सारांश: हाल ही में साउंडिंग रॉकेट के लॉन्च के साथ गुजरात भारत के तेज़ी से बढ़ते अंतरिक्ष क्षेत्र में कदम बढ़ाने वाला पहला राज्य बन गया है। यह लेख भारत के केंद्रीय अंतरिक्ष मॉडल से बढ़कर संघीय अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की ओर बदलाव को दर्शाता है, जिसमें राज्यों की बढ़ती भूमिका पर प्रकाश डाला गया है और एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया गया है कि गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटत, तेलंगाना और दूसरे राज्य अंतरिक्ष– तकनीक नीतियां विकसित क्यों नहीं कर रहे हैं?
परिचय:
कई वर्षों से, अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत की कहानी राष्ट्रीय गौरव, ठोस वैज्ञानिक कार्यों और आत्मनिर्भर बनने की चाहत के बारे में रही है। भारत ने सार्वजनिक, मौसम और संचार उपग्रहों पर विकास– केंद्रित नज़रिया अपनाते हुए स्वयं को अंतरिक्ष शक्ति के रूप में स्थापित किया है। हालाँकि बीते कुछ वर्षों में इसमें बहुत परिवर्तन आने लगा है, और भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र संस्थागत दायरे से बाहर निकलर विस्तार कर रहा है। IN-SPACe की स्थापना और राज्यों द्वारा प्रायोजित विभिन्न अंतरिक्ष नीतियों ने अधिक व्यवस्थित और सुगठित अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को संभव बनाना शुरू कर दिया है।
पूर्व में, अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से केंद्र सरकार द्वारा संचालित होती थी। अब यह राज्यों और निजी क्षेत्र के भागीदारों की व्यापक भागीदारी के लिए खुल रही है। यह प्रक्रिया भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए विकास के नए मॉडल का संकेत देती है जिसमें सहयोग पर और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से प्रयोग एवं नवाचार पर अधिक ज़ोर दिया गया है।
भारत के अंतरिक्ष नज़रिए में बदलाव
अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून के अनुसार बाहरी अंतरिक्ष का उपयोग केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जाना अनिवार्य है। राज्यों और निजी संस्थाओं की बढ़ती भागीदारी से भारत की अंतरराष्ट्रीय कानूनी उत्तरदायित्व में कोई बदलाव नहीं आता है जो अभी भी केंद्र सरकार के पास ही है। हालाँकि, अंतरराष्ट्रीय संधियों और अंतरिक्ष कूटनीति के लिए केंद्र सरकार ही एकमात्र प्राधिकारी बनी हुई है, फिर भी राज्य– प्रायोजित अंतरिक्ष गतिविधियों के विस्तार से उन अंतरराष्ट्रीय पक्षों की संख्या बढ़ रही है जो भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र के साथ जुड़े हुए हैं।
वर्ष 1969 में इसरो (ISRO) की स्थापना के साथ ही, इसका मुख्य उद्देश्य देश के विकास के लिए अंतरिक्ष तकनीक का प्रयोग करना था। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के आरंभिक कुछ दशक व्यावसायिक महत्वाकांक्षाओं की बजाय, जन– कल्याण के प्रबल उद्देश्य से प्रेरित थे। आखिरकार, भारत ने मार्स ऑर्बिटर मिशन, चंद्रायान– 3 और अन्य दूसरे मिशनों की सफलता के साथ यह साबित कर दिया कि वह वैश्विक लागत के छोटे से हिस्से में ही जटिल मिशनों को अंजाम देने में सक्षम है।
