पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के बीच लैटिन अमेरिका में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आ रहा है जिसमें अमेरिका क्यूबा को अपने नियंत्रण में लेने के लिए पहले से अधिक तत्पर नज़र आ रहा है। क्यूबा अमेरिका के हितों के लिए भू–रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। क्यूबा, जो एक द्वीपीय देश है और जिसके पास अमेरिका के खिलाफ बचाव की सीमित क्षमताएं हैं, आयात पर बहुत अधिक निर्भर है वह कई सालों से अमेरिका द्वारा समर्थिक आर्थिक नाकेबंदी से जूझ रहा है। अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय वित्त तक उसकी पहुँच को भी सीमित कर दिया है और अपने नागरिकों को क्यूबा जाने या क्यूबा में किसी प्रकार के वित्तीय लेन–देन करने पर रोक लगा दी है। संक्षेप में कहें तो अमेरिका द्वारा क्यूबा पर लगाई गई नाकेबंदी के कारण उसकी आर्थिक स्थिति पहले से खराब हो गई है। इसकी वजह से देश में बिजली का संकट पैदा हो गया है, आवश्यक वस्तुओं की किल्लत हो रही है और सरकार के प्रति लोगों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।
राष्ट्रपति ट्रंप के हालिया बयानों में क्यूबा पर ‘दोस्ताना कब्ज़े’ का जो संकेत दिया गया है वह फ्लोरिडा के पास स्थित इस द्वीपीय देश को सुरक्षित करने और लैटिन अमेरिका में अमेरिका के रणनीतिक हितों को मज़बूत बनाने के लिए संभावित अमेरिकी चालों की ओर इशारा करता है। इसका एक मतलब यह भी है कि क्यूबा– जिसने बहुत समय से चीन और रूस के साथ करीबी संबंध रखे हैं, में, अब धीरे– धीरे परिवर्तन देखने को मिल सकता है, जिसके तहत इन दोनों देशों की भूमिका समय के साथ कम होती जाएगी।
वेनेज़ुएला की घटनाओं और लैटिन अमेरिका में अपने हितों को सुरक्षित करने के लिए ट्रंप प्रशासन की कार्रवाइयों को देखते हुए, इसमें कोई हैरानी नहीं होगी यदि क्यूबा और अमेरिका के बीच कोई ऐसा समझौता हो जाए जिसके तहत अमेरिका प्रतिबंधों में ढील दे और क्यूबा की सरकार को सत्ता में बने रहने दे। इसके बदले में दोनों देशों के बीच संबंध सौहार्दपूर्ण होंगे, निजी निवेश की अनुमति मिलेगी, अर्थव्यवस्था खोली जाएगी और इसका अंतिम लक्ष्य चीन और रूस के प्रभाव को कम करना होगा। इससे क्यूबा में अमेरिका का वह अधूरा भू–रणनीतिक सपना साकार हो जाएगा जो 1959 में उसके मित्र से शत्रु बन जाने के बाद से अधूरा था।
यह लेख यह तर्क देता है कि क्यूबा में अमेरिका के रणनीतिक हित गहरे हैं और वाशिंगटन अपने हितों को सुरक्षित करने के लिए हवाना के साथ सख्त वार्ता की राह अपनाएगा– इसके लिए वह एक ऐसे लेन–देन वाले मॉडल को अपनाएगा जिसकी ट्रंप के राष्ट्रपतिकाल में उम्मीद की जा सकती है। इस लेख का आधार क्यूबा द्वारा वर्तमान आर्थिक नाकेबंदी की वजह से झेली जा रही गंभीर आर्थिक संकट की स्थिति है जिसने उस देश को 'मज़बूरी में उठाए जाने वाले कदम/ ज़ुगज़वांग) जैसी विविशतापूर्ण स्थिति में डाल दिया है।
क्यूबा में अमेरिका की दिलचस्पी
