सारांश: जलवायु– प्रेरित प्रवास के कारण होने वाला पलायन एक परिघटना के रूप में पहले ही आरंभ हो चुका है लेकिन मानव गतिशीलता पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को स्वीकार किए जाने के बावजूद, शासन– प्रशासन की व्यवस्था और साधनों में अभी भी कमी बनी हुई है। वर्तमान वास्तविकता और सुव्यवस्थित व्यवस्था के अभाव के बीच नीतिगत स्तर पर मौजूद यह अंतर, प्रवासन– प्रशासन में सुरक्षा– संबंधी एक अंतराल की ओर संकेत करती है। यह लेख इस अंतराल को भरने हेतु व्यवस्था की आवश्यकता का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है।
परिचय
जलवायु प्रवास महज़ भविष्य का कोई अनुमान नहीं है बल्कि यह ऐसी वास्तविकता है जो समय–सीमाओं के भीतर और सीमाओं के पार, दोनों ही जगहों पर वैश्विक पलायन के पैटर्न को आकार दे रही है। फिर भी, इस घटना को नियंत्रित करने के लिए कोई व्यापक वैश्विक व्यवस्था मौजूद नहीं है। जलवायु परिवर्तन और समुद्र के स्तर, बर्फ की चोटियों और सूखती ज़मीनों पर इसके विनाशकारी परिणामों को अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा व्यापक रूप से स्वीकार और माना गया है। पृथ्वी के बढ़ते तापमान के परिणाम भयंकर तूफ़ानों, भीषण वनाग्नियों और सूखे के रूप में दिखाई दे रहे हैं। इस परिघटना के मनुष्यों और उनकी गतिविधियों पर अत्यंत गंभीर प्रभाव पड़ते हैं।
हालाँकि, प्रवासन पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर दिए जाने वाले ध्यान में बहुत वृद्धि देखी जा सकती है लेकिन इसमें पर्यावरण से संबंधित पहलू को गतिशीलता वाले पहलू से ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है जिसका विश्लेषण बहुत सीमित है। अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (आईओएम/IOM) का मानना है कि जलवायु प्रवास अचानक या धीरे– धीरे होने वाले पर्यावरणीय बदलावों के कारण होता है जिनका लोगों के रहन–सहन की स्थितियों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। हालाँकि, इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई सर्वमान्य शब्द नहीं है।
विश्व भर के समुदायों को जलवायु संबंधी समस्याओं के कारण अपना स्थान बदलने के लिए विवश होना पड़ रहा है। जहाँ एक तरफ आंतरिक विस्थापन और प्रवासन सामान्य बात होगी वहीं दूसरी ओर देशों के मध्य होने वाले प्रवासन भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाएंगे क्योंकि कुछ देश या तो विस्थापित लोगों की इतनी बड़ी संख्या को अपने यहाँ स्थान नहीं दे पाएंगे या फिर वे पूरी तरह से रहने लायक नहीं रह जाएंगे– जैसे कि मालदीव या दूसरे छोटे द्वीपीय देश।
इसके बावजूद, जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले पलायन से निपटने के लिए किसी अंतरराष्ट्रीय ढांचे या समझौते का स्पष्ट अभाव है जिसकी वजह से प्रभावित आबादी को पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिल पाती।
क्षेत्रीय कमियों और नीतिगत उपायों की पहचान
दक्षिण एशिया: दक्षिण एशिया उन क्षेत्रों में से एक है जो जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील है और यहाँ बड़े पैमाने पर आंतरिक विस्थापन हो रहा है। वर्ष 2024 में, भारत में असम में आई बाढ़ जैसी जलवायु आपदा की वजह से लगभग 54 लाख (5.4 मिलियन) लोगों को विस्थापित होना पड़ा।[i] इसके अलावा, विश्व बैंक समूह का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उचित कदम न उठाए जाने पर 2050 तक दक्षिण एशिया की लगभग 1.8 प्रतिशत आबादी यानि 4.05 करोड़ (40.5 मिलियन) लोग, जलवायु प्रवासी बन सकते हैं।[ii]