जैसे– जैसे वैश्विक अंतरिक्ष गतिविधियाँ व्यावसायिक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में विकसित हुईं, भारत का परंपरागत मॉडल अपर्याप्त साबित होने लगा। स्पेसएक्स (SpaceX), रॉकेट लैब (Rocket Lab) और ब्लू ओरिजिन (Blue Origin) जैसे प्राइवेट क्षेत्र के खिलाड़ियों के सामने आने से यह साबित हो गया कि अधिक खुली व्यवस्थाओं में ही नवाचार और दक्षता को बढ़ावा मिलता है। भारत सरकार ने इस बदलाव को स्वीकार करते हुए देश के अंतरिक्ष क्षेत्र को उदार बनाने की दिशा में प्रक्रिया शुरू की। इस दिशा में उल्लेखनीय सुधार 2020 में IN-SPACe की स्थापना थी, यह अंतरिक्ष विभाग के अंतर्गत अपनी तरह की पहली एजेंसी है, जो सभी अंतरिक्ष गतिविधियों में निजी क्षेत्र की भागीदारी के विनियमन, संवर्धन और प्राधिकरण के लिए उत्तरदायी है।[i]
IN-SPACe की स्थापना भारत के अंतरिक्ष प्रशासन के क्षेत्र में मील का पत्थर थी। यह केवल प्रशासनिक बदलाव ही नहीं था, बल्कि यह शासन के पूरे ढांचे में किया गया एक परिवर्तन था। IN-SPACe नियंत्रित विकेंद्रीकरण का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें आर्थिक भागीदारी का दायित्व सौंपा जाता है जबकि नियामक अधिकार और अंतरराष्ट्रीय दायित्व केंद्र के पास ही रहते हैं। IN-SPACe एक सूत्रधार और अंतरिक्ष विभाग के अंतर्गत आने वाली अधिकृत संस्था है जो इसरो (ISRO) और निजी क्षेत्र के बीच सेतु का काम करती है।
हाल ही में, IN-SPACe ने गुजरात, तमिलनाडु और कर्नाटक की सरकारों के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं।[ii] यह भारत भर में विशेष अंतरिक्ष विनिर्माण कल्स्टर बनाने के लिए अन्य राज्य सरकारों के साथ भी साझेदारी कर रहा है जिसका मुख्य उद्देश्य स्पेस–ग्रेड कंपोनेंट्स के निर्माण के लिए मज़बूत पारितंत्र विकसित करना है।
राज्य अंतरिक्ष क्षेत्र में कदम क्यों रख रहे हैं?
राज्यों को सरोकार रॉकेट लॉन्च या अंतरराष्ट्रीय संधियों के नियमन से नहीं है। ये विषय तो पूरी तरह से केंद्र सरकार और उसकी अंतरिक्ष एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इसकी बजाय, राज्यों का मुख्य ज़ोर औद्योगिक विकास, स्थानीय रोज़गार के अवसर पैदा करने और अंतरिक्ष संबंधी उद्योगों में निवेश करने पर है। जैसे– जैसे अंतरिक्ष तकनीकें विनिर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, आईटी और डेटा एनालिटिक्स जैसी दूसरी तकनीकों के साथ अधिक गहराई से जुड़ती जा रही हैं, राज्य सरकारें भी स्थानीय स्तर पर अंतरिक्ष से संबंधित पारितंत्र को विकसित करने के लाभ को समझने लगी हैं।
भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में संघीय परिवर्तन लाने वाले अवसर और आवश्यकताएं दो प्रकार की हैं। एक तरफ, राष्ट्रीय सुधारों से नए खिलाड़ि. के लिए “जगह” बनी है। दूसरी तरफ, राज्य स्तर पर यह समझ विकसित हुई है कि 21वीं सदी के वर्तमान दौर में, आर्थिक विकास और तरक्की अधिक कीमत वाली, हाई–टेक उद्योग के रूप में सामने आएगी– विशेषरूप से उन उद्योगों में जो अंतरिक्ष तकनीक के साथ तालमेल में काम करती हैं और एक– दूसरे से जुड़ी हैं, जैसे कि एयरोस्पेस, माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स और एआई (AI)। राज्य सरकारों के लिए, अंतरिक्ष केवल वैज्ञानिक प्रयास ही नहीं, बल्कि औद्योगिक विकास का एक ऐसा अवसर है जो निवेश आकर्षित कर सकता है, रोज़गार पैदा कर सकता है और नवाचार को बढ़ावा दे सकता है।
इसके अलावा, भारत के राज्य सैटेलाइट–आधारित सेवाओं के लाभ को भी समझते हैं। सैटेलाइट डेटा कृषि की सटीकता, आपदा प्रबंधन, पर्यावरण की निगरानी, शहरी नियोजन आदि जैसे सार्वजनिक सेवाओं में क्रांति ला रहे हैं। राज्य सैटेलाइट डेटा का प्रयोग कर और विश्वविद्यालयों, स्टार्ट–अप्स एवं शोध संस्थानों के बीच सहयोग का माहौल बनाकर स्वयं को बेहतर सार्वजनिक सेवाएं देने के लिए सशक्त बना सकते हैं। आर्थिक विकास और प्रगति का यह मेल ही गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों द्वारा अंतरिक्ष नीतियों को अपनाने का आधार है।
