सारांश: बांग्लादेश में फरवरी 2026 के आम चुनावों ने अहम राजनीतिक बदलाव दिखाया। इन चुनावों में बीएनपी (BNP) को दो– तिहाई बहुमत मिला, जबकि अवामी लीग को जनता ने बाहर का रास्ता दिका दिया और जुलाई घोषणापत्र के तहत व्यापक पैमाने पर संवैधानिक सुधारों को मंज़ूरी दी गई। वर्ष 2024 की “मानसून क्रांति” की उथल– पुथल से उभरकर, चुनावों ने देश की बहुत समय से चली आ रही राजनीतिक व्यवस्था में लोकतांत्रिक परिवर्तन और संरचनात्मक बदलाव, दोनों ही का संकेत दिया। यह लेख बीएनपी (BNP) की वापसी के घरेलू प्रभाव, मुख्य विपक्ष के रूप में जमात– ए– इस्लामी के उभरने और बड़े क्षेत्रीय प्रभाव का विश्लेषण करता है और बांग्लादेश की लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के समक्ष आने वाले अवसरों और समस्याओं पर विचार करता है।
बांग्लादेश के राजनीतिक माहौल में एक नया अध्याय का संकेत देने वाले महत्वपूर्ण घटनाक्रम में 12 फरवरी 2026 को हुए तेरहवें आम चुनावों में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी /BNP) को बड़ी जीत हासिल हुई। बीएनपी को 300 संसदीय सीटों में से लगभग 212 सीटों पर जीत मिली, इससे पार्टी को दो– तिहाई बहुमत मिल गया और पार्टी अकेले सरकार का गठन करने में समर्थ हुई।[i] यह नतीजा पार्टी की लगभग दो दशकों के बाद सत्ता में वापसी को दर्शाता है। इससे पहले बांग्लादेश में 2001 से 2006 तक बीएनपी की सरकार थी।
ध्यान देने की बात यह है कि ये चुनाव तीन दशकों में हुए ऐसे चुनाव थे जो अवामी लीग और दो प्रमुख राजनीतिक दिग्गजों– पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और बीएनपी की खालिदा ज़िया– की भागीदारी के बिना हुए थे, जिनका 1996 से बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति पर दबदबा था। शेख हसीना अपदस्थ होने के बाद से भारत में ही रह रही हैं जबकि खालिदा ज़िया का 30 दिसंबर 2025 को, उनके बेटे और बीएनपी के अस्थायी अध्यक्ष तारिक रहमान के लौटने के कुछ समय बाद निधन हो गया था। इस बदले हुए राजनीतिक माहौल में, लोगों की हमदर्दी और बीएनपी के फिर से उभरने की बड़ी उम्मीद से मज़बूत होकर चुनाव आखिरकार तारिक रहमान और जमात– ए– इस्लामी (जेईएल) प्रमुख शफ़ीकुर रहमान के बीच सीधे मुकाबले में बदल गया।
इसके साथ ही, लोकतांत्रिक शासन को मज़बूत करने के लिए बनाए गए संवैधानिक सुधारों के पैकेज, जुलाई घोषणापत्र पर एक राष्ट्रीय जनमत संग्रह को भारी मंज़ूरी मिली, जिसमें 70 फीसदी से अधिक मतदाताओं ने दो सदन वाली विधान मंडल बनाने, महिलाओं के लिए अधिक प्रतिनिधित्व, न्यायपालिका को अधिक स्वतंत्रता देना और प्रधानमंत्री के लिए दो– कार्यकाल की सीमा लागू करने जैसे उपायों का समर्थन किया, इन सभी का उद्देश्य शासन की गुणवत्ता को बेहतर बनाना था।[ii]
हालाँकि, यह देखना बाकी है कि नई सरकार, दो– तिहाई बहुमत होने के बावजूद, जनमत संग्रह के प्रावधानों को लागू करने के लिए कोई ठोस कदम उठाएगी या नहीं। 17 फरवरी को, जब तारिक रहमान और उनके कैबिनेट मंत्रियों ने पद की शपथ ली; बीएनपी (जमात के उलट) ने आम चुनाव के साथ हुए "जुलाई घोषणापत्र" जनमत संग्रह का समर्थन करने के लिए “संविधान सुधार आयोग” के सदस्य के रूप में दूसरी शपथ लेने से इनकार कर दिया, पार्टी ने कहा "परिषद का कोई भी प्रावधान अभी संविधान में शामिल नहीं किया गया है।"[iii]
