प्रस्तावना
हाल ही में लैटिन अमेरिका में होंडुरास, चिली, बोलीविया और कोस्टा रिका में हुए चुनावों के पश्चात् इस क्षेत्र में रूढ़िवादी[i] सरकारों की संख्या बढ़ गई है। सुरक्षा, बेरोज़गारी, असमान आर्थिक वृद्धि, स्थापित व्यवस्था से मोहभंग होना और दलों तथा उम्मीदवारों द्वारा आक्रामक चुनाव प्रचार जैसे मुद्दों ने इन सभी देशों में रूढ़िवादी दलों को मज़बूत किया है। यह लैटिन अमेरिका की उस पुरानी राजनीतिक ‘परंपरा’ को फिर से सामने लाता है कि यह बड़े वामपंथी और रूढ़िवादी समूहों के बीच एक वैचारिक मैदान बना रहेगा। पिंक टाइड[ii] की याद दिलाते हुए, जिसमें 2000 के दशक में और फिर 2010 के दशक के अंत में वामपंथ को लगातार जीत मिली थी, 2025 के बाद से रूढ़िवादा का उभरना नए आयाम दिखाता है।
शुरुआत में ही, यह क्षेत्र कई चुनौतियों का सामना कर रहा है और ये केवल घरेलू क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं बल्कि इसके बाहरी संबंधों तक भी फैली हुई हैं। ऐसी विश्व व्यवस्था में जो काफी हद तक बंटी हुई है, एक मज़बूत अमेरिका और अन्य देशों, विशेष रूप से चीन, के बीच फँसी इन नई सरकारों के सामने कठिन चुनौती है। इसके साथ ही, घरेलू स्तर पर अच्छा प्रदर्शन करने और अच्छा परिणाम देने का दबाव तथा पूरे महाद्वीप में एक व्यापक रूढ़िवादी ‘दृष्टिकोण’ बनाने की संभावना भी सामने है।
यह शोधपत्र यह तर्क देता है कि इन देशों के सामने दो व्यापक विकल्प मौजूद हैं: पहला, रणनीतिक स्वायत्तता को त्यागकर अमेरिका के साथ अच्छा संबंध बनाना, लेकिन एक दृढ़ अमेरिकी प्रशासन की जांच-पड़ताल से बचना। दूसरा, बाहरी संबंधों में विविधता लने के मार्ग पर आगे बढ़ना, विशेष रूप से चीन के साथ, लेकिन इसकी कीमत अमेरिका को नाराज़ करने के रूप में चुकानी पड़ सकती है। यह भी बिना किसी संदेह के दोहराया जाना चाहिए कि लैटिन अमेरिका धीरे-धीरे भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बनता जा रहा है और विगत कुछ वर्षों की घटनाओं को देखते हुए यह प्रवृत्ति और अधिक स्पष्ट हो गई है। अतः, रूढ़िवादी राजनीतिक जीतों के बावजूद, इन देशों को अपने लाभ को बढ़ाने के लिए संतुलन बनाकर चलना होगा।
वॉशिंगटन का नया अवसर
अमेरिका के लिए, इस क्षेत्र के रणनीतिक महत्व और उसके अधिक दृढ़ रुख के कारण, रूढ़िवादी लहर एक अच्छी खबर है।
हालाँकि यह मान लेना आकर्षक हो सकता है कि सत्ता में परिवर्तन स्वतः ही विदेश नीति के पुनर्संरेखण को जन्म देता है, लेकिन समकालीन लैटिन अमेरिका उन परिस्थितियों के अंतर्गत काम करता है जो पहले के वैचारिक चक्रों को आकार देने वाली परिस्थितियों से बहुत अलग हैं। लगातार घरेलू दबाव का मतलब है कि सरकारों का आकलन उनके वादों को पूरा करने की क्षमता के आधार पर अधिक किया जाता है। मतदाताओं ने काम करो या समाप्त हो जाओ की तर्कप्रणाली[iii] को अपनाया है। जो नेता कीमतों को स्थिर करने, रोजगार उत्पन्न करने या अपराध को नियंत्रित करने में विफल रहते हैं, वे अपने वैचारिक पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना जल्द ही वैधता खो देते हैं। हालांकि, इस क्षेत्र में कई देशों में स्थिर गठबंधन और दृढ़ बहुमत वाली सरकारें दिखाई