गुजरात
गुजरात ने आधिकारिक तौर पर 2025–30 के लिए एक स्पेसटेक नीति (SpaceTech policy) घोषित की है और ऐसा करने वाला यह भारत का पहला राज्य बन गया है।[iii] यह एक प्रतीकात्मक और रणनीतिक कदम था क्योंकि गुजरात में ही अहमदाबाद में IN-SPACe का मुख्याल और इसरो का स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर (SAC) स्थित है। राज्य को यह एहसास हो गया है कि वह अंतरिक्ष निर्माण, सैटेलाइट के पुर्जों के उत्पादन और उससे जुड़ी सेवाओं के लिए औद्योगिक पारितंत्र तैयार कर सकता है। जैसा कि उम्मीद थी, इस नीतिगत ढांचे की वजह से कई प्रकार की पहलें शुरू हुई हैं। हाल ही में, मार्च 2026 में, अहमदाबाद के स्टार्टअप ने राज्य के लिए साउंडिंग रॉकेट लॉन्च करने वाली पहली कंपनी बनने का गौरव हासिल किया, इस रॉकेट ने प्रोपल्शन, एवियोनिक्स, रिकवरी और मौसम संबंधी डेटा संग्रह जैसी कई प्रमुख प्रणालियों का परीक्षण किया।
इस रॉकेट परीक्षण के लिए चुनी गई जगह धोलेरा के बावलियारी के पास है और यह रॉकेट लगभग 3 किलोमीट की ऊँचाई तक पहुँचा। गुजरात की स्पेस– टेक (Space-Tech) नीति भारत में अपनी तरह की पहली नीति है और अधिकारियों का कहना है कि यह स्वदेशी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने का काम करेगी।[iv]
गुजरात की अंतरिक्ष नीति का उद्देश्य एक ऐसा अंतरिक्ष औद्योगिक पारितंत्र तैयार करना है जिसमें विनिर्माण और सेवाओं का पूरा चक्र शामिल हो। राज्य अवचंरना विकसित करके, वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान कर और अन्य सुविधाएं लागू कर निजी निवेश आकर्षित करना चाहता है। यह विशिष्ट समूहों और औद्योगिक बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देता है जहाँ कंपनियां उपग्रहों, प्रक्षेपण यान के घटकों और संबंधित तकनीकों को डिज़ाइन, प्रोटोटाइप और निर्मित कर सकती हैं। साथ ही यह उद्योग, अनुसंधान और शिक्षा जगत के बीच सहयोग को भी बढ़ावा देता है।
तमिलनाडु
वर्ष 2024 में पेश की गई तमिलनाडु की अंतरिक्ष औद्योगिक नीति देश में राज्य स्तर पर सबसे व्यापक और दूरदर्शी प्रस्तावों में से एक है। राज्य सरकार, राज्य में मौजूद इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी इकोसिस्टम के साथ– साथ ऑटोमोटिव विनिर्माण पारितंत्र और बड़ी संख्या में इंजीनियरिंग कॉलेजों की मौजूदगी को अच्छी तरह समझती है।[v] इस नीति का मुख्य उद्देश्य किसी काम की शुरुआत बिल्कुल शुरुआत से करना नहीं है बल्कि राज्य में पहले से मौजूद उन उद्योगों की पहचान करना है जिन्हें अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के समावेश से और अधिक उन्नत बनाया जा सके और इस प्रकार उपग्रह निर्माण, प्रक्षेपण यानों के लिए कलपुर्जों व आपूर्ति श्रृंखलाओं एवं डेटा एनालिटिक्स से संबंधित उद्योगों का विकास किया जा सके।
इस नीति में कुछ चुने हुए ज़िलों (संभवतः चेन्नई, होसुर और कोयंबटूर) में स्पेस पार्क बनाने, टेस्टिंग और इंटीग्रेशन की सुविधाएं देने, स्टार्ट– अप इनक्यूबेशन सुविधाएं और वेंचर फंडिंग शुरू करने एवं कुछ बड़े शिक्षण संस्थानों जैसे आईआईटी मद्रास और अन्ना विश्वविद्यालय को चुनने की भी बात कही गई है ताकि वे अंतरिक्ष उद्योग के लिए कार्यबल तैयार करने में सरकार के साथ मिलकर काम कर सकें। यह नीति इस बात पर भी ज़ोर देती है कि सरकार को अधिक असरदार शासन के लिए सैटेलाइट डेटा का प्रयोग करना चाहिए, जिसमें खेती की पैदावार की निगरानी और शहरी फैलाव व तटीय इलाकों पर नियंत्रण शामिल है।[vi]