मतदाताओं का प्रतिशत 60 से अधिक रहा[iv], जो 2024 के विवादित चुनावों में दर्ज 42 प्रतिशत की तुलना में बहुत अधिक है। यह बताता है कि अवामी लीग (एएल/AL) की अनुपस्थिति में चुनाव में सबको शामिल करने की आलोचनाओं के बावजूद जनता की भागीदारी फिर से बढ़ी है। हालाँकि, आलोचकों का कहना है कि एएल की भागीदारी के बिना, इस मुकाबले को पूरी तरह से सबको शामिल करने वाला नहीं माना जा सकता, इस हिसाब से, आखिरी सही मायने में प्रतिस्पर्धी और समावेशी चुनाव शायद 2008 में हुआ था जब शेख हसीना लगभग 80 प्रतिशत मतों के साथ सत्ता में लौटी थीं[v]- जो वर्तमान चुनावों से लगभग 20 प्रतिशत अधिक था।
अभी जो गिरावट दिख रही है, वह कुछ सीमा तक एएल के समर्थन आधार के कुछ हिस्सों के मतदान न करने की वजह से हो सकती है। राष्ट्रीय आंकड़ों ने स्पष्ट क्षेत्रीय अंतरों को भी छुपाया है: गोपालगंज, जो हसीना का पुराना चुनाव क्षेत्र और एएल का गढ़ रहा है, में, कहा जाता है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं ने मतदान नहीं किया और बाद में प्रतिबंधित पार्टी ने एक्स (X) पर नागरिकों को धन्यवाद दिया कि उन्होंने इसे “मतदाता– हीन” चुनाव कहकर खारिज कर दिया।[vi]
जेईएल के नेतृत्व में 11-दलों का गठबंधन मुख्य विपक्ष के रूप में उभरा जिसने करीब 77 सीटें जीतीं, जो उसकी ऐतिहासिक बढ़त से बहुत अधिक है और युवा मतदाताओं एवं परंपरागत राजनीति से निराश लोगों के बीच उसकी अपील का संकेत भी है।[vii] हालांकि चुनाव से पहले के जनमत सर्वेक्षण बीएनपी के पक्ष में दिखे क्योंकि पहले के प्रशासनिक अनुभव के साथ यह शासन का अधिक परंपारगत विकल्प है फिर भी जेईएल एक मजबूत दावेदार बना रहा।[viii] जनवरी 2024 के चुनावों से पहले पार्टी पर प्रतिबंध हटाए जाने के बाद से जेईएल ने सरकार विरोधी लामबंदी में सक्रिए रूप से भाग लिया है और अवामी लीग ने विरोधी बातों के बढ़ते प्रभाव का लाभ उठाया है।
इसके बाद इसने ढाका विश्वविद्यालय और चटगांव विश्वविद्यालय समेत बड़े सरकारी विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनावों में जीत हासिल की, जिससे युवा निर्वाचन क्षेत्रों में इसका प्रभाव बढ़ा।[ix] जुलाई 2024 के विद्रोह के नेताओं द्वारा बनाई गई नेशनल सिटिजन्स पार्टी (एनसीपी/NCP) के साथ इसकी सामरिक समझ से, युवा मतदाताओं के बीच इसकी अपील बढ़ने की उम्मीद थी, जो मतदाताओं का लगभग 44 प्रतिशत हैं। बीते अठारह महीनों में, पार्टी को कथित रूप से बांग्लादेश के कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय साझीदारों से बाहरी मदद भी मिली है।
हालांकि नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी/NCP) की छह सीटों की गिनती को आमतौर पर बहुत कम माना जा रहा है लेकिन दो वर्ष से भी कम पुरानी पार्टी के लिए यह नतीजे असाधारण हैं। खास बात यह है कि बीएनपी (BNP) नेता तारिक रहमान का चुनाव के बाद जमात–ए–इस्लामी प्रमुख और एनसीपी (NCP) नेता नाहिद इस्लाम, दोनों से उनके घरों पर मिलने का फैसला[x] बताता है कि बीएनपी उभरते और सहयोगी राजनीतिक कर्ताओं की रणनीतिक महत्व को पहचानती है और संवाद का माध्यम बनाए रखने को उत्सुक है।
मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार की देखरेख में हुए चुनाव बहुत हद तक शांतिपूर्ण रहे और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने इसे स्वतंत्र और उचित माना, हालांकि एएल (AL) को बाहर रखने पर आलोचकों ने भेदभाव और अधूरापन के आरोप लगाए। [xi] खबर है कि चुनाव और जनमत संग्रह पर नज़र रखने के लिए 394 अंतरराष्ट्रीय चुनाव पर्यवेक्षक और 197 विदेशी पत्रकार बांग्लादेश पहुँचे थे।[xii]
नीचे दिया गया मानचित्र 2026 के बांग्लादेशी आम चुनावों के नतीजों का चुनाव क्षेत्र के हिसाब से निर्वाचन क्षेत्रवार विस्तृत चित्र दिखाता है जिसमें देश के अधिकांश हिस्सों में बीएनपी का दबदबा (ज्यादातर नीले रंग में), कुछ प्रदेशों में जेईएल का उत्कृष्ट प्रदर्शन (हरे रंग में) और दूसरी छिट– पुट जीतें दिखाई गई हैं:

मानचित्र I: 2026 बांग्लादेश के आम चुनाव के नतीजों का मानचित्र
स्रोत: https://en.wikipedia.org/wiki/File:2026_Bangladeshi_General_Election_Result_Map.svg
संदर्भ: हसीना के अपदस्थ होने से लेकर अंतरिम शासन तक
जुलाई– अगस्त 2024 की उथल– पुथल भरी घटनाओं, जिसे बांग्लादेश में “मानसून क्रांति” कहा गया है, को दोबारा देखे बिना 2026 के चुनावों को सही तरीके से नहीं समझा जा सकता। उस समय नौकरी में आरक्षण और कथित सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ छात्रों के व्यापक विरोध प्रदर्शन पूरे देश में बगावत में बदल गए, जिससे प्रधानमंत्री शेख हसीना को 15 साल के निरंतर शासन के बाद भारत की शरण में आना पड़ा। हसीना सरकार को तेज़ आर्थिक विकास और अवसंरचनात्मक विकास का श्रेय दिया जाता है लेकिन उस पर तानाशाही, चुनावों में हेराफेरी और असहमति को दबाने का आरोप भी लगा। उनके अपदस्थ होने से एएल (AL), जिसने बहिष्कार और विवादों के बीच लगातार चुनाव जीते थे, के दबदबे वाले दौर का अंत हुआ।
इसके बाद, नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन किया गया ताकि व्यवस्था बहाल की जा सके और विश्वसनीय चुनावों की तैयारी की जा सके। इस समय की विशेषता संस्थाओं का अराजनीतिकरण करना, विद्रोह की हिंसा के कथित दोषियों, जिसमें हसीना भी शामिल थीं और जिन्हें नवंबर 2025 में बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने उनकी गैरमौजूदगी में मौत की सज़ा सुनाई थी, पर मुकदमा चलाने की कोशिशें थीं और राष्ट्रीय सर्वसम्मति आयोग के माध्यम से न्याय व्यवस्था में सुधार का प्रस्ताव रखा गया था।[xiii] जुलाई घोषणापत्र जिस पर अक्टूबर 2024 में 20 से अधिक दलों (एएल को छोड़कर) ने हस्ताक्षर किया था, इन परिवर्तनों के लिए एक ब्लूप्रिंट के रूप में सामने आया जिसमें चुनावी प्रशासन में तटस्थता पर ज़ोर दिया गया और कार्यकारी अधिकारियों के दखल पर रोक लगायी गई।[xiv]
