीतिक प्राथमिकताओं से बना है– अफ़गान इलाके से पैदा होने वाले आतंकवाद के संकट को कम करना, इलाके की कनेक्टिविटी को बढ़ाना और मध्य एशिया तक पहुँच को सुनिश्चित करना– जबकि सरकार को औपचारिक पहचान देने से बचना। साथ ही, भारत एक ऐसी सरकार को मान्यता देने के जोखिमों से बंधा हुआ है जिसकी विश्व भर में बहिष्कार वाले शासन और महिलाओं के अधिकारों पर कड़ी पाबंदियों के लिए आलोचना हो रही है। साथ ही, तालिबान की अंदरूनी पारदर्शिता और अफ़गानिस्तान में जारी मानवीय संकट से भी भारत मज़बूर है। इस तरह, भारत की सोची– समझी कूटनीति, रणनीतिक आवश्यकताएं और नियमों के पालन में सावधानी के बीच संतुलन बनाने की कोशिश को दिखाती है जिसका लंबे समय तक चलना और नतीजे इलाके के बदलते हालात और भविष्य में तालिबान के व्यवहार पर निर्भर करेंगे।
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*डॉ. अन्वेषा घोष, आईसीडब्ल्यूए (ICWA) में शोध अध्येता हैं।
अस्वीकरण: व्यक्त किए गए विचार लेखिका के व्यक्तिगत विचार हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण
[i] “Afghan Govt welcomes India's Budget Allocation for Kabul”. Wion, February 02, 2026. Available at: https://www.wionews.com/world/afghan-govt-welcomes-india-s-budget-allocation-for-kabul-1770019260466 (Accessed on February 02, 2026).
[ii] “From Bangladesh to Nepal: Decoding India's aid to neighbours in Budget 2026.” Business Standard, Feb 02, 2026. Available at: https://www.business-standard.com/budget/news/india-budget-2026-neighbouring-countries-aid-bangladesh-afghanistan-126020200186_1.html (Accessed on February 02, 2026).
[iii] “Afghan Taliban envoy assumes responsibility charge at Delhi embassy”. The Hindu, Jan 13, 2026. Available at: https://www.thehindu.com/news/international/afghan-taliban-envoy-posted-to-indian-capital/article70503933.ece#google_vignette (Accessed on February 02, 2026).
[iv] “Taliban name student as Afghan envoy in Mumbai, India yet to respond.” India Today, November 13, 2024. Available at: https://www.indiatoday.in/world/story/afghanistan-taliban-propose-student-ikramuddin-kamil-acting-counsular-mumbai-consulate-india-2632659-2024-11-13 (Accessed on February 02, 2026).
[v] Afghan Envoy Noor Ahmad Noor Meets MEA Joint Secretary in New Delhi.” Deccan Chronicle, Jan 13, 2026. Available at: https://www.deccanchronicle.com/nation/current-affairs/afghan-envoy-noor-ahmad-noor-meets-mea-joint-secretary-in-new-delhi-1930150 (Accessed on February 02, 2026).
[vi] Ibid.
[vii] “Recalibrating Ties: India and the Taliban after the Taliban Acting FM’s Visit”. ICWA Issue Brief, October 24, 2026. Available at: /show_content.php?lang=1&level=3&ls_id=13757&lid=8365 (Accessed on February 02, 2026).
[viii] “Upgradation of the Technical Mission of India in Kabul to Embassy of India.” MEA Press Release, 21 October 2025. Available at: https://www.mea.gov.in/press-releases.htm?dtl/40223/Upgradation_of_the_Technical_Mission_of_India_in_Kabul_to_Embassy_of_India
[ix] “Meeting in Doha”. Ministry of External Affairs, Govt. of India Press Release, August 31, 2021. Available at: https://www.mea.gov.in/press-releases.htm?dtl/34208/Meeting_in_Doha (Accessed on February 02, 2026).
[x] “Deployment of a technical team in Embassy of India, Kabul”. Ministry of External Affairs, Govt. of India Press Release, 23 June, 2022 Available at: https://www.mea.gov.in/press-releases.htm?dtl/35437/Deployment+of+a+technical+team+in+Embassy+of+India+Kabul (Accessed on February 02, 2026).
[xi] “Afghan Govt welcomes India's Budget Allocation for Kabul”. Wion, Feb 02, 2026. Available at: https://www.wionews.com/world/afghan-govt-welcomes-india-s-budget-allocation-for-kabul-1770019260466 (Accessed on February 02, 2026).
[xii] “Taliban Minister Muttaqi in India Amid Escalating Pakistan-Afghanistan Tensions Over 'Cross-Border Airstrike'”. Swarajya, October 10, 2025. Available at: https://swarajyamag.com/news-brief/taliban-minister-muttaqi-in-india-amid-escalating-pakistan-afghanistan-tensions-over-cross-border-airstrike (Accessed on February 03, 2026).
[xiii] “Afghan Minister Azizi’s visit was very successful and productive: MEA.” The Hindu, November 27, 2026. Available at: https://www.thehindu.com/news/national/afghan-minister-azizis-visit-was-very-successful-and-productive-mea/article70327595.ece.
[xiv] “Taliban health minister visits India as contacts deepen.” Amu TV, Dec 16, 2025. Available at: https://amu.tv/216277/.
[xv] “India’s Taliban Outreach”. Gateway House, October 30, 2026. Available at: https://www.gatewayhouse.in/indias-taliban-outreach/ (Accessed on February 03, 2026).