अमेरिका की क्यूबा में एक सदी से भी अधिक समय से रणनीतिक दिलचस्पी बनी हुई है और बड़ी ताकतों के बीच मुकाबले के मौजूदा दौर में यह दिलचस्पी बढ़ी ही है। असल में, यह दिलचस्पी 1959 की ऐतिहासिक दरार को पाटने की लगातार बनी रहने वाली मंशा दर्शाती है, वह समय जब शीत युद्ध के दौरान क्यूबा एक सहयोगी से बदलकर यूएसएसआर (USSR) के साथ जुड़ा कम्युनिस्ट देश बन गया था।
अमेरिका की एक के बार दूसरी बनने वाली सरकारों ने इस परिवर्तन को केवल एक वैचारिक चिंता का विषय ही नहीं बल्कि कैरिबियन क्षेत्र में रणनीतिक गहराई को बहाल करने एवं उसे अधिक सुदृढ़ बनाने की दिशा में आवश्यक कदम के रूप में देखा है। क्यूबा का महत्व उसके संसाधनों में कम बल्कि उसकी भौगोलिक स्थिति में अधिक निहित है। फ्लोरिडा के तट से सौ मील से भी कम की दूरी पर स्थित यह द्वीप अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान पर है जहाँ से मैक्सिको की खाड़ी और व्यापक पश्चिमी गोलार्ध के समुद्री मार्गों पर नज़र रखी जा सकती है। इस द्वीप पर नियंत्रण या प्रभाव होने से अमेरिका को महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों को सुरक्षित करने, क्षेत्रीय गतिविधियों पर नज़र रखने और पूरे लैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र में अपनी शक्ति का अधिक प्रभावी तरीके से प्रदर्शन करने में मदद मिलेगी।
तेज़ी से बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच जहाँ छाया युद्ध और समकक्ष प्रतिद्वंद्वियों के साथ बढ़ती होड़ गावी है, इस भू–रणनीतिक समीकरण[i] ने नई तात्कालिकता हासिल कर ली है। चीन और रूस दोनों ने सैन्य सहयोग, खुफ़िया गतिविधियों और आर्थिक साझेदारियों के माध्यम से क्यूबा में अपनी रणनीतिक पकड़ मज़बूत की है। ये कदम सीधे तौर पर अमेरिका के परंपरागत प्रभाव क्षेत्र में उसके वर्चस्व को चुनौती देते हैं। हाल के वर्षों में मॉस्को ने क्यूबा के बंदरगाहों पर परमाणु क्षमता वाली पनडुब्बियों समेत अपने नौसैनिक बेड़े को तैनात किया है, जबकि बीजिंग ने इस द्वीप पर अपनी आर्थिक और तकनीकी मौजूदगी बढ़ाई है।
चीन के साथ भविष्य में किसी टकराव की स्थिति में, विशेष रूप से यदि इसमें हिंद–प्रशांत क्षेत्र या कहीं और समुद्री युद्ध शामिल हों, वाशिंगटन यह कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता कि हवाना, चीन के अग्रिम रणनीतिक केंद्र के रूप में काम करे जो अमेरिका क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अभियानों को बाधित करने में समक्ष हो। इस द्वीप की भौगोलिक निकटता, चीन को संभावित निगरानी, रसद सहायता या यहाँ तक कि अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करने का अवसर प्रदान करती है जिससे विभिन्न मोर्चों पर अमेरिकी जवाबी कार्रवाई और भी अधिक जटिल हो सकती है।