हालांकि, इस बीच के समय में कूटनीतिक और घरेलू तनाव बहुत अधिक रहा। शेख हसीना के अपदस्थ होने के बाद के अठारह महीनों में पूरे देश में बहुत अशांति और छिट– पुट हिंसा देकी गई; जिसे कुछ जानकारों ने “भीड़तंत्र” की ओर झुकाव बताया, उसने इस बदलाव के दौरान संस्थागत प्राधिकार की खामियों को उजागर किया। इस दौरान आर्थिक मंदी ने लोगों की चिंता और बढ़ा दी क्योंकि महंगाई के दबाव और अनिश्चितता ने निवेशकों का विश्वास कम कर दिया।
इसके साथ ही, जमात–ए–इस्लामी ने अपने संगठन को फिर से बनाया और बढ़ाया, और कहा जाता है कि उसने देश और शैक्षणिक संस्थानों में अपना प्रभाव बढ़ाया। धार्मिक अल्पसंख्यकों– विशेष रूप से हिंदुओं और अहमदिया समुदाय के लोगों– के साथ– साथ अवामी लीग के समर्थकों पर हमले थोड़े–थोड़े समय अंतराल के बाद बढ़े, जिससे कानून और व्यवस्था एवं सामाजिक एकता संबंधी चिंताएं बढ़ गईं।
इन घटनाओं के कूटनीतिक परिणाम भी हुए। अल्पसंख्य़कों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं पर भारत ने तीखी प्रतिक्रिया दी और आपसी संबंधों में नई संवेदनशीलता आ गई। शेख हसीना के भारत में लगातार रहने और बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में भारत–बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि के तहत उनके प्रत्यर्पण की मांग को लेकर संबंध और भी तनावपूर्ण हो गए।[xv] नई दिल्ली ने उनकी मौजूदगी को मानवीय मामला बताया वहीं ढाका में आलोचकों ने इसे राजनीतिक शरण देने जैसा बताया।
मीडिया में तीखी बयानबाज़ी और बांग्लादेश की बदलती राजनीतिक दिशा को लेकर भारत की आशंकाओं के साथ इन हालात ने हाल के वर्षों में जो एक करीबी तालमेल वाली साझेदारी थी, उसमें स्पष्ट रूप से तनाव पैदा कर दिया। जैसा कि एक विश्लेषक ने चुनावों से पहले के मूल्यांकन में कहा था, ये चुनाव बांग्लादेश की लोकतांत्रिक मज़बूती के लिए “लिटमस टेस्ट” थे जो भाषाई राष्ट्रवाद से लेकर क्षेत्रीय और ऐतिहासिक प्रभाव से बने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की तरफ बड़े परिवर्तन को दर्शाते हैं।[xvi]
इस तरह चुनाव एक अहम मोड़ था, जिसमें इस बात का परीक्षण किया गया कि विद्रोह के बाद की व्यवस्था विरोध से होने वाली लामबंदी से स्थिर और संस्थागत शासन में बदल सकती है या नहीं।
मुख्य बातें: अवसर, चुनौतियाँ और चीन का दृष्टिकोण
भारत के लिए, बीएनपी की चुनावी जीत, संबंदों को फिर से ठीक करने का मौका देती है और साथ ही, दोनों देशों के संबंधों में हमेशा रहने वाली संरचनात्मक संवेदनशीलता की याद दिलाती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तारिक रहमान को बधाई देने वाले प्रथम नेताओं में से थे, जिससे यह संकेत मिलता है कि नई दिल्ली अवामी लीग के बाद की सरकार के साथ संबंध स्थापित करने और साझा ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंधों के आधार पर संबंदों को फिर से मज़बूत करने के लिए तैयार है।[xvii] विशेष रूप से बाहरी साझीदारों के साथ संबंधों को लेकर बीएनपी और जमात–ए–इस्लामी दोनों की तरफ से अब तक नरम रवैया दिखा है।