भारत के जैसे ही बांग्लादेश को भी बड़े पैमाने पर आंतरिक विस्थापन के साथ ही देश के बाहर जबरदस्ती पलायन की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। जलवायु संबंधी जोखिमों की वजह से बांग्लादेश से भारत की ओर पलायन बढ़ा है जिसे एशियाई विकास बैंक ने एक हाई– वॉल्यूम कॉरिडोर यानि बड़े पैमाने पर पलायन करने वाला मार्ग बताया है।[iii] इसके अलावा, अनुमान है कि 2050 तक देश का 17 प्रतिशत भूभाग पानी में डूब जाएगा जिससे लगभग 2 करोड़ (20 मिलियन) लोग विस्थापित होगें।[iv] मालदीव को समुद्र के बढ़े जलस्तर से अस्तित्व का संकट है। धीरे– धीरे पानी में समाते देशों में से एक होने के नाते इसकी पूरी आबादी पर विस्थापन का संकट मंडरा रहा है।
इस क्षेत्र में भारत ने 2008 में जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना की शुरुआत की थी जो जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए व्यापक ढांचा प्रदान करती है, लेकिन इसमें प्रवासन को बहुत हद तक नज़रअंदाज़ किया गया है। हालांकि भारत संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलनों में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC), जलवायु वित्तपोषण व्यवस्था और लॉस एंड डैमेज फंड जैसी अंतरराष्ट्रीय जलवायु पहलों का सक्रिए रुप से समर्थन करता है फिर भी जलवायु प्रवासियों और उनकी सुरक्षा से संबंधित वर्तमान नीतिगत शून्यता को दूर करने के लिए और अधिकर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।
विशेष रूप से मालदीव ने, जलवायु संकट के अस्तित्व पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए इस संदर्भ में नीतियां बनाने में अहम भूमिका निभाने की कोशिश की है। अपनी आबादी पर मंडराते संकटों को पहचानते हुए मालदीव ने विदेशों में ज़मीन खरीदने जैसे विकल्पों पर भी विचार किया है।[v] एक अध्ययन से यह भी पता चला है कि मालदीव में समुद्र का जलस्तर बढ़ने की वजह से अधिकांश लोग दूसरे देशों में जाकर बसने के बारे में विचार कर रहे हैं।[vi] हालाँकि, इस क्षेत्र के अलग– अलग देशों ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए नीतियाँ बनाई हैं फिर भी इनमें अक्सर प्रवासन के पहलू की अनदेखी कर दी जाती है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि इस क्षेत्र की जलवायु रणनीतियों में जलवायु– प्रेरित प्रवासन की समस्या से निपटने के लिए आवश्यक प्रावधानों का अभाव है।[vii]
दक्षिण–पूर्व एशिया: दक्षिण– पूर्व एशियाई क्षेत्रों पर नज़र डालें तो इंडोनेशिया के जकार्ता, वियतनाम के हो ची मिन्ह शहर और बैंकॉक जैसे शहरी केंद्र और दूसरे द्वीपीय देश जलमग्न होने की आशंकाओं के बीच “अस्तित्व के संकट” से जूझ रहे हैं।[viii] इस क्षेत्र में जलवायु शमन रणनीतियों को अपेक्षित गति न मिल पाने की वजह से पलायन एक प्रमुख सामना करने की रणनीति बन चुका है। जहाँ एक तरफ आंतरिक विस्थापन में भारी वृद्धि होने की आशा है वहीं दूसरी ओर सीमा– पार पलायन भी जलवायु– प्रेरित पलायन का विशिष्ट पहलू है।
चूँकि इस जलवायु– संवेदनशील क्षेत्र में सीमा–पार प्रवासन होता है, इसलिए इसे एक सुरक्षा मुद्दे के रूप में देखा गया है। बीते दो दशकों में, आसियान क्षेत्रीय मंच के रक्षा अधिकारियों के संवाद ने सीमा–पार से होने वाले जबरन प्रवासन को जलवायु परिवर्तन से जुड़ा एक संकट माना है।[ix] जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए राष्ट्रीय रूपरेखा को मान्यता मिलने और उन्हें अपनाए जाने के बावजूद, प्रवासन के मुद्दे पर बहुत कम या बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया गया है। आसियन के नेतृत्व वाले प्रावधानों में जलवायु– संबंधी प्रवासन को शामिल करने की मांग ज़ोर–शोर से उठ रही है लेकिन अब तक क्षेत्रीय स्तर पर इस परिघटना को केवल मान्यता ही मिली है, और इसके लिए कोई ठोस नीतिगत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।[x]