तमिलनाडु की नीति औद्योगिक और विकासात्मक अनुप्रयोगों के साथ एकीकरण को दर्शाती है जिसमें इस बात की स्पष्ट समझ है कि ये दोनों राज्य को आर्थिक और सामाजिक रूप से कैसे लाभ पहुँचा सकते हैं। यह राज्य को अनुसंधान, डेटा–आधारित शासन और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के क्षेत्र में मज़बूत दावेदार बनने में सक्षम बनाती है और साथ ही भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की केंद्र सरकार की पहलों का भी समर्थन करती है।
कर्नाटक
कर्नाटक को भारत की “अंतरिक्ष राजधानी/स्पेस कैपिटल” के रूप में जाना जाता है। बेंगलुरु में इसरो (ISRO) का मुख्यालय और इसका मुख्य शोध केंद्र है। साथ ही यहाँ एयरोस्पेस और डिफेंस कंपनियों का बड़ा समूह बी है। बीते एक दशक में, इस शहर ने कई उभरती हुई स्पेस कंपनियों को भी स्थान दिया है जैसे कि बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस (Bellatrix Aerospace) जो छोटे सैटेलाइट और लॉन्च सिस्टम के लिए नई टेक्नोलॉजी पर काम कर रही है।
इसी संदर्भ में, कर्नाटक अपनी पहली राज्य अंतरिक्ष नीति (2024-29)[vii] तैयार कर रहा है जिसमें भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में सबसे अधिक नवाचार करने वाले राज्य के रूप में अपनी स्थिति को मज़बूत करने की क्षमता है। इस नई नीति का उद्देश्य अनुसंधान और विकास, सार्वजनिक– निजी भागीदारी (पीपीपी) पारितंत्र और स्टार्ट– अप्स के लिए अनुकूल माहौल की आवश्यकता पर ज़ोर देना है। इस नीति का लक्ष्य भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में लगभग 50 प्रतिशत और वैश्विक अंतरिक्ष बाज़ार में लगभग 5 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करना है जो कर्नाटक को स्वयं को प्रमुख वैश्विक अंतरिक्ष केंद्र के रूप में स्थापित करने की महत्वाकांक्षा को दर्शाता है।[viii]
कर्नाटक की नीति, व्यावसायीकरण के इस नए दौर में, किसी भी राज्य के लिए अपनी ऐतिहासिक या भौगोलिक शक्तियों के आधार पर विकास करने का बेहतरीन मॉडल प्रस्तुत करती है। इसरो (ISRO) के साथ प्रतिस्पर्धा करने की बजाय, यह राज्य निजी कंपनियों और शैक्षणिक संस्थानों को उसी पारितंत्र में नवाचार करने में सक्षम बनाकर, इसरो का पूरक बनने का प्रयास कर रहा है। गुजरात, तमिलनाडु और कर्नाटक के अलावा तेलंगाना[ix], आंध्र प्रदेश[x] और महाराष्ट्र[xi] जैसे दूसरे राज्य भी अंतरिक्ष से जुड़ी पहलों पर काम करना शुरु कर चुके हैं। हैदराबाद में अपनी स्थापित जियोस्पेशल इंडस्ट्री के साथ तेलंगाना विनिर्माण की बजाय डेटा एनालिटिक्स और एप्लीकेशंस पर ध्यान दे रहा है।
आंध्र प्रदेश जहाँ श्रीहरिकोटा में सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र स्थित है, में, लॉन्च सहायता सेवाएं और लॉजिस्टिक्स विकसित करने की क्षमता है। ये राज्य भू–स्थानिक और ड्रोन नीतियां भी बना रहा है जो अंतरिक्ष–आधारित अनुप्रयोगों के साथ बहुत हद तक मेल खाती हैं।