चुनाव के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया के साथ अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में रहमान ने इस बात पर ज़ोर दिया कि “बांग्लादेश और यहाँ के नागरिकों के हित हमारी विदेश नीति निर्धारित करेगी”[xviii], उन्होंने भारत पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में स्पष्ट किया कि ढाका देश– केंद्रित संरेखण की बजाए बहुपक्षवाद को मानेगा। "बांग्लादेश पहले" नज़रिए को लेकर उनकी बात भारत, चीन और पाकिस्तान जैसी पड़ोसी शक्तियों के साथ संबंधों में संतुलन बनाने की कोशिश करती है जो स्पष्ट रूप से बदलाव के बजाय रणनीतिक स्वतंत्रता का संकेत देती है।[xix]
बीएनपी की वापसी से सीमा प्रबंधन, कनेक्टिविटी, व्यापार और तीस्ता मुद्दे जैसे लंबित जल–साझाकरण व्यवस्था पर भारत के साथ सहयोग को अंतिम रूप देने का मौका मिलता है। साथ ही भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी और बिम्स्टेक (BIMSTEC) रूपरेखा के तहत उप–क्षेत्रीय पहलों को भी बेहतर किया जा सकता है। साथ ही, नई दिल्ली जमात–ए–इस्लामी की बढ़ी हुई संसदीय मौजूदगी पर करीब से नज़र रखेगी, विशेषरूप से पश्चिम बंगाल और असम के सीमावर्ती प्रदेशों में इसकी बढ़त पर (मानचित्र । देखें) क्योंकि उत्तरपूर्व में भारत की सुरक्षा संवेदनशीलता और कट्टपंथी नेटवर्क और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा संबंधी चिंताएं हैं। बदलता राजनीतिक माहौल इस बात पर ज़ोर देता है कि भारत के लिए एक बड़े पैमाने पर संस्था आधारित नज़रिया अपनाना आवश्यक है जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया, संस्थागत मज़बूती और आपसी बातचीत में दीर्घकालिक स्थिरता को प्राथमिकता दे।
चीन का पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार और पायरा बंदरगाह जैसी परियोजनाओं में बुनियादी ढांचा संबंधी प्रमुख निवेशक होने के नाते चीन ने बीएनपी और इस्लामी समूहों समेत सभी दलों तक पहुँच बनाए रखी है। बीजिंग ने तुरंत नई सरकार का स्वागत किया और "संबंधों को बेहतर" बनाने की इच्छा जताई।[xx] हालाँकि, बीएनपी सरकार बढ़ते हिंद–प्रशांत विवादों के बीच एक सोची–समझी संतुलन रणनीति अपना सकती है।
भारत के लिए, यह निरंतर आर्थिक जुड़ाव, विकास साझेदारी और सामरिक प्रवाह को रोकने के लिए ऊर्जा और कनेक्टिविटी में सहयोग बढ़ाने की ज़रूरत को दिखाता है। साथ ही, नई दिल्ली को सलाह दी जाएगी कि वह किसी एक राजनीतिक समूह पर बहुत अधिक विश्वास करके एक ही विकल्प पर निर्भर होने से बचे। इसकी बजाय वह राजनीतिक स्पेक्ट्रम, सरकारी संस्थाओं और नागर समाज में व्यापक पैमाने पर संबंध स्थापित करने की कोशिश करे जो घरेलू राजनीतिक उतार–चढ़ाव से द्विपक्षीय संबंधों को बचाने के लिए बहुत आवश्यक होगा। बदलाव को कूटनीतिक संवेदनशीलता के साथ प्रबंधित करना ढाका की गठबंधन की राजनीति में संतुलन को बढ़ावा देना और ऐसी बयानबाज़ी से बचना जिससे भारत– विरोधी बातें फैल सकती हैं, यह सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी होगा कि राजनीतिक परिवर्तन के बावजूद द्विपक्षीय संबंध मज़बूत बने रहें।
निष्कर्ष