कभी– कभी ऐसे तर्क सामने आते हैं क्यूबा के प्रति अमेरिका की नीति मुख्य रूप से संसाधनों के दोहन पर आधारित हैं। हालांकि, ऐसे दावे इस द्वीप के सीमित प्राकृतिक संसाधनों की अनदेखी करते हैं। क्यूबा के पास तेल और अन्य खनिजों के सीमित प्रमाणित भंडार हैं। यहाँ कच्चे तेल का घरेलू उत्पादन प्रतिदिन लगभग चालीस हज़ार बैरल के आस–पास होता है, जो देश की कुल आवश्यकताओं के एक–तिहाई हिस्से को भी पूरा करने के लिए अपर्याप्त है। देश का वास्तविक मूल्य भूमिगत संपदा में नहीं बल्कि उसकी भौगोलिक स्थिति में निहित है जो ऐसे युग में अपरिहार्य बनी हुई है जब प्रतिद्वंद्वी शक्तियां प्रत्यक्ष टकराव की बजाय क्रमिक रूप से पैर जमाकर अमेरिकी आधिपत्य को कमज़ोर करने की कोशिश कर रही हैं।
वर्ष 1962 के क्यूबा मिसाइल संकट[ii] की यादें अमेरिकी रणनीतिक सोच में आज भी ताज़ा हैं। उन तेरह (13) तनावपूर्ण दिनों के दौरान द्वीप पर तैनात सोवियत मिसाइलों ने अमेरिका को परमाणु विनाश से बस कुछ ही मिनटों की दूरी पर रखा था, इस घटना ने बताया कि किसी विरोधी शक्ति को क्यूबा की ज़मीन के खिलाफ निर्देशित लॉन्चपैड में बदलने की अनुमति देना कितना ख़तरनाक हो सकता है। वाशिंगटन के नीति– निर्माता इस बात पर अड़े हैं कि वे दोबारा कभी ऐसी कमज़ोर स्थिति पैदा नहीं होने देंगे। वे चीन या रूस के बढ़ते प्रभाव को उस भयानक संकट की अस्वीकार्य पुनरावृत्ति के रूप में देखते हैं।[iii] इस प्रकार, क्यूबा को पूरी तरह से अमेरिकी प्रभाव क्षेत्र में फिर से लाने का अधूरा भू–रणनीतिक स्वपन अमेरिकी नीति को लगातार आकार दे रहा है। यह ऐतिहासिक शिकायतों को क्षेत्रीय सुरक्षा से संबंधित भविष्योन्मुखी गणनाओं के साथ जोड़ता है।
क्यूबा में गंभीर स्थिति
क्यूबा एक गंभीर और बहुआयामी आर्थिक संकट में फंसा हुआ है जिसने वहाँ की जनता और सरकारी संस्थानों, दोनों की ही सहनशक्ति को कमज़ोर कर दिया है। यह स्थिति ऊर्जा के क्षेत्र में उसकी कमियों को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। क्यूबा अपनी आवश्यकता के ईंधन का बहुत ही छोटा सा हिस्सा ही उत्पादित कर पाता है, इसके बजाय अपने थर्मोइलेक्ट्रिक संयंत्रों को चलाने और बुनियादी आर्थिक गतिविधियों को जारी रखने के लिए बड़े पैमाने पर उसे आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।[iv]
घरेलू तेल उत्पादन में लगातार गिरावट आई है जिसकी वजह से देश अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के बड़े हिस्से के लिए बाहरी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर हो गया है। इस संरचनात्मक कमी को दशकों से चले आ रहे आर्थिक नाकेबंदी और घेरा बंदी ने और भी बढ़ा दिया है जिसने अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों, तकनीक एवं वित्त तक पहुँच को सीमित कर दिया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि बुनियादी ढांचे में लगातार गिरावट का सिलसिला बन गया है जहाँ बिजली उत्पादन की क्षमता सामान्य परिस्थितियों में भी मांग को पूरा करने में असमर्थ है।