भारत का राज्य–स्तरीय अंतरिक्ष नीतियों का प्रयोद अंतरिक्ष क्षेत्र में अग्रणी दूसरे प्रमुख देशों से बिल्कुल अलग है। संयुक्त राज्य अमेरिका में जहाँ फ्लोरिडा, टेक्सास और कैलिफ़ोर्निया जैसे राज्य लॉन्च साइटों और एयरोस्पेस कंपनियों को अपने यहाँ स्थापित करने के लिए आपस में होड़ करते हैं, वहीं अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्वों और रणनीतिक दिशा, नासा (NASA) एवं फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन जैसी एजेंसियों के माध्यम से संघीय स्तर पर पूरी तरह से समन्वित रहती हैं। चीन ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम के रणनीतिक और सैन्य पहलुओं पर मज़बूत केंद्रीय नियंत्रण बनाए रखते हुए भी अपने व्यावसायिक अंतरिक्ष क्षेत्र में उप– राष्ट्रीय पहलों को अधिक से अधिक बढ़ावा दिया है जिसके तहत बीजिंग, शंघाई और शैंडोंग जैसे शहरों ने अपने स्वयं के अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए कार्य योजनाएं जारी की हैं।
हालाँकि, यह प्रांतीय गतिविधि राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अधीन ही रहती है और ऐसे शासन–ढांचे में काम करती है जिसे किसी एकीकृत नागरिक अंतरिक्ष कानून की बजाय पार्टी और सैन्य माध्यमों ने अधिक आकार दिया है। भारत एक विशिष्ट संस्थागत मध्य–मार्ग अपनाता है। यह औद्योगिक विकास में उप–राष्ट्रीय पहलों की अनुमति देता है, लेकिन साथ ही नियमन, कूटनीति और दायित्व पर अपना केंद्रीय नियंत्रण भी बनाए रखता है। यह हाइब्रिड मॉडल शासन के प्रति भारत के व्यापक नज़रिए को दर्शाता है और यह उन अन्य संघीय या विकासशील देशों के लिए वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत कर सकता है जो अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को छोड़े बिना वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में अपनी उपस्थिति का विस्तार करना चाहते हैं।
संघीयकरण से भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम और अर्थव्यवस्था को कैसे लाभ होता है?
राज्यों की भागीदारी केवल प्रशासनिक विविधता नहीं है बल्कि उससे कहीं अधिक है। यह एक संरचनात्मक विकास है जिससे भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम और अर्थव्यवस्था को कई प्रकार से लाभ होता है। सबसे पहला, यह औद्योगिक आधार का विस्तार करता है। जब राज्य विनिर्माण, कलपुर्जों के उत्पादन और ज़मीनी बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देते हैं तो वे उन आपूर्ति श्रृंखलाओं के निर्माण में मदद करते हैं जिनकी बढ़ती हुई अंतरिक्ष उद्योग को आवश्यकता होती है। इससे आयात पर भारत की निर्भरता कम होती है और घरेलू स्तर पर मूल्य संवर्धन होता है।
दूसरा है नवाचार को बढ़ावा देना। बड़े उद्यमों की तुलना में छोटे और फुर्तीले स्टार्टअप और कंपनियाँ अक्सर ज्यादा नए और रचनात्मक विचार विकसित करने में अधिक सक्षम होती हैं। स्थानीय इक्यूबेशन और फंडिंग पारितंत्र को बढ़ावा देकर, संघीय राज्य प्रोपल्शन, सैटेलाइट डिज़ाइन या पृथ्वी–अवलोकन विश्लेषण जैसे विशेष क्षेत्रों में संस्थाएं तैयार करने में सक्षम होते हैं। नवाचारकर्ता का यह पारितंत्र इसरो (ISRO) के शोध और राष्ट्रीय मिशनों को मज़बूती देता है।
तीसरा लाभ है घरेलू अंतरिक्ष सेवाओं का अधिक बेहतर इस्तेमाल। अपनी योजना, कृषि और आपदा प्रबंधन में सैटेलाइट डेटा का व्यापक पैमाने पर प्रयोग करके राज्य सरकारें अंतरिक्ष अनुप्रयोगों और सेवाओं के लिए लगातार मांग पैदा करती हैं। इससे अंतरिक्ष कंपनियों के बाज़ार की स्थिरता बनी रहती है और बाज़ार में और अधिक निवेश आता है।
चौथा, संघीयकरण क्षेत्रीय समानता और समावेशिता को बढ़ावा देता है। भारत के हाई–टेक उद्योग ऐतिहासिक रूप से कुछ ही शहरों में स्थिर रहे हैं। कई राज्यों में अंतरिक्ष–औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार से यह सुनिश्चित होगा कि तकनीकी प्रगति और रोज़गार के अवसर बड़ी आबादी तक पहुँच सकें।