अमेरिकी महाद्वीप समूह: इस क्षेत्र में भी जलवायु परिवर्तन के प्रभाव की वजह से लोगों को मजबूरी में एक जगह से दूसरी जगह जाना पड़ रहा है। जैसे, लैटिन अमेरिका में खेती की ज़मीन खराब होने की वजह से भोजन की कमी हो गई है और यही लोगों के पलायन का मुख्य कारण बन गया है। यूएचसीआर (UNHCR) के आंकड़ों से पता चलचा है कि जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपदाओं के कारण लैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र में 22 लाख (2.2 मिलियन) लोग विस्थापित हुए हैं। यह ध्यान देना आवश्यक है कि मध्य अमेरिकी देशों– होंडुरास, अल सल्वाडोर और ग्वाटेमाला में आए तूफ़ानों के कारण लोग मैक्सिको और उससे भी आगे उतर दिशा में, अमेरिकी की ओर पलायन कर रहे हैं। यह इस तर्क की पुष्टि करता है कि जलवायु परिवर्तन, प्रवासन के दबावों के पीछे प्रमुख और तेज़ी से बढ़ता हुआ कारक है। इस क्षेत्र में, अर्जेंटीना ने जलवायु संबंधी आपदाओं की वजह से विस्थापित हुए लोगों के लिए विशेष मानवीय वीज़ा कार्यक्रम की शुरुआत की है जो एक दुर्लभ नीतिगत उदाहरण प्रस्तुत करता है।[xi]
अफ्रीका: जलवायु परिवर्तन और राजनीतिक अस्थिरता मिलकर पूरे अफ्रीका में लोगों के पलायन का कारण बन रहे हैं। वर्ष 2009 का कंपाला कन्वेंशन पहला ऐसा महत्वपूर्ण और कानूनी रूप से बाध्यकारी दस्तावेज़ है जिसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले आंतरिक विस्थापन से निपटने के लिए व्यापक व्यवस्था तैयार करना है।[xii] यह कन्वेंशन 1951 के जिनेवा कन्वेंशन के सहायक के रूप में काम कर सकता है क्योंकि यह इस क्षेत्र में सीमा–पार सहयोग और आंतरिक रूप से विस्थापितों को सुरक्षा प्रदान करता है। यह मॉडल लोगों की आवाजाही के लिए कानूनी मदद प्रदान कर जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले पलायन में मदद कर सकता है और इसे दूसरे क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकता है।
यूरोप: अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन का यूरोप में प्रवासन के पैटर्न पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा। बढ़ते तापमान और बाढ़ का इस क्षेत्र पर पहले से ही प्रभाव पड़ रहा है जिससे जान–माल का नुकसान हो रहा है। ये घटनाएं विकसित क्षेत्रों की जलवायु संबंधी कमियों को उजागर करती हैं और जलवायु असुरक्षा को ग्लोबल साउथ का मुद्दा बनाने की बजाय एक वैश्विक मुद्दा बनाती हैं। यूरोप में, नीदरलैंड और इटली के कुछ हिस्सों को समुद्र के बढ़ते जलस्तर का सामना करना पड़ रहा है और वहाँ की आबादी को विस्थापन की आशंकाओं से जूझना पड़ रहा है।
यूरोपीय संघ ने भी जलवायु प्रवासियों के लिए कोई सैद्धांतिक परिभाषा नहीं दी है और यूरोपियन पार्लियामेंट रिसर्च सर्विस द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट की माने तो “बाह्य जलवायु प्रवासियों” पर आकंड़ों की कमी है, इस समस्या को हल करने के उद्देश्य से बनाए गए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के न होने का एक कारण है।[xiii] प्रवासन और शरण पर ईयू समझौता, जो प्रवासन से संबंधित मामलों को नियंत्रित करने वाला मुख्य नीतिगत ढांचा है, उसमें जलवायु– प्रेरित प्रवासन का कोई उल्लेख नहीं है। जहाँ एक तरफ यूरोपियन ग्रीन डील जलवायु परिवर्तन को प्रवासन के कारक के रूप में रेखांकित करती है वहीं ईयू समझौते में इसका न होना अपने आप में बहुत कुछ बताता है।
हालाँकि जलवायु–प्रवासन पर कोई क्षेत्रीय नीतिगत ध्यान नहीं दिया जा रहा है फिर भी नॉर्वे और स्विट्ज़रलैंड ने नानसेन पहल की शुरुआत की है। यह जलवायु परिवर्तन और आपदाओं की वजह से विस्थापित हुए सीमा–पार के लोगों की सुरक्षा हेतु परामर्श प्रक्रिया है। हालाँकि, चूँकि यह गैर–बाध्यकारी पहल है, इसलिए कानूनी शून्यता बनी हुई है।