देती हैं, फिर भी ऐसे वातावरण में वे प्रशासन भी, जो राजनीतिक रूप से एक दृढ़ अमेरिकी राष्ट्रपति पद के अधिक निकट महसूस करते हैं, बिना शर्त संरेखण का जोखिम नहीं उठा सकते यदि इससे व्यापार विविधीकरण, वित्त तक पहुँच या घरेलू स्थिरता को खतरा हो। इसलिए, लैटिन अमेरिका में यह एक उभरती हुई और स्वागतयोग्य प्रवृत्ति है कि नागरिक केवल औपचारिक बयानबाज़ी के बजाय अधिक जवाबदेही और चुनावी वादों की वास्तविक पूर्ति की मांग कर रहे हैं।
इस तरह जो चीज़ उभर कर सामने आ रही है उसे बेहतर रूप से व्यावहारिक रूढ़िवाद के एक रूप माना जा सकता है।[iv] इन सरकारों में बाज़ार के विश्वास, संस्थागत व्यवस्था और वाशिंगटन के साथ निकट संवाद के प्रति झुकाव दिखाई दे सकता है, फिर भी वे साथ ही यह भी समझती हैं कि रणनीतिक स्वायत्तता को छोड़ा नहीं जा सकता। अपनी स्वायत्तता छोड़ने के बजाय, उनके बाहरी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने की अधिक संभावना है, ताकि प्रतिस्पर्धा का लाभ उठाकर बेहतर व्यापार शर्तें, अवसंरचना वित्तपोषण और प्रौद्योगिकी तक पहुँच हासिल की जा सके। संरेखण चयनात्मक और लेन-देन आधारित बन जाता है। उदाहरण के लिए, सुरक्षा या प्रवासन के मुद्दों पर अमेरिका के साथ सहयोग, चीन के साथ निरंतर आर्थिक जुड़ाव के साथ समानांतर रूप से आगे बढ़ सकता है। इस दृष्टिकोण की प्रमुख विशेषता वैचारिक निकटता नहीं बल्कि सौदेबाज़ी की क्षमता है। इस अर्थ में वर्तमान समय पहले से काफ़ी अलग है, क्योंकि इसमें रूढ़िवादी प्रवृत्तियों को जनता की मापनीय परिणामों और जवाबदेही की मांग के साथ जोड़ा गया है।[v]
इस परिस्थिति में दो बड़े रणनीतिक रास्ते संभव हैं। पहला, संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ करीबी संबंध बनाना, जिससे रणनीतिक स्वायत्तता कुछ कम हो सकती है। दूसरा रास्ता यह है कि वाशिंगटन के साथ कूटनीतिक और भाषणात्मक निकटता बनाए रखते हुए साथ-साथ चीन, यूरोप और अन्य एशियाई पक्षों के साथ आर्थिक और तकनीकी साझेदारी भी बढ़ाई जाए। लेकिन दोनों रास्तों में जोखिम हैं, खासकर जब अमेरिका अधिक दृढ़ रुख अपना रहा हो और क्षेत्रीय राजनीति में दबाव और ब्लैकमेल जैसी रणनीतियाँ भी इस्तेमाल हो रही हों।
वाशिंगटन के साथ मजबूत संरेखण की रणनीति कुछ संभावित लाभ दे सकती है। इतिहास में अमेरिका के साथ सहयोग से बाज़ारों तक विशेष पहुँच, सुरक्षा सहायता, विकास वित्त और बहुपक्षीय मंचों पर राजनीतिक समर्थन मिला है। गंभीर वित्तीय और सुरक्षा संकट झेल रही सरकारों के लिए ये लाभ बहुत जरूरी लग सकते हैं। फिर भी हाल का अनुभव बताता है कि केवल वैचारिक समानता से अच्छे परिणाम की गारंटी नहीं मिलती।[vi] ट्रम्प के राष्ट्रपति काल में इस्पात और एल्युमिनियम पर लगाए गए शुल्क जैसे कदमों ने पूरे क्षेत्र के कई भागीदार देशों को प्रभावित किया, जिनमें वे देश भी थे जो वाशिंगटन के साथ अच्छे संबंध रखना चाहते थे। अमेरिका की व्यापक कूटनीतिक नीति ने पारस्परिकता और जिम्मेदारी साझा करने पर ज़ोर दिया, जिससे यह धारणा बनी कि बातचीत असमान शक्ति संतुलन का फायदा उठाकर की जा रही है। इसके अलावा, अमेरिका की नीति अब लैटिन अमेरिका को ऐसे रणनीतिक क्षेत्र के