आखिर में, इन घटनाक्रमों का मिला–जुला प्रभाव हमारी सहन–क्षमता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगा। विकेंद्रीकृत और बहु–हितधारक पारितंत्र में रुकावटों की संभावना कम होती है और यह तेज़ी से और बड़े पैमाने पर विस्तार कर सकता है। इससे भारत वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में अधिक ठोस तरीके से शामिल होने की स्थिति में आ जाता है– न केवल लॉन्च सेवा प्रदाता के रूप में, बल्कि एक संपूर्ण अंतरिक्ष राष्ट्र के रूप में।
संघीय अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की चुनौतियाँ
हालाँकि भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के संघीयकरण में बहुत संभावनाएं हैं लेकिन सामने मौजूद चुनौतियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। चूँकि कई राज्य–स्तरीय अंतरिक्ष अर्थव्यवस्थाएं अपनी–अपनी नीतियां बना रही हैं इसलिए इस बात की चिंता है कि कहीं नीतियों में दोहराव न हो जाए, एक ही निवेश के लिए आपस में होड़ न मच जाए और नियामक स्तर पर टकराव न पैदा हो जाए। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से नवीन प्रगति को बढ़ावा मिल सकता है। हालाँकि, प्रतिस्पर्धा में अत्यधिक बिखराव उपलब्ध संसाधनों को कमज़ोर कर सकता है और निवेशकों के लिए भ्रम की स्थिति पैदा कर सकता है।
संसाधनों की कमी एक महत्वपूर्ण और न टाली जा सकने वाली समस्या है। जब सैटेलाइट असेंबली और ग्राउंड कंट्रोल के विकास की बात आती है तो इसकी अवसंरचना के लिए बहुत अधिक पैसों की आवश्यकता होती है और इसके विकास के लिए उच्च स्तर की विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। इन कारकों का यह भी अर्थ है कि सभी राज्य इन उद्देश्यों के विकास में मदद के लिए ज़रूरी वित्तीय और तकनीकी साधन हासिल नहीं कर पाएंगे। इसके अलावा, एयरोस्पेस इंजीनियरिंग, मटीरियल साइंस और सैटेलाइट ऑपरेशंस के क्षेत्रों में कौशल विकास की कमी है जिससे क्षेत्रीय पारितंत्र का विकास और उनके विकास की संभावनाएं और भी सीमित हो जाती हैं।
इसके अलावा, वैश्विक प्रतिस्पर्धा के संबंध में चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं। जो भारतीय राज्य वैश्विक कंपनियों को आकर्षित करना चाहते हैं और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं का हिस्सा बनना चाहते हैं, उन्हें गुणवत्ता नियंत्रण के कई उपायों को पूरा करना होगा और बौद्धिक संपदा की सुरक्षा के लिए प्रभावी प्रणाली बनानी होगी। इनके अभाव में, संघीकरण की संभावनाएं अधूरी ही रह सकती हैं।
भविष्य की कार्ययोजना
सबसे कम लागत पर उपलब्ध भारतीय इंजीनियरिंग और साथ ही बड़े एवं तेज़ी से विकास करते घरेलू बाज़ार एवं कुशल कर्मियों की उपलब्धता की वजह से अंतरिक्ष क्षेत्र में अवसर बहुत अधिक हैं। इसके अलावा, राज्यों की भागीदारी स्थानीय विशेषज्ञता के माध्यम से लाभ को और बढ़ा देती है। जैसे, भारत में हम एक पूरी मूल्य श्रृंखला प्रणाली बना सकते हैं जिसमें गुजरात विनिर्माण पर, तमिलनाडु डेटा एनालिटिक्स और इलेक्ट्रॉनिक्स पर और कर्नाटक नवाचार एवं शोध और विकास पर ध्यान केंद्रित करे जबकि तेलंगाना भू–विशिष्ट सेवाओं में अग्रणी भूमिका निभा सकता है।