ओशिनिया क्षेत्र: ओशिनिया के भीतर, ऑस्ट्रेलिया बिल्कुल मध्य में है। इस क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया का मध्य में होना तुवालु के साथ हुए समझौते– जिसे फालेपिली यूनियन ट्रिट्री के नाम से जाना जाता है, इसे और भी महत्वपूर्ण बना देता है।[xiv] अपनी तरह का यह पहला समझौता है जो तुवालु के नागरिकों के लिए प्रवासन के मार्ग खोलता है। तुवालु इस समय जलमग्न होने के अस्तित्वगत संकट का सामना कर रहा है। इस द्विपक्षीय समझौते में नव–उपनिवेशवाद के तत्व भी निहित हैं क्योंकि इसके माध्यम से ऑस्ट्रेलिया को तुवालु से संबंधित सुरक्षा मामलों पर एक प्रकार से 'वीटो' का अधिकार मिल जाता है, फिर भी यह ऐतिहासिक समझौता जलवायु प्रवासन के आपसी संबंध को मान्यता प्रदान करता है।
इस क्षेत्र में छोटे द्वीपी देशों को अपनी कम ऊँचाई के कारण जलवायु परिवर्तन से एक गंभीर खतरा है। स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा इन छोटे द्वीपीय देशों के लोगों द्वारा दिए गए कुछ शरणार्थी आवेदनों को देखकर लगाया जा सकता है। हाल के आंकड़े बताते हैं कि किरिबाती के 94 प्रतिशत परिवार जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हुए हैं।[xv] किरिबाती के एक नागरिक का उदाहरण ले लेते हैं। इसने अपने देश के जलमग्न होने की आशंका की वजह से न्यूज़ीलैंड में शरणार्थी बनने के लिए आवेदन किया है। इस नागरिक का उदाहरण आदर्श रूप में देखा जा सकता है।
हालाँकि उस व्यक्ति का आवेदन अस्वीकार कर दिया गया क्योंकि जान को कोई तत्काल खतरा नहीं था और इस फैसले के खिलाफ की गई अपील का मूल्यांकन संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति द्वारा किया गया। आवेदन की अस्वीकृति जलवायु प्रवासियों को मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष वर्तमान मुख्य चुनौती को रेखांकित करती है यानि आसन्न संकट का अभाव क्योंकि जलवायु– प्रेरित असुरक्षा की स्थिति धीरे–धीरे पैदा होती है।
मूल्यांकन
वर्तमान में, जलवायु प्रवासियों की सुरक्षा के लिए कोई व्यापक कानूनी रूपरेखा उपलब्ध नहीं है। जलवायु संबंधी असुरक्षा की वजह से पलायन करने वालों को 1951 के जिनेवा कन्वेंशन के अनुसार शरणार्थी के तौर पर वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। वर्ष 1951 का जिनेवा कन्वेंशन शरणार्थियों के लिए बुनियादी कानून है लेकिन इसकी परिभाषा में उन लोगों को शामिल नहीं किया गया है जिन्हें जलवायु परिवर्तन की वजह से पलायन करने के लिए विवश होना पड़ता है। हालाँकि प्रवासन पर वैश्विक समझौता प्रवासन पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को स्वीकार करता है लेकिन यह प्रकृति में गैर–बाध्यकारी है। जलवायु प्रवासियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत परिभाषा और रूपरेखा का अभाव, पारिस्थितिक कारणों के साथ–साथ अन्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारकों के जटिल अंतर्संबंधों की वजह से है। जलवायु प्रवासियों के संदर्भ में कार्य–कारण संबंध स्थापित करना कठिन है, लेकिन जलवायु प्रवासियों के बढ़ते दायरे को देखते हुए नीतिगत स्तर पर अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।
इस संदर्भ में नीतिगत कार्रवाई की इतनी कमी है कि जलवायु प्रवासियों को “विश्व के विस्मृत पीड़ित” भी कहा जाने लगा है। [xvi] जो लोग जलवायु परिवर्तन के कारण पलायन करने के लिए विवश या बाध्य होते हैं उन्हें नई परिस्थितियों में कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। पलायन करने से वे अपनी आजीविका एवं आर्थिक सुरक्षा खो देते हैं और उन्हें नए स्थान पर आर्थिक एवं सामाजिक रूप से भी संघर्ष करना पड़ता है।