बार– बार और लंबे समय तक बिजली गुल रहना अब रोज़मर्रा की आम बात बन गई है। हाल के दिनों में 10–20 घंटे तक बिजली का न रहना आम बात हो गई है, इसका असर हवाना तक भी पहुँच गया है। कई मौकों पर लाखों लोग अंधेरे में रहने को मज़बूर हुए हैं। खराब ट्रांसमिशन नेटवर्क और पुरानी हो चुकी बिजली उत्पादन इकाईया इन रुकावटों को और भी बढ़ा देती हैं जबकि स्पेयर पार्ट्स और रख–रखाव की विशेषज्ञता की कमी, जो खुद बाहरी पाबंदियों का परिणाम है, ज़रूरी मरम्मत के काम में बाधा डालती है। बिजली की इस कमी के साथ– साथ गरीबी भी बढ़ रही है।
परिवारों को भोजन को सुरक्षित रखने, दवाओं को फ्रिज़ में रखने और बुनियादी रोशनी की व्यवस्था करने में बहुत परेशानी हो रही है जबकि उद्योग और कृषि कार्य रूक–रुक कर बंद होते जा रहे हैं। ईंधन की कमी ने परिवहन और वितरण नेटवर्क को भी बाधित कर दिया है जिससे ज़रूरी वस्तुओं की किल्लत बढ़ गई है और अनौपचारिक बाज़ार एवं वस्तु– विनिमय प्रणालियाँ प्रमुखता से सामने आ रही हैं।
इसके सामाजिक और राजनीतिक परिणाम बहुत गहरे हैं। व्यापक असंतोष ने सरकार की कार्यक्षमता और वैधता पर जनता के सवालों को हवा दी है। विरोध प्रदर्शन, जो कभी–कभार हुआ करते थे, अब लगातार हो रहे हैं। सैंटियागो डी क्यूबा और दूसरे प्रांतों में 2024 में शुरू होकर 2026,[v] तक जारी रहने वाले प्रदर्शनों में हवाना में कैसरोलाज़ो (बर्तन बज़ाकर विरोध करना)[vi] जैसी कार्रवाइयां और यहाँ तक कि हिंसक घटनाएं भी देखने को मिलीं। जैसे कि बिजली कटौती और खाने– पीने की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के विरोध में निकाली गई रैलियों के दौरान मोरोन में कम्युनिस्ट पार्टी के दफ़्तर में तोड़फोड़। ये हिंसक घटनाएं केवल अलग– थलग शिकायतों को ही नहीं बल्कि सामाजिक एकता में आ रही गहरी दरार को दर्शाती है।
वेनेज़ुएला से तेल की बड़ी खेपों की अचानक आपूर्ति बंद हो जाने से, क्यूबा सरकार की अपनी स्थिति बनाए रखने की क्षमता पहले से भी कमज़ोर हो गई है।[vii] वर्षों तक, काराकास हर दिन लगभग 35,000 बैरल की आपूर्ति करता रहा है जिससे द्वीप की लगभग आधी आवश्यकताएं पूरी होती थीं और उसे महत्वपूर्ण सहारा मिलता था। वर्ष 2026 की शुरुआत में वेनेज़ुएला में हुई राजनीतिक उथल– पुथल और उसके बाद अमेरिका द्वारा उठाए गए कदमों की वजह से ये आपूर्तियाँ लगभग बंद हो गई हैं, अब तो नाममात्र की आपूर्ति ही बची है।
वैकल्पिक स्रोत– जैसे कि मैक्सिको से कम खेप आना या रूस और अल्जीरिया से कभी– कभार ही डिलीवरी मिलना– अपर्याप्त और अनियमित साबित हुए हैं। हाल की रिपोर्टिंग अवधियों में कच्चे तेल एवं रिफाइंड उत्पादों का आयात एक– तिहाई से भी अधिक कम हो गया है और कुल मिलाकर यह लगभग पैंतालीस हज़ार (45,000) बैरल प्रतिदिन के स्तर पर आ गया है।