रूप में देखती है जहाँ बाहरी शक्तियों, खासकर चीन, की मौजूदगी को सीमित करना जरूरी समझा जाता है। प्रतिबंध, कूटनीतिक दबाव और अवसंरचना, दूरसंचार और बंदरगाह परियोजनाओं को लेकर दी गई चेतावनियाँ यह दिखाती हैं कि ऐसे समझौतों के लिए कम सहनशीलता है जो प्रतिद्वंद्वी प्रभाव बढ़ा सकते हैं। इसलिए लैटिन अमेरिकी नेताओं के लिए अमेरिका के साथ संरेखण कुछ समर्थन तो दे सकता है, लेकिन इससे बाहरी संबंधों में उनकी स्वतंत्रता भी कम हो सकती है। ऐसे में जरूरी है कि बाहरी दबावों के बीच घरेलू हितों की रक्षा के लिए जनता का विश्वास बनाए रखा जाए।
दूसरा रास्ता अमेरिका से हटकर संबंधों का विविधीकरण करना है। विगत दो दशकों में चीन इस क्षेत्र का एक प्रमुख आर्थिक भागीदार बन गया है और कई देशों में उसने मुख्य व्यापारिक भागीदार के रूप में अमेरिका की जगह ले ली है। वस्तुओं की चीनी मांग ने सरकारी आय को सहारा दिया है, जबकि चीनी बैंक और राज्य से जुड़े उद्यमों ने राजमार्गों, ऊर्जा परियोजनाओं, खनन और डिजिटल अवसंरचना में निवेश किया है। यूरोपीय पक्ष भी निवेश, नियामक मॉडल और जलवायु वित्त के महत्वपूर्ण स्रोत बने हुए हैं। इस स्थिति में कई सरकारें चयनात्मक सहयोग की नीति अपनाने की कोशिश करती हैं-प्रवासन नियंत्रण, मादक पदार्थ विरोधी अभियानों और रक्षा के मामलों में अमेरिका के साथ सहयोग करते हुए, साथ ही बीजिंग और ब्रुसेल्स के साथ व्यापारिक संबंध बनाए रखना या बढ़ाना। इसका उद्देश्य यह है कि महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा का उपयोग सौदेबाज़ी की ताकत के रूप में किया जाए[vii], ताकि अलग-अलग भागीदारों से बेहतर व्यापार शर्तें, तकनीकी हस्तांतरण और अवसंरचना निवेश प्राप्त किए जा सकें।
फिर भी यह संतुलन बनाना आसान नहीं है और इसके लिए कुशल कूटनीति की आवश्यकता होती है। यदि कोई अमेरिकी प्रशासन क्षेत्र में प्रतिद्वंद्वी शक्तियों के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए दृढ़ हो, तो वह इस रणनीति को अपने लिए नुकसानदायक मान सकता है। टैरिफ लगाने की धमकी, विकास से जुड़े वित्त पर प्रतिबंध या कूटनीतिक अलगाव जैसे कदम लैटिन अमेरिकी देशों के सामने उपलब्ध विकल्पों को सीमित कर सकते हैं।
चीन के विकल्प
लैटिन अमेरिका के प्रति चीन की नीति मुख्यतः उसके दीर्घकालिक हितों पर आधारित है, जो व्यापार, वित्त और आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा से जुड़े हैं। विगत दो दशकों में चीन कई लैटिन अमेरिकी देशों का प्रमुख व्यापारिक भागीदार[viii] बन गया है। वह सोयाबीन, बीफ और अनाज जैसे कृषि उत्पादों का बड़ा खरीदार है और तांबा, लौह अयस्क, हाइड्रोकार्बन और अब बढ़ते हुए लिथियम का भी महत्वपूर्ण उपभोक्ता है। विगत बीस वर्षों में चीन-लैटिन अमेरिका व्यापार तेजी से बढ़ा है। इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में इसकी भूमिका बहुत सीमित थी, लेकिन आज चीन कई बड़े लैटिन अमेरिकी देशों का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बन चुका है और सोयाबीन, तांबा, लौह अयस्क और ऊर्जा संसाधनों जैसे उत्पादों का प्रमुख बाज़ार है। चीन का यह विस्तार केवल द्विपक्षीय व्यापार से ही नहीं, बल्कि चीन-सीईएलएसी फोरम जैसे मंचों के माध्यम से भी हुआ है, जो 33 लैटिन अमेरिकी और कैरेबियाई देशों[ix] के साथ लगातार राजनीतिक संवाद और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देता है।