इसके अलावा, विश्व भर में मानवीय गतिविधियों के लिए मिलने वाली फंडिंग में कटौती के कारण जलवायु प्रवासियों को सुरक्षित या अधिक उपयुक्त वातावरण की तलाश में बार–बार स्थान बदलना पड़ रहा है। इन बार– बार होने वाले विस्थापनों के सुरक्षा और मानवीय, दोनों ही मोर्चों पर गंभीर परिणाम सामने आ रहे हैं। मानवीय मोर्चे पर, अंतरराष्ट्रीय सहायता संगठन कोई सक्रिय नीति अपनाने में असमर्थ हैं और उन्हें तत्काल राहत के लिए केवल काम–चलाऊ सहायता ही उपलब्ध करानी पड़ रही है।
जलवायु प्रवासियों के लिए नीति बनाने के लिए इस बात पर आम सहमति आवश्यक है कि जलवायु प्रवासियों को किस नज़रिए से देखा जाए। जलवायु प्रवासियों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य शब्द का न होना, इस मामले में वर्तमान कमी को दर्शाता है। “पर्यावरणीय शरणार्थी”, “पर्यावरणीय प्रवासी”, “जलवायु शरणार्थी” और “जलवायु-प्रेरित विस्थापित लोग” जैसे शब्दों का प्रयोग बिना किसी विशेष विचार के, एक– दूसरे के बदले किया जाता है। जलवायु प्रवासियों को अलग– अलग नज़रिए से देखने के कारण, उनके लिए नीतियां बनाना और उन्हें लागू करना मुश्किल हो जाता है। इस प्रवासन गलियारे में प्रवासी को स्वीकार करने वाले देश पर भी बेवजह का बोझ पड़ता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, कानूनी रूपरेखा के अभाव में जलवायु प्रवासी बिना किसी सुरक्षा के रह जाते हैं। सुरक्षा का मुख्य सहारा मुकदमेबाज़ी के रूप में सामने आता है। जैसे, फ्रांसीसी अदालत ने फैसला सुनाया कि बांग्लादेश के प्रवासी को वायु प्रदूषण की वजह से उसके मूल देश वापस नहीं भेजा जा सकता। हालाँकि, मुकदमेबाजी का यह स्वरूप दायरे में बहुत सीमित है और अंतरराष्ट्रीय रूपरेखा का पर्याप्त विकल्प नहीं हो सकता।
निष्कर्ष
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव समुद्र के बढ़ते जलस्तर, बढ़ते तापमान और विनाशकारी घटनाओं में वृद्धि के रूप में स्पष्ट दिखाई दे रहा है। इस कड़वी सच्चाई के बावजूद, जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले पलायन से निपटने और पलायन करने वालों को सुरक्षा देने के लिए कोई अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था मौजूद नहीं है। हालाँकि, जलवायु प्रवासियों को एस सुरक्षा के लिए संकट के रूप में देखा जाता है और प्रवासियों को सुरक्षा की दृष्टि से देखने के व्यापक चलन को देखते हुए ऐसा मानवीय नज़रिया जो उनकी सुरक्षा को प्राथमिकता दे, वह जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक न्यायसंगत प्रतिक्रिया के अनुरूप होगा। क्षेत्रीय स्तर पर आधारित प्रयासों जैसे कि कंपाला कन्वेंशन (जो अप्रीकी संदर्भ में लागू है), पर, अन्य क्षेत्रों द्वारा भी विचार किया जा सकता है।
जलवायु– संबंधी प्रभावों की वजह से मज़बूरन अंतरराष्ट्रीय विस्थापन से निपटने के लिए किसी व्यवस्था के अभाव में पलायन से लोगों की कमियाँ बढ़ेंगी हीं, वे अपने घर छोड़कर जलवायु संकट से कम प्रभावित होने वाले प्रदेशों में चले जाएंगे। इस प्रकार, जलवायु– पलायन का यह मुद्दा, विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय संदर्भों में, गहन कानूनी शून्य पैदा करता है। इसके बढ़ते दायरे को देखते हुए, नीतिगत मुद्दों में इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
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*यश्ना अगरवाल्ला, रिसर्च एसोसिएट् (CMMDS), इंडियन काउंसिल ऑफ़ वर्ल्ड अफेयर्स, नई दिल्ली।
अस्वीकरण: व्यक्त किए गए विचार लेखिका के व्यक्तिगत विचार हैं।
डिस्क्लेमर: इस अनुवादित लेख में यदि किसी प्रकार की त्रुटी पाई जाती है तो पाठक अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को ही मान्य माने ।
अंत टिप्पण
[i] Internal Displacement Monitoring Centre. “Country Profile India”, May 14, 2025, https://www.internal-displacement.org/countries/india/.