घरेलू स्तर पर व्यवहार्य विकल्पों या महत्वपूर्ण निवारक क्षमताओं के अभाव में क्यूबा बहुत गंभीर संकट का सामना कर रहा है। आर्थिक नाकेबंदी ऋण, प्रौद्योगिकी एवं बाज़ारों तक पहुँच को सीमित करती जा रही है जबकि विश्वसनीय ईंधन आयात की कमी से व्यवस्थागत पतन का खतरा मंडरा रहा है। सरकार के पास बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने या आबादी को मुश्किलों से बचाने के लिए आवश्यक संसाधन नहीं हैं, जिससे देश की स्थिति लगातार कमज़ोर होती जा रही है। आंतरिक कमियाँ और बाहरी दबाव की वजह से ऐसी परिस्थितियां पैदा हो गई हैं जिनमें अस्तित्व ही संकटग्रस्त दिखाई दे रहा है। इसने संभावित बाहरी हस्तक्षेप अथवा आपसी सहमति से होने वाले परिवर्तन के लिए मंच तैयार कर दिया है।
दो संभावित स्थितियाँ
(क) पूर्ण आक्रमण – क्यूबा पर पूरी तरह से धावा बोलने के विकल्प को आगे बढ़ने के व्यावहारिक मार्ग के तौर पर स्पष्ट रूप से खारिज किया जा सकता है। भले ही अमेरिका के पक्ष में सैन्य और आर्थिक संतुलन अधिक हो और क्यूबा के शीत युद्ध के युग के हथियार पुराने पड़ चुके हों। क्यूबा की सेनाएं मुख्य रूप से दशकों पुराने सोवियत– डिज़ाइन वाले सिस्टम से लैस हैं, उनमें आधुनिक वायु रक्षा, नौसैनिक क्षमताएं या एकीकृत कमान संरचनाओं की कमी है, जो किसी सुदृढ़ अमेरिकी अभियान के विरुद्ध लगातार प्रतिरोध करने में सक्षम हों। फिर भी, अमेरिका के मुख्य रणीतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए इतनी ज़बरदस्त शक्ति के प्रयोग की आवश्यकता नहीं है। वेनेज़ुएला का उदाहरण, जहाँ वाशिंगटन ने पूरी तरह से हमला किए बिना ही निर्णायक प्रभाव डाला था, यह दिखाता है कि सूक्ष्म साधन भी पर्याप्त हो सकते हैं। सीधा हमला करने से न केवल अनावश्यक रूप से अमेरिकी सैनिकों की जान जाएगी बल्कि इससे विश्व भर में कड़ी निंदा भी होगी। साथ ही, ऐसे समय में जब दूसरे वैश्विक प्रतिबद्धताओं की वजह से संसाधनों पर पहले से ही दबाव है, यह अमेरिका को बहुत समय तक चलने वाले स्थिरीकरण अभियानों में उलझा सकता है। इसके अलावा मौजूदा प्रशासन ने सैन्य टकराव की बजाय नपे–तुले दबाव को स्पष्ट रूप से प्राथमिकता दी है। इस संदर्भ में, आक्रमण न केवल एक अक्षम विकल्प है, बल्कि ऐसा विकल्प भी है जिसके राजनीतिक और कूटनीतिक परिणाम तो बहुत अधिक होते हैं, लेकिन उसके मुकाबले लाभ बहुत कम मिलते हैं।
(ख) दबावों की श्रृंखला – अधिक संभावित मार्ग यह है कि अमेरिका[viii] क्यूबा की सरकार के साथ बात करे, साथ ही आर्थिक दबाव बढ़ाए और आंतरिक विरोध प्रदर्शनों[ix] का लाभ उठाकर बातचीत के लिए दबाव बनाएं। इस स्थिति में, वाशिंगटन प्रतिबंधों को बनाए रखेगा और उन्हें पहले से अधिक सख्त कर देगा,[x] ईंधन के आयात और वित्तीय प्रवाह को प्रतिबंधित करके मौजूदा समस्याओं को बढ़ाएगा एवं घरेलू अशांति को भड़काएगा। साथ– साथ चल रहे विरोध प्रदर्शन– जो पहले से ही बर्तनों को पीटकर विरोध जताने एवं स्थानीय हिंसा के रूप में सामने आ रहे हैं, बाहरी मांगों के लिए आड़ और दबाब, दोनों ही उपलब्ध कराएंगे। इसका उद्देश्य शासन को पूरी तरह से हटाना नहीं बल्कि नियंत्रित विकास होगा, जैसे कि शासन की बुनियादी संरचनाओं को बनाए रखते हुए नेतृत्व के चेहरों में बदलाव लाना। अमेरिकी निवेश के लिए अर्थव्यवस्था को खोलने, बाज़ारोन्मुख सुधारों की अनुमति देने और हवाना को धीरे–धीरे अपने चीनी और रूसी रणनीतिक साझेदारों से दूर करने के बदले में, अमेरिका चरणबद्ध तरीके से प्रतिबंधों में राहत, बुनियादी ढांचे के लिए वित्तपोषण और ऊर्जा सहायता प्रदान करेगा।