भारत में संघीय अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की सफलता सुनिश्चित करने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच पर्याप्त तालमेल की आवश्यकता है। अधिकारियों के लिए एक सुझाव यह हो सकता है कि वे एक ऐसे समन्वित ढांचे को औपचारिक रूप दें जिसमें राज्यों के साथ–साथ इसरो (ISRO) इन–स्पेस (IN-SPACe), अंतरिक्ष विभाग और राज्य सरकार के प्रतिनिधि भी शामिल हों। इससे सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों के आदान–प्रदान में आसानी होगी, समन्वय को प्रोत्साहन मिलेगा और यह सुनिश्चित होगा कि राज्यों की पहलें राष्ट्रीय पहलों के साथ प्रतिस्पर्धा करने की बजाय उनकी पूरक बनें।
कार्यों का स्पष्ट बंटवारा करना आवश्यक होगा। केंद्र सरकार नियमों, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और मिशन की दिशा का ध्यान रखेगी जबकि राज्य उद्योग, प्रशिक्षण, एकीकृत शासन एवं अंतरिक्ष डेटा को बढ़ावा देंगे। राज्यों की अंतरिक्ष नीतियों में एकरूपता ऐसी नीतियों के नवाचार में मदद करेगी जो अलग–अलग राज्यों की आवश्यकताओँ को पूरा करने के साथ–साथ राज्य नीतियों के विकास को भी बढ़ावा दें।
राज्यों की टेस्टिंग, इंटीग्रेशन और दूसरे सैटेलाइट ग्राउंड कंट्रोल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बनी सुविधाओँ का विस्तार करना भी उतना ही ज़रूरी है जिन्हें स्टार्ट–अप और दूसरी कंपनियाँ आपस में साझा कर सकें। हर पहल का मुख्य उद्देश्य संवहनीयता होना चाहिए। राज्यों को केवल सब्सिडी और टैक्स में छूट देने से आगे बढ़कर असल माँग और बाज़ार पर आधारित पारितंत्र बनाना चाहिए। हर पहल में संवहनीयता ही मार्गदर्शक होनी चाहिए। केवल सब्सिडी या कर में छूट पर निर्भर रहने की बजाय, राज्यों को ऐसे पारितंत्र बनाने की आवश्यकता है जो असल बाज़ार की मांग से चलते हों। उद्योगों को निर्यात के लिए डिज़ाइन करने, वैश्विक मूल्य श्रृंखला में हिस्सा लेने और गुणवत्ता मानक बनाए रखने के लिए बढ़ावा देने से, लंबे समय तक टिके रहने में मदद मिलेगी। पारदर्शिता, व्यापार करने में आसानी और बौद्धिक संपदा की मज़बूत सुरक्षा भी भारतीय राज्यों को निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक बनाएगी।
आखिर में, एक सांस्कृतिक परिवर्तन की आवश्यकता है जिसमें सहयोग पर ज़ोर दिया जाए। भारत का अंतरिक्ष संघीकरण इस बात पर निर्भर करता है कि क्या केंद्रीय एजेंसियां राज्य सरकारें, उद्योग, शिक्षाविद, स्टार्टअप और नए बिज़नेस एक–दूसरे के प्रतिद्वंद्वी के बजाय साझेदार के रूप में देख और मान पाते हैं। इसरो (ISRO) के मामले में, यह राष्ट्रीय मिशनों में अपनी नेतृत्व की भूमिका जारी रख सकता है और ज्ञान एवं बुनियादी ढांचे के माध्यम से राज्य– स्तरीय उद्दोयों को मदद प्रदान कर सकता है। यह उन्नत राज्य उद्योगों की सहायता भी कर सकता है। इस प्रकार के तालमेल से, सरकार के विभिन्न स्तर अंतरिक्ष के क्षेत्र में सहकारी संघवाद का भारतीय मॉडल तैयार कर सकते हैं– एक ऐसा मॉडल जो भारत की विविधता को दर्शाता हो और उसके संघीय साधनों का प्रयोग करता हो।
निष्कर्ष
अंतरिक्ष अन्वेषण की पहचान हमेशा से ही असाधारण स्वदेशी महत्वाकांक्षा और सूझ–बूझ रही है। इसरो के केंद्रीय मॉडल से इन–स्पेस (IN-SPACe) के सुविधा–दाता मॉडल की ओर हुआ परिवर्तन और इसमें राज्य सरकारों की बढ़ती भागीदारी एक ऐसे संस्थागत विकास को दर्शाती है जिसमें केंद्र द्वारा संचालित अंतरिक्ष कार्यक्रम को अब एक संघीय आर्थिक तंत्र का बढ़ता हुआ समर्थन मिल रहा है। अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का संघीयकरण अब भारत की अंतरिक्ष गतिविधियों को केवल एक राष्ट्रीय वैज्ञानिक प्रयास से आगे बढ़ाकर सर्व–समावेशी आर्थिक उपक्रम का रूप दे रहा है जिसमें विनिर्माण सेवाएं और शासन भी शामिल हैं।