[ii] World Bank Group. “Groundswell: Preparing for Internal Climate Migration”, https://documents1.worldbank.org/curated/en/401511522303177090/pdf/124722-BRI-PUBLIC-NEWSERIES-Groundswell-note-PN2.pdf.
[iii] Soraya Kishtwari, “India and Bangladesh Must Address Climate Migration Together”, 9DashLine, April 8, 2024, https://www.9dashline.com/article/india-and-bangladesh-must-address-climate-migration-together.
[iv] World’s Economic Forum, “Climate Refugees – the world’s forgotten victims”, June 18, 2021, https://www.weforum.org/stories/2021/06/climate-refugees-the-world-s-forgotten-victims/.
[v] Naseem Qader, “The Diplomacy of Displacement: How Climate Migration Will Reshape Global Borders and Alliances”, USC Centre for Diplomacy, 2025, https://uscpublicdiplomacy.org/blog/diplomacy-displacement-how-climate-migration-will-reshape-global-borders-and-alliances.
[vi] Mufti Nadimul Quamar Ahmed, Jennifer E. Givens and Aaron Arredondo, “The links between climate change and migration: a review of South Asian experiences”, SN Social Sciences, 2024.
[vii] MD Shiyan Sadik and Sakif Al Ehsan Khan, “Diplomatic Strategies in Addressing Climate-Induced Migration: A Critical Review of South Asian Nations”, North South Journal of Peace and Global Studies, Vol 1, No. 2, 2023.
[viii] KS Sathya, R. Aditya, Pranesh Raam et al, “Addressing climate-induced migration: challenges and opportunities in EU’s legal and policy framework”, E3S Web of Conference, 2024.
[ix] Lorraine Elliott, “Climate Change and Migration in Southeast Asia: Responding to a New Human Security Challenge”, S. Rajaratnam School of International Studies, 2012.
[x] Emma Hansen, “Regional Climate-related Mobility Governance in Southeast Asia”, Lund University, 2023.
[xi] Naseem Qader, “The Diplomacy of Displacement: How Climate Migration Will Reshape Global Borders and Alliances”, USC Centre for Diplomacy, 2025, https://uscpublicdiplomacy.org/blog/diplomacy-displacement-how-climate-migration-will-reshape-global-borders-and-alliances.
[xii] UNHCR India, “Kampala Convention at 10 years: African Union leadership can deliver for IDPs”, December 6, 2022, https://www.unhcr.org/in/news/announcements/kampala-convention-10-years-african-union-leadership-can-deliver-idps.
[xiii] European Parliamentary Research Service, “The concept of 'climate refugee': Towards a possible definition”, 2023, https://www.europarl.europa.eu/RegData/etudes/BRIE/2021/698753/EPRS_BRI(2021)698753_EN.pdf.
[xiv] Sam Huckstep and Helen Dempster, “The Australia-Tuvalu Climate and Migration Agreement: Takeaways and Next Steps”, Centre for Global Development, 2023, https://www.cgdev.org/publication/australia-tuvalu-climate-and-migration-agreement-takeaways-and-next-steps.
[xv] Almulhim, A.I., Alverio, G.N., Sharifi, A. et al, “Climate-induced migration in the Global South: an in depth analysis”, npj Climate Action, 3(47), 2024.
[xvi] World’s Economic Forum, “Climate Refugees – the world’s forgotten victims”, June 18, 2021, https://www.weforum.org/stories/2021/06/climate-refugees-the-world-s-forgotten-victims/.