यह नज़रिया लेन–देन आधारित विचार के बहुत करीब है जिसमें वैचारिक शुद्धता की बजाय ठोस हितों को प्राथमिकता दी जाती है। जब तक क्यूबा की सरकार विरोधी गठबंधनों को सीमित करके और अमेरिका की आर्थिक पहुँच को आसान बनाकर सहयोग की भावना दिखाती रहती है तब तक वैचारिक सोच गौण हो जाती है। वेनेज़ुएला में हाल के घटनाक्रम इसका स्पष्ट उदाहरण हैं। शुरू में सत्ता परिवर्तन के पक्ष में जो बयानबाज़ी की जा रही थी वह व्यावहारिक तालमेल में बदल गई, जब कराकास ने अधिक सहयोग के संकेत दिए।[xi]
इसी तरह, क्यूबा अपने ऊर्जा क्षेत्र और बुनियादी ढांचे को फिर से खड़ा करने के लिए अमेरिका से पूंजी निवेश स्वीकार कर एक बदले हुए रूप में अपना अस्तित्व बनाए रख सकता है, जिससे सरकारी कामकाज फिर से सुचारू हो जाएगा। कूटनीतिक और आर्थिक प्रोत्साहनों के माध्यम से चीन और रूस को धीरे– धूरे बाहर कर दिया जाएगा, जिससे बिना किसी सैन्य हमले के खर्च के अमेरिका की रणनीतिक प्रधानता फिर से स्थापित हो जाएगी। यह शासन– व्यवस्था बनी रहेगी, भले ही बदले हुए स्वरूप में, जबकि अमेरिका विजय की बजाय बातचीत के माध्यम से अपनी प्रभुता स्थापित कर दीर्घकाल से चले आ रहे भू–रणनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त करेगा। जटिल क्षेत्रीय परिवेश में यह मार्ग जोखिम और लाभ के बीच सबसे बेहतर संतुलन प्रदान करता है।
यह तर्क कि क्यूबा पश्चिम एशियाई संदर्भ में ईरान जैसा ही प्रतिरोध खड़ा कर सकता है, सही नहीं लगता। जैसा कि बताया गया है, अमेरिका द्वारा क्यूबा पर आक्रमण करने की संभावना कम ही है। इस क्षेत्र में ईरान के पास रणनीतिक गहराई है। उसकी रक्षा प्रणालियाँ बहुत मज़बूत हैं। वह किसी भी समय होने वाले युद्ध के लिए पहले से ही तैयार था और उसकी असममित युद्ध– नीति के परिणाम भी सकारात्मक रहे हैं। इसके अलावा, ईरान के पास ‘कच्छुए’ की तरह डटे रहने और युद्ध करने के संसाधन हैं और देश के विशाल भौगोलिक आकार के बारे में तो क्या ही कहें।
संक्षेप में, ईरान के पास ऐसा प्रभाव है जो क्षेत्रीय और वैश्विक, दोनों ही स्तरों पर महत्वपूर्ण है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य को अवरुद्ध करने की ईरान की कार्रवाई इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण है कि कैसे उसने अपनी भू–राजनीतिक स्थिति का लाभ उठाकर पूरी दुनिया को घुटनों पर ला दिया है। इसके उलट, क्यूबा के पास न तो रणनीतिक गहराई है,[xii] और न ही इतना भौगोलिक क्षेत्र कि वह कम– से– कम लंबे समय तक चलने वाला गुरिल्ला युद्ध लड़ सके। लैटिन अमेरिकी देश अभी तक क्यूबा के पक्ष में मज़बूती से सामने नहीं आए हैं ताकि वे अमेरिका को नाराज़ न करें। यह ईंधन के आयात पर निर्भर है, इसके पास कोई मजबूत निवारक शक्ति नहीं है, और यह अमेरिका का मुकाबला करने के लिए अपनी रणनीतिक स्थिति का लाभ उठाने में असमर्थ है। यह बात इसलिए भी विडंबनापूर्ण है क्योंकि इससे पहले क्यूबा 1961 में हुए 'बे ऑफ पिग्स' हमले से बच निकला था जिसकी योजना और क्रियान्वयन बहुत कमज़ोर था।