वर्ष 2026 के आम चुनाव ढाका की राजनीतिक राह में एक नया अध्याय जोड़ रहे हैं। शेख हसीना को अपदस्थ किए जाने के बाद आई उथल– पुथल से उबरते हुए, इन चुनावों ने न केवल सत्ता का हस्तांतरण को दर्शाया बल्कि बांग्लादेश की राजनीतिक व्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन को भी परिलक्षित किया। बीएनपी का अहम जनादेश, जमात– ए–इस्लामी का मुख्य विपक्ष के रूप में मज़बूत होना और संवैधानिक सुधारों को मंजूरी मिलना, ये सब मिलकर लोकतांत्रिक नवीकरण एवं व्यवस्थित परिवर्तन, दोनों को दर्शाते हैं, जो लगभग तीन दशकों के दो– नेताओं के दबदबे से बाहर निकलने का संकेत दे रहे हैं। फिर भी, इस समय की स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार चुनावी सफलता को संस्थाओं को मज़बूत बनाने, कानून–व्यवस्था को दुरुस्त करने और आर्थिक स्थिरता में बदलने की कितनी काबिलियत रखती है। इसलिए, 2026 के चुनाव बदलाव का मौका और बांग्लादेश की लोकतांत्रिक मज़बूती की महत्वपूर्ण परीक्षा, दोनों है।
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*डॉ. अन्वेषा घोष, आईसीडब्ल्यूए (ICWA) में शोध अध्येता हैं।
अस्वीकरण: व्यक्त किए गए विचार लेखिका के व्यक्तिगत विचार हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण
[i] “ত্রয়োদশ জাতীয় সংসদ নির্বাচন ২০২৬” [13th National Parliamentary Election 2026]. Prothom Alo, February 13, 2026. Available at: https://election.prothomalo.com/ (Accessed on 16.2.26) ; “Bangladesh election results 2026: Who won, who lost, what’s next?” Al Jazeera, Feb 13, 2026. Available at: https://www.aljazeera.com/news/2026/2/13/bangladesh-election-results-2026-who-won-who-lost-whats-next(Accessed on 16.2.26)
[ii] “70% Bangladeshis Voted 'Yes' To July Charter. What Does It Mean?”NDTV World, Feb 14, 2026. Available at: https://www.ndtv.com/world-news/70-bangladeshis-voted-yes-to-july-charter-what-does-it-mean-11001022(Accessed on 16.2.26)
[iii] “Tarique Rehman’s Oath Taking Ceremony Highlights”. NDTV, Feb 18, 2026. Available at: https://www.ndtv.com/world-news/bangladesh-pm-oath-taking-2026-live-updates-bangladesh-pm-tarique-rahman-bnp-government-swearing-in-dhaka-om-birla-11015273
[iv] “Bangladesh sees strong voter turnout, early counts show tight race between BNP and Jamaat”. The Telegraph Online, Feb 12, 2026. Available at: https://www.telegraphindia.com/world/bangladesh-sees-strong-voter-turnout-early-counts-show-tight-race-between-bnp-and-jamaat/cid/2147076#goog_rewarded
[v] “80% Turnout in Bangladesh Polls”. Times of India, Dec 29, 2008. Available at: https://timesofindia.indiatimes.com/world/south-asia/80-turnout-in-bangladesh-polls/articleshow/3910191.cms
[vi] In Hasina’s hometown in Bangladesh, voters face an unfamiliar ballot”. Reuters, Feb 6, 2026. Available at: https://www.reuters.com/world/asia-pacific/hasinas-hometown-bangladesh-voters-face-an-unfamiliar-ballot-2026-02-06/(Accessed on 16.2.26)
[vii] “ত্রয়োদশ জাতীয় সংসদ নির্বাচন ২০২৬” Prothom Alo, February 13, 2026. Ibid.