इसलिए यदि कुछ सरकारें वाशिंगटन के साथ अधिक निकटता दिखाती हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि चीन पीछे हट जाएगा। इसके बजाय चीन ने दिखाया है कि वह अलग-अलग राजनीतिक विचारों वाली सरकारों के साथ भी काम कर सकता है। वह अपने सहयोग को विकास वित्त, अवसंरचना निर्माण एवं व्यापार के अवसरों के रूप में पेश करता है।[x] राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में भी चीन आम तौर पर सीधे टकराव से बचता है। वह आर्थिक सहयोग को मजबूत करने और साझेदार देशों को यह भरोसा दिलाने की कोशिश करता है कि यह संबंध किसी एक पक्ष के नुकसान पर आधारित नहीं है।
हालाँकि, यदि क्षेत्र में अधिक रूढ़िवादी राजनीतिक माहौल बनता है और अमेरिका का नेतृत्व चीनी प्रभाव को कम करने हेतु दृढ़ होता है, तो इससे चीन के सामने नई चुनौतियाँ आ सकती हैं। उदाहरण के लिए, पनामा कैनल[xi] से जुड़े चीनी बंदरगाह संचालन को लेकर हुए विवाद ने यह दिखाया कि व्यापारिक परियोजनाएँ जल्दी ही राजनीतिक मुद्दा बन सकती हैं और बाहरी दबाव में सीमित भी की जा सकती हैं।
ऐसी स्थिति में चीन संभवतः संतुलन की रणनीति अपनाएगा। वह रणनीतिक संसाधनों तक अपनी पहुँच बनाए रखना चाहेगा और उन क्षेत्रों में कम दिखाई देगा जहाँ राजनीतिक विरोध की संभावना अधिक हो। इसके लिए वह वस्तुओं की आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी भूमिका बढ़ा सकता है, नवीकरणीय ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों में सहयोग बढ़ा सकता है, स्थानीय सरकारों और व्यापारिक समूहों के साथ संबंध मजबूत कर सकता है, और ऐसे समझौते कर सकता है जिनसे लैटिन अमेरिकी देश वाशिंगटन के करीब रहते हुए भी बीजिंग के साथ आर्थिक संबंध जारी रख सकें। इस तरह चीन पीछे हटने के बजाय बदलते माहौल के अनुसार खुद को ढालने की कोशिश करेगा। वह प्रतिस्पर्धा वाले माहौल में अपने बनाए हुए स्थान[xii] को बनाए रखना चाहेगा और ऐसे क्षेत्र में टकराव से बचना चाहेगा जो ऐतिहासिक रूप से महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा के प्रति संवेदनशील रहा है।
यह दृष्टिकोण यह भी दिखाता है कि लैटिन अमेरिकी देश, भले ही सार्वजनिक रूप से अमेरिका के करीब दिखें, फिर भी अपनी स्वतंत्रता और सौदेबाज़ी की शक्ति को बनाए रखना चाहेंगे। वे किसी एक देश को पूरा प्रभाव देने के बजाय अलग-अलग बाहरी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा का उपयोग अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए करेंगे।
रूढ़िवादी लहर से अपेक्षाएँ
इस समय मुख्य सवाल यह है कि क्या महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा के बीच लैटिन अमेरिका में रूढ़िवादी देशों का कोई समूह बनाने की कोशिश होगी। समझदारी इसी में है कि यह प्रक्रिया अचानक नहीं बल्कि धीरे-धीरे और साझा लक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़े। फिर भी ऐसा सहयोग व्यावहारिक और लचीला ही रहेगा। सरकारों को अपने अलग-अलग राष्ट्रीय हितों और चीन तथा अमेरिका दोनों के साथ संबंधों के बीच संतुलन बनाना होगा, ताकि अपने नागरिकों को अधिकतम लाभ मिल सके।