निष्कर्ष
क्यूबा में अमेरिका के गहरे रणनीतिक हितों को देखते हुए और साथ ही वहाँ के विपरीत वैचारिक आयामों एवं चीन और रूस से क्यूबा की निकटता पर विचार करते हुए, यह स्पष्ट है कि अमेरिका अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हर संभव विकल्प अपनाएगा। इन लक्ष्यों में क्यूबा को सुरक्षित करना और उसे उन बाहरी प्रभावों से मुक्त रखना शामिल है जो अमेरिका के हितों के प्रतिकूल हैं और वहाँ के वर्तमान शासन को जारी रहने देने की बजाय वेनेज़ुएला में घटी घटनाओं के अनुरूप ही परिणाम हासिल करना है।
यह संभव है कि अमेरिका पूरी तरह से हमला करने की बजाय, जिससे मामले और भी उलझ सकते हैं, सख्त वार्ता का रास्ता चुने जैसा कि वह क्यूबा सरकार की सीमाओं को निर्धारित करने के मामले में पहले से ही कर रहा है। क्यूबा के अधिकारियों के लिए किसी भी कारगर बचाव साधन एवं सहयोगियों की कमी, साथ ही नाकेबंदी को तोड़ने में मिली नाकामी का नतीजा यह होगा कि सरकार 'रोमांटिक शहीद' बनने की बजाय अपनी सत्ता को बचाए रखने के बदले अमेरिका की शर्तों को मानने का रास्ता चुनेगी और विडंबना यह है कि ऐसा करके वह अंततः अपने सबसे बड़े शत्रु के साथ ही समझौता कर लेगी।
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*डॉ. अर्नब चक्रवर्ती, शोधकर्ता, आईसीडब्ल्यूए।
अस्वीकरण: व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण
[i] Agustin Maciel Padilla. (1996). Los Intereses Estratégicos de Estados Unidos en el Golfo de Mexico. Foro Internacional, 36(4), ciudad de Mexico, 702-730. https://forointernacional.colmex.mx/index.php/fi/article/view/1438?source=/index.php/fi/article/view/1438.
[ii] Ricardo Pradella Morilla. (2024). La crisis de los misiles de Cuba. Ejercitos. Accessed 17th March 2026. https://www.revistaejercitos.com/articulos/la-crisis-de-los-misiles-de-cuba/.
[iii] यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि ट्रंप प्रशासन ने जुड़ाव का जो वर्तमान रास्ता अपनाया है वह बराक ओबामा के पूर्व प्रशासन के तरीके से बिल्कुल अलग है। ओबामा प्रशासन ने क्यूबा के साथ संबंध बेहतर किए थे, पाबंदियों में ढील दी थी, राजनयिक संबंध बहाल किए थे और क्यूबा को आतंकवाद प्रायोजित करने वाले देशों की सूची से भी निकाल दिया था।
[iv] Agence Françoise de Development. (2026). Cuba: una sucesión de crisis económicas y financieras en medio del debilitamiento del modelo cubano. Accessed March 17, 2026. https://www.afd.fr/en/resources/cuba-succession-economic-and-financial-crises-amid-weakening-cuban-model.