[viii] “Who Is Gonna Win The Bangladesh Elections 2026? Surveys Predict Close BNP vs Jamaat Contest As Nation Prepares For Historic Vote.” The Sunday Guardian. Feb 11. 2026. Available at: https://sundayguardianlive.com/world/who-is-gonna-win-the-bangladesh-elections-2026-surveys-predict-close-bnp-vs-jamaat-contest-as-nation-prepares-for-historic-vote-169793/(Accessed on 16.2.26)
[ix] “Islamists Sweep Students’ Union Elections in Key Universities in Bangladesh. ”The Diplomat, Sep 27, 2025. Available at: https://thediplomat.com/2025/09/islamists-sweep-students-union-elections-in-key-universities-in-bangladesh/(Accessed on 16.2.26)
[x] “BNP's Tarique Rahman Meets Jamaat's Chief Two Days Before Taking Oath As Bangladesh's PM” News 18, Feb 15, 2026. Available at: https://www.news18.com/world/bnps-tarique-rahman-meets-jamaats-chief-two-days-before-taking-oath-as-bangladeshs-pm-ws-l-9905629.html
[xi] “Foreign observers praise peaceful voting, strong turnout in Bangladesh polls.”Dhaka Tribune, Feb 13, 2026. Available at: https://www.dhakatribune.com/(Accessed on 17.2.26)
[xii] Ibid
[xiii] “Bangladesh's ousted leader Sheikh Hasina sentenced to death.” BBC, 17 Nov 2025. Available at: https://www.bbc.com/news/articles/cpwvg99e8vdo (Accessed on 17.2.26)
[xiv] “The July Charter: A New Beginning for Bangladesh’s Democratic Future.” The Diplomat, Oct 27, 2025. Available at: https://thediplomat.com/2025/10/the-july-charter-a-new-beginning-for-bangladeshs-democratic-future/(Accessed on 17.2.26)
[xv] TREATY BETWEEN THE THE REPUBLIC OF INDIA AND PEOPLE'S REPUBLIC OF BANGLADESH RELATING TO EXTRADITION, High Commission of India, Dhaka, January 28, 2013. Available at: https://hcidhaka.gov.in/press?id=eyJpdiI6ImwzN2MwUXZjd204Rmtielp0RHlHVXc9PSIsInZhbHVlIjoiYVNnWHJ1d0dJR2U5ZGNWTVpqWkc1dz09IiwibWFjIjoiZmFkY2UyZDliODQxOTk1MjBiMGU2MzViMWNiMDdhMjY5YjcxNWQ0OWY5MGJhNWQ0YTY2MzQ4YmZmYWFmZjU5ZCJ9(Accessed on 17.2.26)
[xvi] TCA Raghavan, ”A Litmus Test”. The Telegraph, 11 February 2026. Available at: https://www.telegraphindia.com/opinion/a-litmus-test-bangladesh-election-is-of-immense-significance-prnt/cid/2146819
[xvii] “PM congratulates Tarique Rahman on Bangladesh election victory; reaffirms India’s commitment to bilateral ties.” PMINDIA, Feb 13, 2026. Available at: https://www.pmindia.gov.in/en/news_updates/pm-congratulates-tarique-rahman-on-bangladesh-election-victory-reaffirms-indias-commitment-to-bilateral-ties/?comment=disable(Accessed on 18.2.26)
[xviii] “'Bangladesh First': Tarique Rahman's Reply To Query On Ties With India.” NDTV, Feb 15, 2026. Available at: https://www.ndtv.com/world-news/bangladesh-comes-first-bnp-chief-tarique-rahman-on-his-foreign-policy-11004456(Accessed on 18.2.26)
[xix] Ibid
[xx] “China says ready to work with new govt in Bangladesh to scale up ties.” Daily Excelsior, Feb 14, 2026. Available at: https://www.dailyexcelsior.com/china-says-ready-to-work-with-new-govt-in-bangladesh-to-scale-up-ties/(Accessed on 18.2.26)