इसलिए, भारत की अगली चुनौती केवल तकनीकी या आर्थिक नहीं बल्कि संस्थागत है। तालमेल, भूमिकाओं में स्पष्टता और अंतरराष्ट्रीय मानकों के साथ सामंजस्य ही यह निर्धारित करेगा कि संघीकरण एक शक्तिवर्धक बनता है या बिखराव का कारण। यदि यह सफल होता है तो भारत का यह नज़रिया उन दूसरी उभरती शक्तियों के लिए अहम सबक साबित हो सकता है जो राष्ट्रीय संप्रभुता, उप–राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा और बाहरी अंतरिक्ष के सामूहिक प्रबंधन के बीच तनाव को संभाल रही हैं। इस लिहाज़ से, भारत की अंतरिक्ष यात्रा अब केवल तारों तक पहुँचने तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह इस बात को आकार देने के बारे में है कि मानवता उन तारों से परे के अंतरिक्ष का प्रबंध किस प्रकार करती है।
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*केशव वर्मा, रिसर्च एसोसिएट, विश्व मामलों की भारतीय परिषद, नई दिल्ली
अस्वीकरण: व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण
[i] “About us - IN-SPACe,” n.d. https://www.inspace.gov.in/inspace?id=inspace_about_inspace_v3.
[ii] Thakur, Aksheev. “110 IN-SPACe Authorisations Issued to Pvt Players Since 2020 - the Tribune.” The Tribune, December 10, 2025. https://www.tribuneindia.com/news/india/110-in-space-authorisations-issued-to-pvt-players-since-2020/.
[iii] Udasi, Zarna. “Gujarat’s SpaceTech Policy: What’s Inside and How Industry Leaders View the Path Ahead.” ETGovernment.Com, April 26, 2025. https://government.economictimes.indiatimes.com/news/technology/gujarats-spacetech-policy-whats-inside-and-how-industry-leaders-view-the-path-ahead/120634424#:~:text=Zarna%20Udasi,electricity%20duty%2C%20and%20interest%20subsidies.
[iv] News On AIR. “Gujarat Marks Milestone in Space Research with First Sounding Rocket at Dholera | DD News on Air,” n.d. https://www.newsonair.gov.in/gujarat-marks-milestone-in-space-research-with-first-sounding-rocket-at-dholera/.
[v] Government of Tamil Nadu. “Draft Tamil Nadu Space Industrial Policy 2024,” 2024. https://tidco.com/wp content/uploads/2024/06/Draft%20Tamil%20Nadu%20Space%20Industrial%20Policy.pdf.
[vi] Ibid 5.
[vii] Department of Electronics, Information Technology and Biotechnology. “Karnataka Space Technology policy, 2024-2029 (Draft),” 2024. https://eitbt.karnataka.gov.in/uploads/media_to_upload1733573412.pdf.
[viii] Ibid
[ix] Emerging Technologies Wing, Information Technology, Electronics & Communications (ITE&C) Department, Government of Telangana. “SpaceTech Framework,” April 2022. https://startup.telangana.gov.in/wp-content/uploads/2023/02/Telangana-SpaceTech-Framework.pdf.
[x] Usthadian Experts. “Andhra Pradesh Space City and Defence Hubs - Current Affairs Usthadian Academy.” Current Affairs Usthadian Academy, December 18, 2025. https://www.usthadian.com/andhra-pradesh-space-city-and-defence-hubs/.
[xi] Archit_Tandon. “Maharashtra to Launch Space Tech Policy in Next Three Months.” Communications Today, March 7, 2025. https://www.communicationstoday.co.in/maharashtra-to-launch-space-tech-policy-in-next-three-months/.