[v] Infobae. (2026). Segunda noche consecutiva de protestas contra la dictadura cubana: los gritos de “libertad” se extienden en plena crisis. Accessed March 17, 2026. https://www.infobae.com/america/america-latina/2026/03/08/segunda-noche-consecutiva-de-protestas-contra-la-dictadura-cubana-los-gritos-de-libertad-se-extienden-en-plena-crisis/.
[vi] लैटिन अमेरिका में विरोध का बहुत ही सामान्य तरीका जिसमें लोग एक जगह इकट्ठा होकर बर्तनों और पतीलों को पीटते हैं। यह भूख और गरीबी का संकेत होता है और इसके माध्यम से लोग ज़रूरी चीज़ों की कमी के खिलाफ विरोध प्रदर्शित करते हैं।
[vii] El Financiero. (2026). Venezuela deja de ‘surtir’ a Cuba: ¿Cuántos barriles de petróleo mandaba Maduro a la isla al día? Accessed March 17, 2026. https://www.elfinanciero.com.mx/mundo/2026/01/28/venezuela-deja-de-surtir-a-cuba-cuantos-barriles-de-petroleo-mandaba-maduro-a-la-isla-al-dia/.
[viii] ऐसी ख़बरें हैं कि अमेरिका और क्यूबा के अधिकारी इस गतिरोध को दूर करने के लिए बातचीत कर रहे हैं। इसमें अमेरिका की यह मांग है कि मौजूदा राष्ट्रपति मिगुएल डियाज़ कैनेल अपने पद से हट जाएं, लेकिन क्यूबा सरकार का मूल ढांचा बना रहे। अमेरिका ने यह भी मांग की है कि क्यूबा अपनी अर्थव्यवस्था को निजी अमेरिकी निवेश के लिए खोल दे। यह भी संभव है कि अमेरिका इस बात पर और ज़ोर दे कि मौजूदा नेतृत्व की जगह राउल गुइलेर्मो रोड्रिगेज़ कास्त्रो को लाया जाए, जो राउल कास्त्रो के पोते हैं और उन्हें एक अधिक सौहार्दपूर्ण विकल्प के रूप में देखे। इससे न केवल कास्त्रो परिवार की वंशावली बनी रहेगी बल्कि अमेरिका के हितों की भी पूर्ति होगी।
[ix] Maïlys Khider & Jesús López. (2025). Las caras de la oposición cubana. Le Monde Diplomatique. Accessed March 16, 2026. https://www.eldiplo.org/314-un-gobierno-de-palos-e-insultos/las-caras-de-la-oposicion-cubana/.
[x] Naciones Unidas Derechos Humanos. (2025). La aplicación y reciente endurecimiento de las sanciones de EE. UU. profundiza las dificultades para la población cubana: Relatora Especial. Accessed March 16, 2026. https://www.ohchr.org/es/press-releases/2025/11/enforcement-and-recent-strengthening-us-sanctions-deepen-hardships-cuban.
[xi] Swissinfo. (2026). Delcy Rodríguez dice que Venezuela quiere construir relaciones a largo plazo con EE.UU. Accessed March 17, 2026. https://www.swissinfo.ch/spa/delcy-rodr%C3%ADguez-dice-que-venezuela-quiere-construir-relaciones-a-%22largo-plazo%22-con-ee.uu./91069024.
[xii] क्यूबा की सैन्य शक्ति सीमित है। उसके हथियार शीत– युद्ध के दौर के हैं, जैसे टी-55 और टी-62 टैंक, कुछ मिग लड़ाकू विमान, ZPU और ZSU एंटी–एयरक्राफ्र्ट बंदूकें, IGLA MANPADs, और ट्रक पर लगे रॉकेट। भौगोलिक रूप से अमेरिका के करूब होने के बावजूद उसके पास अमेरिका पर हमला करने की क्षमता नहीं है, जो शायद मज़बूत निवारक के रूप में काम कर सकती थी।