लैटिन अमेरिका में रूढ़िवादी राजनीति के फिर उभरने से यह सवाल उठता है कि क्या वैचारिक समानता वास्तव में क्षेत्रीय सहयोग में बदल सकती है, खासकर जब भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही हो। पहले की रूढ़िवादी सरकारें आम तौर पर अमेरिका के साथ करीबी संबंध रखना पसंद करती थीं। लेकिन आज स्थिति अलग है। अब सरकारों पर घरेलू स्तर पर अच्छा काम करने का ज्यादा दबाव है और दूसरे बाहरी साझेदारों की भूमिका भी बढ़ गई है।[xiii] इसलिए विदेश नीति अब ज्यादा व्यावहारिक हो गई है और कूटनीति का उपयोग अलग-अलग देशों के साथ संबंध बढ़ाने के लिए किया जा रहा है, ताकि घरेलू राजनीतिक और आर्थिक स्थिरता बनी रहे। जो नेता राजनीतिक रूप से वाशिंगटन के करीब भी हों, उन्हें भी इस वास्तविकता को स्वीकार करना पड़ता है कि चीन अब लैटिन अमेरिका के कई देशों का प्रमुख व्यापारिक भागीदार बन चुका है।
जहाँ तक किसी रूढ़िवादी गठबंधन की बात है, तो पीआरओएसयूआर जैसे संगठनों के फिर से मजबूत होने की संभावना कम दिखती है, लेकिन वे सहयोग के आधार बन सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध से निपटना, प्रवासन प्रबंधन, अवसंरचना संपर्क, ऊर्जा सहयोग और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ व्यावहारिक सहयोग संभव है। इन क्षेत्रों में किया गया सहयोग चुनावी बदलावों के बाद भी लंबे समय तक लाभ दे सकता है।[xiv] फिर भी कई बड़ी चुनौतियाँ बनी हुई हैं: कमज़ोर संस्थाएँ, राष्ट्रपति आधारित राजनीति की अस्थिरता, और यह प्रवृत्ति कि देश क्षेत्रीय सहयोग के बजाय बड़ी शक्तियों के साथ सीधे समझौते करना अधिक पसंद करते हैं। इसलिए सबसे अधिक संभावना यही है कि कोई मजबूत रूढ़िवादी समूह नहीं बनेगा, इसके बजाय अलग-अलग साझेदारियों का एक लचीला ढाँचा बनेगा, जिसमें देश जहाँ हित मिलते हैं वहाँ सहयोग करेंगे और बाकी मामलों में अपनी स्वतंत्रता बनाए रखेंगे।
निष्कर्ष
लैटिन अमेरिकी देशों को अवसर और सीमाओं, साझेदारी और निर्भरता के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा। महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा उनकी स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता को खत्म नहीं करती, लेकिन गलत फैसलों का जोखिम बढ़ा देती है। इसलिए सबसे संभव स्थिति यह है कि न तो पूरी तरह किसी एक पक्ष के साथ जुड़ाव होगा और न ही खुला विरोध। इसके बजाय लगातार बातचीत और समझौते की प्रक्रिया चलेगी, ताकि लाभ अधिकतम हो और जोखिम कम रहे। यही आज के लैटिन अमेरिका में व्यावहारिक रूढ़िवाद की मुख्य सोच है।
सवाल यह है कि रूढ़िवादी राजनीति के फिर उभरने के बावजूद, जो वाशिंगटन हेतु निश्चित रूप से अच्छी बात है, क्या लैटिन अमेरिका इसका उपयोग करके अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रख सकता है, खासकर तब जब अमेरिका अधिक आक्रामक रुख अपना रहा हो और यह क्षेत्र धीरे-धीरे भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बनता जा रहा हो?
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*डॉ. अर्नब चक्रवर्ती, शोधकर्ता, आईसीडब्ल्यूए।
अस्वीकरण: व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण
[i] The word conservative is deliberately used instead of right-wing considering that not all parties and candidates would identify themselves as right-wing. Instead, these groups often follow a wide range of non-left practices such as liberalisation of the economy, tougher security norms, promotion of free trade and lesser state intervention.
[ii] Known in Spanish as Marea Rosa, the Pink Tide was christened so, as a political event that saw left candidates and parties win across Latin America and who later on adopted 21st century socialism, greater state intervention and a more assertive foreign policy which was distant from the US.
[iii] Matías Brum et.al. (2025). Surfing the Latin American Pink Tide; Secular Trends or Sudden Change in Public Opinion? An Oaxaca-Blinder Approach. Economía LACEA Journal. 24(1). Accessed 25th February 2026. https://economia.lse.ac.uk/articles/10.31389/eco.496.
[iv] Rafael Velazquez Flores et.al. (2023). Principled Pragmatism: A Latin American contribution for foreign policy analysis/ International Relations. 59. Accessed 25th February 2026. http://www.irjournal.pl/pdf-205323-125410?filename=Principled-pragmatism--A-.pdf.
[v] Thiago de Aragão. (2026). A Region Under Watch: Latin America in the Age of Strategic Competition. Institute of the Americas. Accessed 26th February 2026. https://iamericas.org/wp-content/uploads/2026/01/A-Region-Under-Watch-brief-by-Thiago-de-Aragao.pdf.
[vi] León Padilla. (2026). Cuando la ideología sustituye a la política económica: de Trump a Noboa. Latinoamérica21. Accessed 28th February 2026. https://latinoamerica21.com/es/cuando-la-ideologia-sustituye-a-la-politica-economica-de-trump-a-noboa/.
[vii] John Polga-Hecimovich. (2025). Latin America caught between the U.S. and China. GIS. Accessed 27th February 2026. https://www.gisreportsonline.com/r/latam-between-us-china/.
[viii] Alejandro Peña Esclusa. (2026). China tightening its grip on Latin America. GIS. Accessed 26th February 2026. https://www.gisreportsonline.com/r/china-latin-america-2/.
[ix] The emphasis on economic partnership is further evidenced by mechanisms such as the China-LAC Cooperation Fund, which allocates multibillion-dollar credit and co-financing facilities to projects across infrastructure, energy, and industrial development, creating interlocking interests that transcend short-run political changes. In this sense, China’s strategic approach assumes that economic entanglement generates political durability: ties embedded in trade, investment and infrastructure are resistant to electoral swings, even when domestic politics shift toward ideological proximity to the United States.
[x] Henrietta Levin. (2026). China’s strategy for Latin America and the ’Trump Corollary’. Brookings. Accessed 28th February 2026. https://www.brookings.edu/articles/chinas-strategy-for-latin-america-and-the-trump-corollary/.
[xi] A salient example is the controversy surrounding Chinese involvement in the Panama Canal’s logistical infrastructure, where port operations historically managed by Hong Kong’s CK Hutchison have become a flashpoint of geopolitical contention. In early 2026 Panama’s Supreme Court annulled the concession contract an outcome widely interpreted as aligned with broader U.S. efforts to limit Chinese influence near this critical maritime chokepoint.
[xii] Margaret Myers. (2025). China’s New Playbook for Latin America. Americas Quarterly. Accessed 26th February. https://americasquarterly.org/article/chinas-new-playbook-in-latin-america/.
[xiii] Juan Manuel Morales. (2024). How the ‘New Right’ in Latin America differs from other emerging far‑right movements. The Conversation. Accessed 28th February 2026. https://theconversation.com/how-the-new-right-in-latin-america-differs-from-other-emerging-far-right-movements-239267.
[xiv] Alexandre Marc. (2026). Latin America at a Crossroads: a Turn to the Right? Institut Montaigne. Accessed 28th February 2026. https://www.institutmontaigne.org/en/expressions/latin-america-crossroads-turn-right.